किसी भी संवाद माध्यम की सार्थकता को निर्धारित करने में दो चीजें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं वक्त और गति। बात कब कही गई और कितनी तेजी से कितने लोगों तक पहुंची, यही उसके प्रभाव की दिशा और दशा तय करती है। लोकतंत्र में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि लोकतंत्र मूलतः संवाद, असहमति, सहमति और जनमत की व्यवस्था है। संवाद ही वह कड़ी है जो किसी साधारण व्यक्ति को सत्ता के शिखर तक पहुंचा सकती है और सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति को देखते-देखते जनविश्वास के पतन तक ले जा सकती है। कभी एक राजा की प्रतिष्ठा वर्षों में बनती थी और वर्षों में ही गिरती थी, लेकिन आज किसी व्यक्ति की छवि कुछ घंटों में बन भी सकती है और कुछ घंटों में ध्वस्त भी। मनुष्य ने संवाद के लिए सबसे पहले संकेतों का सहारा लिया। फिर मौखिक परंपरा आई। उसके बाद लिखित शब्द अस्तित्व में आया। चिट्ठी-पत्री से लेकर अखबार तक, टेलीग्राम से रेडियो तक, टेलीफोन से टेलीविजन तक और फिर इंटरनेट, स्मार्टफोन तथा सोशल मीडिया तक संवाद की यात्रा लगातार तेज होती गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या संवाद की गति बढ़ने के साथ उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ी है? शायद नहीं। आज हमारे हाथ में संवाद का सबसे शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन उसी के साथ हमारे सामने संवाद का सबसे बड़ा संकट भी खड़ा है।
एक समय था जब किसी व्यक्ति की चिट्ठी दूसरे व्यक्ति तक पहुंचने में कई दिन लगते थे। शब्दों को लिखने से पहले सोचा जाता था। भेजने के बाद उन्हें वापस लेने का कोई रास्ता नहीं होता था। इसलिए शब्दों में संयम होता था। अखबार आया तो संवाद का दायरा बढ़ा। संपादक एक फिल्टर की तरह काम करता था। खबर छपने से पहले उसकी जांच, भाषा और प्रस्तुति पर विचार होता था। रेडियो ने आवाज को घर-घर पहुंचाया। टेलीविजन ने आवाज के साथ चेहरा और दृश्य भी जोड़ दिया। इंटरनेट ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया और स्मार्टफोन ने तो संवाद को व्यक्ति की जेब में पहुंचा दिया। अब हर व्यक्ति पत्रकार है, हर व्यक्ति संपादक है, हर व्यक्ति प्रसारक है और हर व्यक्ति अपनी पसंद का दर्शक भी है। सोशल मीडिया ने संवाद को लोकतांत्रिक जरूर बनाया है, लेकिन इसी लोकतंत्रीकरण के साथ एक गंभीर समस्या भी पैदा हुई है जवाबदेही का अभाव।
आज ऐसा वातावरण बना दिया गया है मानो किसी बड़े जनांदोलन की सफलता के लिए सोशल मीडिया अनिवार्य है। लेकिन इतिहास इस धारणा को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता है। भारत की आजादी की लड़ाई सोशल मीडिया के बिना लड़ी गई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अखबार, पर्चे, सभाएं, यात्राएं, भाषण और मौखिक संवाद ही जनचेतना के प्रमुख माध्यम थे। संपूर्ण क्रांति का आंदोलन सोशल मीडिया के बिना व्यापक हुआ। आपातकाल के खिलाफ प्रतिरोध सोशल मीडिया के बिना खड़ा हुआ। मंडल आयोग के विरोध ने सोशल मीडिया के बिना देश को आंदोलित किया। इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया की उपयोगिता नहीं है। उपयोगिता है और बहुत बड़ी है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या लोकतांत्रिक चेतना का अस्तित्व सोशल मीडिया पर निर्भर है? उत्तर स्पष्ट है नहीं। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की चेतना में है, सोशल मीडिया केवल उसका माध्यम है। समस्या तब शुरू होती है जब माध्यम स्वयं उद्देश्य बन जाता है।
