कुछ कहानियां केवल रहस्य नहीं होतीं, वे भावनाओं की ऐसी भूलभुलैया बन जाती हैं, जहां हर चेहरा सवाल बन जाता है और हर रिश्ता शक के घेरे में आ जाता है। ‘शक : ट्रस्ट नो वन’ भी ऐसी ही रहस्यमयी थ्रिलर कहानी है, जिसकी केंद्रीय धुरी एक मां और उसकी लापता बेटी की तलाश है। फिल्म की कहानी मातृत्व, दर्द, उम्मीद, रहस्य और विश्वासघात जैसे भावनात्मक पहलुओं को सस्पेंस के साथ जोड़ती है। कहानी की शुरुआत उस भयावह घटना से होती है, जिसने एक मां की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। अस्पताल के कमरे से उसकी नवजात बेटी का अपहरण हो जाता है। समय गुजरता जाता है, लेकिन मां की उम्मीद खत्म नहीं होती। नौ साल बीत जाने के बाद भी वह अपनी बेटी को तलाशना नहीं छोड़ती। उसके लिए यह केवल एक गुमशुदगी का मामला नहीं, बल्कि अपनी संतान को वापस पाने की जिंदगी भर की जंग है।
समय के साथ जब लगभग सभी रास्ते बंद नजर आने लगते हैं, तभी कहानी में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है। लापता बेटी से जुड़ी कुछ तस्वीरें सामने आती हैं। इन तस्वीरों से मां की उम्मीद फिर जाग उठती है और साथ ही शुरू होती है एक ऐसी जांच, जो पुराने जख्मों के साथ-साथ कई छिपे हुए रहस्यों को भी सामने लाने लगती है। तस्वीरें केवल बेटी के अस्तित्व का संकेत नहीं देतीं, बल्कि वे कई ऐसे सवाल खड़े करती हैं जिनका जवाब तलाशना जरूरी हो जाता है। बेटी आखिर कहां है? इतने वर्षों तक वह किसके साथ रही? उसे अस्पताल से किसने और क्यों अगवा किया? क्या यह केवल एक अपहरण था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश थी? इन सवालों के जवाब तलाशते हुए कहानी लगातार नए मोड़ लेती है।
थ्रिलर की सबसे दिलचस्प परत तब सामने आती है, जब जांच का दायरा बाहर के लोगों से निकलकर परिवार और करीबी रिश्तों तक पहुंचने लगता है। जिस पर भरोसा किया गया, क्या वही इस रहस्य का हिस्सा है? जिस व्यक्ति ने मुश्किल समय में साथ दिया, क्या उसकी नीयत वास्तव में साफ थी? यही वह बिंदु है जहां फिल्म का शीर्षक ‘ट्रस्ट नो वन’ अपने अर्थ को गहराई देता है। कहानी दर्शक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या किसी रिश्ते को केवल नजदीकी के आधार पर भरोसेमंद माना जा सकता है। हर नया सुराग एक नया सवाल पैदा करता है और हर जवाब अगले रहस्य की ओर ले जाता है।
फिल्म की कहानी का सबसे भावनात्मक पक्ष एक मां की अपनी बेटी के प्रति अटूट ममता है। नौ साल की लंबी प्रतीक्षा के बावजूद उसका विश्वास कायम है कि उसकी बेटी कहीं न कहीं जीवित है और वह उसे एक दिन जरूर खोज निकालेगी। यही भाव कहानी को महज क्राइम या मिस्ट्री थ्रिलर बनने से रोकता है। यहां एक मां का दर्द, उसकी बेचैनी, उसकी उम्मीद और अपने बच्चे को पाने की जिद कहानी को भावनात्मक आधार देती है। एक ओर जहां जांच में रहस्य की परतें खुलती हैं, वहीं दूसरी ओर मां का संघर्ष दर्शक को उसके साथ जोड़ता है।
‘शक : ट्रस्ट नो वन’ अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा के लिए भी खास है, क्योंकि वह इस थ्रिलर के जरिए ओटीटी की दुनिया में कदम रख रही हैं। रहस्य और भावनाओं से भरी कहानी में एक मां की भूमिका को निभाना उनके अभिनय के लिए भी चुनौतीपूर्ण नजर आता है। फिल्म में उनके साथ सोनी राजदान, जेनिफर विंगेट, ताहिर राज भसीन, अनुप सोनी और हरलीन सेठी जैसे कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आएंगे। अलग-अलग किरदारों की मौजूदगी कहानी में रिश्तों और रहस्यों की कई परतें जोड़ती दिखाई देती है।
फिल्म का निर्देशन रेन्सिल डिसिल्वा ने किया है। ऐसे विषय में निर्देशक के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि रहस्य को बनाए रखते हुए दर्शक की भावनात्मक रुचि भी कायम रखी जाए। कहानी में लगातार आने वाले मोड़ इसी दिशा में उत्सुकता पैदा करते हैं। फिल्म की खासियत यह हो सकती है कि यहां सवाल केवल यह नहीं है कि बच्ची कहां है, बल्कि यह भी है कि इस पूरे रहस्य के पीछे आखिर कौन है और किस पर भरोसा किया जा सकता है।
‘शक : ट्रस्ट नो वन’ की कहानी एक ऐसे सफर का संकेत देती है, जहां नौ साल पुराना दर्द अचानक नए सुरागों के साथ जीवित हो जाता है। तस्वीरों से शुरू हुई जांच रिश्तों, विश्वास और अतीत की उन परतों को खोलती है, जिनके पीछे कई चौंकाने वाले राज छिपे हो सकते हैं। मां अपनी बेटी तक पहुंच पाएगी या नहीं, तस्वीरों का असली रहस्य क्या है और उसके सबसे करीबी लोगों में से किस पर भरोसा किया जा सकता है, इन सवालों के जवाब कहानी के साथ धीरे-धीरे सामने आएंगे। रहस्य, सस्पेंस, मातृत्व और रिश्तों के टूटते भरोसे का यह मेल ‘शक : ट्रस्ट नो वन’ को एक ऐसी थ्रिलर कहानी बनाता है, जिसमें आखिरी सच तक पहुंचने से पहले शायद हर किरदार पर शक करना पड़े।

