भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो पर्दे पर दिखाई जाने वाली कहानी से कहीं आगे निकल जाती हैं। वे अपने निर्माण, विषय और सामाजिक प्रभाव के कारण इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। वर्ष 1976 में रिलीज हुई ‘मंथन’ ऐसी ही एक असाधारण फिल्म थी। यह सिर्फ श्वेत क्रांति और दुग्ध सहकारी आंदोलन की कहानी नहीं थी, बल्कि उन लाखों किसानों की भागीदारी का प्रतीक भी थी, जिन्होंने फिल्म बनाने के लिए अपनी छोटी-छोटी बचत से योगदान दिया। इस फिल्म की सबसे अनोखी बात यह थी कि इसके निर्माण के लिए गुजरात के लगभग पांच लाख दुग्ध उत्पादक किसानों ने दो-दो रुपये का योगदान दिया था। इस तरह किसानों की आर्थिक भागीदारी ने फिल्म को एक अलग ही पहचान दे दी। यही कारण है कि ‘मंथन’ को दुनिया की शुरुआती बड़े पैमाने की क्राउडफंडेड फिल्मों में गिना जाता है।
आज के दौर में किसी फिल्म, स्टार्टअप या सामाजिक परियोजना के लिए आम लोगों से ऑनलाइन धन जुटाना सामान्य बात है। लेकिन 1970 के दशक में क्राउडफंडिंग की कोई डिजिटल व्यवस्था नहीं थी। ऐसे समय में हजारों-लाखों किसानों का एक फिल्म के निर्माण के लिए अपनी जेब से पैसा देना अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी। दरअसल, ‘मंथन’ की कहानी गुजरात के दुग्ध सहकारी आंदोलन और भारत में आकार ले रही श्वेत क्रांति से प्रेरित थी। फिल्म का विषय सीधे उन किसानों के जीवन से जुड़ा था, जिनके दूध उत्पादन और सहकारी व्यवस्था ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए किसानों ने फिल्म को केवल पर्दे पर दिखाई जाने वाली कहानी नहीं माना, बल्कि इसे अपनी जिंदगी और संघर्ष की कहानी के रूप में देखा। दो रुपये की राशि भले ही छोटी थी, लेकिन लाखों लोगों की सामूहिक भागीदारी ने उसे बड़ी ताकत में बदल दिया।
‘मंथन’ का निर्देशन भारतीय समानांतर सिनेमा के प्रमुख फिल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। उन्होंने ग्रामीण समाज, किसान जीवन, सामाजिक बदलाव और व्यवस्था के बीच पैदा होने वाले संघर्ष को संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा। फिल्म में स्मिता पाटिल, गिरीश कर्नाड और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकारों ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। इन कलाकारों की अभिनय क्षमता ने कहानी को विश्वसनीयता और गहराई प्रदान की। फिल्म का केंद्र केवल दूध उत्पादन नहीं था, बल्कि ग्रामीण समाज में बदलाव की प्रक्रिया, सहकारिता की भावना और व्यक्तिगत हितों के बीच होने वाला संघर्ष भी था।
भारत में श्वेत क्रांति केवल दूध का उत्पादन बढ़ाने की आर्थिक कहानी नहीं थी। इसके पीछे किसानों को संगठित करने, उन्हें बाजार से जोड़ने और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से उनकी आय तथा सामूहिक शक्ति बढ़ाने की कोशिश भी थी। ‘मंथन’ ने इसी परिवर्तन को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। फिल्म यह दिखाती है कि जब छोटे किसान एक साझा व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं तो उनकी सामूहिक शक्ति कितनी बड़ी हो सकती है। गांव की सामाजिक संरचना, पुरानी सोच और नई व्यवस्था के बीच का टकराव फिल्म को केवल मनोरंजन से आगे ले जाता है।
फिल्म का चर्चित गीत ‘मेरो गांव काथा परे’ भी इसकी लोकप्रियता का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। गुजराती लोकधुनों से प्रेरित इस गीत में ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति की सहज झलक दिखाई देती है। इस गीत को आवाज देने वाली प्रीति सागर को इसके लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार मिला। गीत की लोकप्रियता ने यह भी साबित किया कि लोक संगीत की सरलता और मिट्टी से जुड़ी धुनें बड़े पर्दे पर दर्शकों के दिल तक आसानी से पहुंच सकती है।
‘मंथन’ की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि इसके निर्माता केवल फिल्मकार और कलाकार नहीं थे। इसके पीछे वे किसान भी खड़े थे, जिनकी जिंदगी फिल्म की कहानी का आधार बनी थी। पांच लाख किसानों का दो-दो रुपये का योगदान आर्थिक दृष्टि से भले ही मामूली दिखाई दे, लेकिन सामूहिक भावना के स्तर पर उसका महत्व बहुत बड़ा था। यह योगदान बताता है कि किसी रचनात्मक कार्य में समाज की भागीदारी किस तरह उसे केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं रहने देती, बल्कि सामाजिक दस्तावेज में बदल देती है।
करीब पांच दशक बाद भी ‘मंथन’ का महत्व कम नहीं हुआ है। आज जब फिल्म निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में सिनेमा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, तब यह फिल्म याद दिलाती है कि सिनेमा की असली ताकत केवल बजट में नहीं, बल्कि कहानी और समाज से उसके जुड़ाव में होती है। ‘मंथन’ इसलिए खास है क्योंकि इसमें किसानों की मेहनत कहानी बनी, किसानों का पैसा फिल्म के निर्माण का आधार बना और किसानों का जीवन भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया। दो रुपये से शुरू हुई यह सामूहिक भागीदारी आज भी बताती है कि छोटा योगदान जब बड़े विश्वास के साथ जुड़ता है, तो वह इतिहास रच सकता है।