सोशल मीडिया पर एक सूचना कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। यह उसकी ताकत है। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। सत्य को प्रमाण की आवश्यकता होती है। झूठ को केवल प्रसार की।सत्य को समय चाहिए। झूठ को केवल वायरल होने की क्षमता चाहिए। किसी घटना का पूरा संदर्भ जानने के लिए दस मिनट पढ़ना पड़ सकता है, लेकिन उसके बारे में एक भड़काऊ वाक्य कुछ सेकंड में वायरल हो जाता है। एक वीडियो का केवल कुछ हिस्सा दिखाकर पूरी कहानी बदल दी जाती है। पुरानी तस्वीर को नई घटना से जोड़ दिया जाता है। किसी व्यक्ति के बयान को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है और देखते-देखते जनमत तैयार हो जाता है। यही सबसे बड़ा खतरा है। सोशल मीडिया में अक्सर यह तय नहीं होता कि कौन-सी बात सही है; यह तय होता है कि कौन-सी बात अधिक तेजी से फैल रही है। लोकतंत्र में यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
सोशल मीडिया का संकट केवल झूठ नहीं है। उससे बड़ा संकट है नीयत। एक ही तथ्य को दो अलग-अलग लोग दो अलग-अलग उद्देश्यों से प्रस्तुत कर सकते हैं। किसी के लिए वह सूचना होगी, किसी के लिए प्रचार और किसी के लिए राजनीतिक हथियार। यहीं से सोशल मीडिया लोकतांत्रिक संवाद से निकलकर राजनीतिक युद्धभूमि में बदल जाता है। आज राजनीतिक दलों के पास डिजिटल रणनीति बनाने वाली पूरी व्यवस्थाएं हैं। संदेश तैयार होते हैं, वीडियो बनाए जाते हैं, नारे गढ़े जाते हैं, हैशटैग चलाए जाते हैं और फिर उन्हें समर्थकों के माध्यम से व्यापक बनाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में नागरिक धीरे-धीरे मतदाता से उपभोक्ता और नागरिक से लक्ष्य समूह में बदल जाता है। उसकी भावनाओं को समझा जाता है, उसकी कमजोरियों को पहचाना जाता है और फिर उसी के अनुरूप संदेश उसके सामने रखा जाता है। यह लोकतंत्र का नया चेहरा है।
भारत में सोशल मीडिया की राजनीतिक शक्ति को व्यापक रूप से महसूस करने का दौर अन्ना हजारे के आंदोलन के समय दिखाई पड़ा। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना को डिजिटल माध्यम ने व्यापक चर्चा में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद निर्भया कांड, 2014 और उसके बाद के चुनाव, नोटबंदी, मी टू, नागरिकता संशोधन कानून, किसान आंदोलन और NEET जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया ने जनचर्चा को प्रभावित किया। कई मामलों में सोशल मीडिया ने दबे हुए सवालों को आवाज दी। पीड़ितों को मंच दिया। सत्ता और संस्थाओं से जवाब मांगने का अवसर दिया। उन लोगों को भी बोलने का अवसर मिला जिन्हें पारंपरिक मीडिया में जगह नहीं मिलती थी। लेकिन इसी के साथ दूसरी तस्वीर भी सामने आई। ट्रोलिंग, चरित्र-हनन, फर्जी खबरें, धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण, भीड़ मानसिकता और अफवाहों ने भी इसी माध्यम का सहारा लिया। अर्थात सोशल मीडिया ने आवाज को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन शोर को भी लोकतांत्रिक बना दिया।
