एनसीईआरटी की किताब में ‘सेंगोल’

Jitendra Kumar Sinha
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शिक्षा केवल परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह नई पीढ़ी को देश के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित कराने का भी महत्वपूर्ण जरिया है। इसी दृष्टि से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक का दूसरा भाग चर्चा में है। नई किताब में भारतीय शासन-परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण संदर्भों को स्थान दिया गया है। इनमें ‘सत्यमेव जयते’, ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ और ‘सेंगोल’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है।


नई पाठ्यपुस्तक में ‘सत्यमेव जयते’ को शामिल किया गया है। यह वाक्य भारतीय राज्य-चिह्न के नीचे अंकित है और भारतीय सार्वजनिक जीवन में सत्य तथा नैतिकता के महत्व को अभिव्यक्त करता है। विद्यार्थियों के लिए इसका उल्लेख केवल एक वाक्य या आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन में सत्य के व्यापक महत्व को समझने के अवसर के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय परंपरा में सत्य को जीवन के मूल मूल्यों में स्थान दिया गया है। इसलिए पाठ्यपुस्तक में इसका समावेश विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर देता है कि शासन और नागरिक जीवन में सत्य, जिम्मेदारी तथा नैतिक आचरण की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है।


इसी क्रम में ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ को भी पुस्तक में स्थान मिला है। इसका सामान्य अर्थ है—जहां धर्म है, वहीं विजय है। यहां धर्म का आशय केवल धार्मिक अनुष्ठान से नहीं, बल्कि न्याय, कर्तव्य, उचित आचरण और नैतिक व्यवस्था से भी जोड़ा जाता है। भारतीय राजकीय और दार्शनिक परंपरा में शासन को केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि उसे प्रजा के प्रति कर्तव्य और न्याय से भी जोड़ा गया। इस दृष्टि से ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ विद्यार्थियों के सामने शासन और नैतिकता के संबंध को समझने का एक आधार प्रस्तुत करता है।


नई किताब में ‘सेंगोल’ को भी प्रमुखता से समझाया गया है। सेंगोल को राजदंड के रूप में जाना जाता है और इसे शासन तथा सुशासन के सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। भारतीय परंपरा में राजदंड केवल राजा की शक्ति का प्रतीक नहीं था। इसके साथ न्यायपूर्ण शासन, कर्तव्य और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व की अवधारणा भी जुड़ी रही है। इस अर्थ में सेंगोल का महत्व केवल एक ऐतिहासिक वस्तु तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह शासन की जिम्मेदारी की ओर भी संकेत करता है।


पाठ्यपुस्तक में बताया गया है कि न्यायपूर्ण शासन के प्रतीक के रूप में सेंगोल के इस्तेमाल की परंपरा एक हजार वर्ष से अधिक पहले चोल राजवंश के शासनकाल से जुड़ी रही है। दक्षिण भारत के इतिहास में चोल राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्रशासन, मंदिर स्थापत्य, कला, संस्कृति और समुद्री गतिविधियों के क्षेत्र में चोल काल की विशिष्ट पहचान रही है। सेंगोल का संदर्भ इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने का अवसर देता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में राजसत्ता और शासन की अपनी प्रतीकात्मक परंपराएं रही हैं। राजदंड जैसी वस्तुएं सत्ता के हस्तांतरण, शासक के दायित्व और न्याय की अवधारणा को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करती थी।


इतिहास को केवल युद्धों, राजाओं और तिथियों के माध्यम से समझना पर्याप्त नहीं है। किसी सभ्यता को उसके प्रतीकों, परंपराओं, विचारों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से भी समझा जाता है। सेंगोल इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जब विद्यार्थी किसी ऐतिहासिक प्रतीक के बारे में पढ़ते हैं तो उनके सामने केवल एक वस्तु का परिचय नहीं आता, बल्कि वे उस समय के शासन-तंत्र, सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति के बारे में भी जान सकते हैं।


आज भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां सत्ता संविधान और कानून के आधार पर संचालित होती है। ऐसे में प्राचीन राजपरंपराओं का अध्ययन आधुनिक राजव्यवस्था को बदलने के लिए नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और राजनीतिक-सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए किया जाता है। सेंगोल का आधुनिक संदर्भ भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। यह विद्यार्थियों के लिए एक ऐसा विषय बन सकता है, जिसके माध्यम से वे राजतंत्र की ऐतिहासिक परंपराओं और आधुनिक लोकतांत्रिक शासन के बीच अंतर तथा ऐतिहासिक निरंतरता दोनों को समझ सके।


एनसीईआरटी की नई पुस्तक में ‘सत्यमेव जयते’, ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ और सेंगोल जैसे संदर्भों का समावेश भारतीय इतिहास और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को विद्यार्थियों के सामने रखने का प्रयास है। इन प्रतीकों के माध्यम से सत्य, धर्म, न्याय, कर्तव्य और सुशासन जैसे मूल्यों पर चर्चा की जा सकती है। आखिरकार, इतिहास का उद्देश्य केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उससे वर्तमान को समझने की दृष्टि विकसित करना भी है। सेंगोल की कहानी भी इसी व्यापक यात्रा का हिस्सा है, जहां राजदंड की ऐतिहासिक परंपरा से लेकर आज के संवैधानिक लोकतंत्र तक शासन की अवधारणा लगातार बदलती और विकसित होती रही है।


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