किसी भी समाज में अफवाह हमेशा खतरनाक रही है। लेकिन पहले अफवाह की गति सीमित थी। आज वह कुछ मिनटों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर सकती है। एक भड़काऊ पोस्ट, एक पुराना वीडियो, एक झूठी तस्वीर या किसी समुदाय के खिलाफ उकसाने वाला संदेश सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है। दंगे और हिंसा केवल जमीन पर नहीं होती। उनका मनोवैज्ञानिक वातावरण डिजिटल दुनिया में पहले तैयार किया जा सकता है। यही कारण है कि सोशल मीडिया को केवल मनोरंजन या संवाद का साधन मानना भूल होगी। यह सामाजिक मनोविज्ञान को प्रभावित करने वाली शक्ति बन चुका है। आतंकवादी और उग्रवादी संगठन भी इस शक्ति को समझते हैं। प्रचार, भर्ती, भय पैदा करने और विचारधारा फैलाने के लिए डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल दुनिया भर में चुनौती बन चुका है।
भारतीय राजनीति ने सोशल मीडिया की शक्ति को बहुत पहले पहचान लिया था। नरेंद्र मोदी और भाजपा ने डिजिटल संचार को राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। सीधे जनता से संवाद, वीडियो संदेश, लाइव कार्यक्रम और डिजिटल अभियान ने पारंपरिक राजनीतिक प्रचार की सीमाओं को बदल दिया। अब राहुल गांधी भी डिजिटल राजनीति को नए तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हाल में उनके द्वारा 'सत्याग्रह' नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू करने की पहल इसी बदलती राजनीतिक शैली का संकेत है। प्रथम दृष्टि में यह एक सकारात्मक प्रयास है। यदि डिजिटल मंच का उपयोग तथ्यों, दस्तावेजों और वैकल्पिक राजनीतिक विचारों को जनता तक पहुंचाने के लिए किया जाए तो यह लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या यह केवल राजनीतिक वजूद मजबूत करने की कवायद है? यह सवाल केवल राहुल गांधी से नहीं, बल्कि हर राजनीतिक दल से पूछा जाना चाहिए। नरेन्द्र मोदी हो, राहुल गांधी हो या कोई अन्य नेता, यदि सोशल मीडिया जनता से संवाद का माध्यम है तो ठीक है, लेकिन यदि यह केवल समर्थकों को संगठित करने, विरोधियों को निशाना बनाने और जनमत को प्रभावित करने का औजार बन जाए तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव कभी पोस्टर, सभाओं, नारों और घर-घर संपर्क का विषय हुआ करते थे। अब चुनाव मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़े जाते हैं। एक राजनीतिक दल का संदेश सुबह फोन पर आता है। दूसरा दोपहर में वीडियो के रूप में सामने आता है। शाम को किसी मुद्दे पर हैशटैग ट्रेंड करता है और रात तक पूरा डिजिटल वातावरण किसी एक विषय से भर जाता है। मतदाता को लगता है कि पूरा देश उसी मुद्दे पर बात कर रहा है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? अक्सर नहीं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम व्यक्ति को वही सामग्री अधिक दिखाता है जिसमें उसकी पहले से रुचि होती है। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अपने ही विचारों की दीवार के भीतर कैद हो जाता है। वह विरोधी विचार सुनना बंद कर देता है। यहीं से लोकतांत्रिक संवाद की जगह डिजिटल ध्रुवीकरण जन्म लेता है।
लोकतंत्र में न्याय संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। सोशल मीडिया में अक्सर फैसला भीड़ करती है। किसी व्यक्ति पर आरोप लगा नहीं कि हजारों लोग उसे दोषी मान लेते हैं। किसी का बयान वायरल हुआ नहीं कि लोग उसके चरित्र का फैसला करने लगते हैं। यह डिजिटल भीड़ कभी-कभी अदालत से पहले फैसला सुना देती है। इसे हम डिजिटल मॉब जस्टिस कह सकते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक है। क्योंकि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है। लोकतंत्र में अल्पमत की आवाज, आरोपी के अधिकार, तथ्य की जांच और संस्थागत प्रक्रिया का भी सम्मान होता है। सोशल मीडिया की भीड़ इन सबको पीछे छोड़ सकती है।
पारंपरिक मीडिया की अपनी सीमाएं और कमियां रही हैं। मीडिया संस्थानों पर राजनीतिक या आर्थिक प्रभाव के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन वहां संपादकीय जिम्मेदारी की एक व्यवस्था थी। सोशल मीडिया में कोई भी व्यक्ति कुछ भी लिख सकता है। यह स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। आज एक व्यक्ति बिना किसी तथ्य के आरोप लगा सकता है। हजारों लोग उसे आगे बढ़ा सकते हैं और लाखों लोग उसे सत्य मान सकते हैं। फिर सवाल उठता है कि जिम्मेदार कौन है? मूल पोस्ट करने वाला? उसे वायरल करने वाला? प्लेटफॉर्म? या वह व्यक्ति जिसने बिना जांचे उसे सच मान लिया? यही वह धुंधला क्षेत्र है जहां लोकतंत्र की चुनौती छिपी है।
सोशल मीडिया की समस्या अभी समाप्त भी नहीं हुई और उससे कहीं बड़ी चुनौती हमारे सामने दस्तक दे रही है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। आज किसी व्यक्ति की आवाज जैसी आवाज बनाई जा सकती है। तस्वीरों और वीडियो में ऐसे बदलाव संभव हैं कि वास्तविकता और कृत्रिमता के बीच अंतर करना कठिन हो जाए। कल यदि किसी नेता का ऐसा वीडियो सामने आए जिसमें वह कोई विवादित बात कहता दिखाई दे, तो जनता कैसे तय करेगी कि वह वास्तविक है या कृत्रिम? यदि किसी चुनाव के समय हजारों नकली वीडियो और ऑडियो एक साथ प्रसारित किए जाएं तो क्या होगा? यदि किसी व्यक्ति की छवि को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से कुछ मिनटों में बदलकर करोड़ों लोगों तक पहुंचा दिया जाए तो? यह केवल तकनीकी सवाल नहीं है। यह लोकतंत्र के अस्तित्व का सवाल है। आज हम कम से कम यह उम्मीद करते हैं कि तस्वीर, आवाज और वीडियो वास्तविकता का प्रमाण हो सकते हैं। भविष्य में यह भरोसा भी टूट सकता है।
सबसे बड़ा संकट उस समय पैदा होगा जब मनुष्य यह तय ही नहीं कर पाएगा कि वह जो देख रहा है, वह सच है या बनाया हुआ। सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की हमारी क्षमता लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। लेकिन यदि तकनीक इतनी आगे बढ़ गई कि झूठ बिल्कुल सत्य जैसा दिखाई देने लगे, तो लोकतंत्र में जनमत निर्माण किस आधार पर होगा? यही भविष्य की सबसे बड़ी चिंता है।
भारतीय परंपरा में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि असत्य का पहला प्रयास कई बार सत्य पर भारी पड़ जाता है। असत्य को केवल एक बार विश्वास पैदा करना होता है, जबकि सत्य को बार-बार प्रमाण देना पड़ता है। डिजिटल युग में यही अंतर और खतरनाक हो सकता है।
यह कहना आसान है कि सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, इसलिए इसे समाप्त कर देना चाहिए। लेकिन यह समाधान नहीं है। सोशल मीडिया ने आम नागरिक को अभूतपूर्व अभिव्यक्ति दी है। छोटे शहरों और गांवों की आवाज को राष्ट्रीय मंच मिला है। सरकारों से सवाल पूछना आसान हुआ है। सामाजिक आंदोलनों को गति मिली है। आपदा के समय सहायता और सूचना का प्रसार हुआ है। समस्या माध्यम में नहीं, माध्यम के दुरुपयोग में है। इसलिए जरूरत सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की नहीं, बल्कि जिम्मेदार डिजिटल संस्कृति की है।
हमें डिजिटल नागरिकता की शिक्षा देनी होगी। किसी भी संदेश को आगे बढ़ाने से पहले तीन सवाल पूछने चाहिए कि क्या यह सच है? क्या यह आवश्यक है? क्या इसे आगे बढ़ाने से किसी को अनावश्यक नुकसान हो सकता है? यदि इन तीन सवालों में से एक का जवाब भी स्पष्ट नहीं है तो संदेश को आगे बढ़ाने से बचना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी डिजिटल आचारसंहिता स्वीकार करनी होगी। सोशल मीडिया कंपनियों को पारदर्शिता बढ़ानी होगी। फर्जी खबरों की पहचान के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय तंत्र विकसित करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण जनता को केवल अपनी पसंद की सूचना नहीं, विरोधी विचार भी पढ़ने की आदत डालनी होगी।
लोकतंत्र का भविष्य न तो किसी हैशटैग से तय होगा और न किसी वायरल वीडियो से। लोकतंत्र का भविष्य तय होगा नागरिक की विवेकशीलता से। यदि नागरिक हर वायरल संदेश को सत्य मान लेता है तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली संविधान भी लोकतंत्र को नहीं बचा सकता। यदि नागरिक प्रश्न पूछता है, तथ्य खोजता है, असहमति का सम्मान करता है और भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेता है तो सोशल मीडिया भी लोकतंत्र की ताकत बन सकता है। आज आवश्यकता सोशल मीडिया से भागने की नहीं, उसके साथ समझदारी से रहने की है।
चिट्ठी से टेलीग्राम, रेडियो से टेलीविजन और टेलीविजन से इंटरनेट तक संवाद के माध्यम बदलते रहे हैं। आगे AI भी संवाद का स्वरूप बदल देगा। लेकिन संवाद का मूल धर्म नहीं बदलना चाहिए। सत्य, विश्वसनीयता, जिम्मेदारी और लोकहित, यही संवाद की आत्मा है। यदि माध्यम तेज हो लेकिन सत्य धीमा पड़ जाए, तो गति विनाशकारी बन सकती है। यदि संवाद व्यापक हो लेकिन जिम्मेदारी समाप्त हो जाए, तो अभिव्यक्ति अराजकता में बदल सकती है। यदि तकनीक शक्तिशाली हो लेकिन विवेक कमजोर हो जाए, तो लोकतंत्र सबसे पहले घायल होगा। इसलिए सोशल मीडिया को लोकतंत्र का दुश्मन घोषित करने के बजाय हमें यह समझना होगा कि वह एक ऐसा हथियार है जिसका परिणाम उसके उपयोग पर निर्भर करता है। लेकिन खतरा इसलिए बड़ा है क्योंकि इस हथियार की पहुंच हर हाथ में है और आने वाले समय में AI इस हथियार को और अधिक धार देगा।
आज सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया रहेगा या नहीं। वह रहेगा। AI भी आएगा। डिजिटल राजनीति भी बढ़ेगी। सवाल यह है कि क्या मनुष्य अपनी विवेक शक्ति को तकनीक की गति से तेज रख पाएगा? क्योंकि जिस दिन मशीनें झूठ को सत्य की तरह और सत्य को झूठ की तरह प्रस्तुत करने लगेगी, उस दिन लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनाव जीतने या हारने की नहीं होगी। उस दिन चुनौती होगी सत्य को पहचानने की और यदि समाज सत्य को पहचानने की क्षमता खो देता है, तो फिर संवाद का माध्यम चाहे चिट्ठी हो, अखबार हो, टेलीविजन हो, सोशल मीडिया हो या कृत्रिम बुद्धिमत्ता, लोकतंत्र का संकट माध्यम में नहीं, मनुष्य के विवेक में होगा। यही आज की सबसे बड़ी चिंता है। यही आने वाले कल का सबसे बड़ा प्रश्न भी।

