आठ नवम्बर को दीपावली

Jitendra Kumar Sinha
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दीपावली केवल दीप जलाने और आतिशबाजी करने का पर्व नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और पारिवारिक एकता का महापर्व है। अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और निराशा पर आशा की विजय का संदेश देने वाला यह त्योहार इस बार एक विशेष धार्मिक संयोग के कारण और भी खास होने जा रहा है। इस वर्ष दीपोत्सव पांच दिनों के बजाय छह दिनों तक मनाया जाएगा। तीन साल बाद अमावस्या तिथि दो दिनों तक रहने के कारण पर्वों की अवधि में यह विशेष स्थिति बन रही है।


ज्योतिषाचार्य आचार्य के अनुसार, छह नवंबर को धनतेरस के साथ दीपोत्सव की शुरुआत होगी। सात नवंबर को छोटी दीपावली, नरक चतुर्दशी और हनुमान जयंती मनाई जाएगी, जबकि आठ नवंबर को दीपावली का मुख्य पर्व होगा। इसके अगले दिन, नौ नवंबर को सोमवती अमावस्या के साथ गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का आयोजन किया जाएगा। वहीं, 11 नवंबर को भाई दूज और भगवान चित्रगुप्त की पूजा के साथ छह दिवसीय दीपोत्सव का समापन होगा। इस तरह धनतेरस से भाई दूज तक बाजारों, घरों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर उत्सव का वातावरण बना रहेगा। दीपों की जगमगाहट, लक्ष्मी-गणेश की आराधना, पारिवारिक मिलन, भाई-बहन के स्नेह और सामाजिक सद्भाव से जुड़ा यह पर्व भारतीय जीवन की विविध परंपराओं को एक सूत्र में पिरोएगा।


दीपोत्सव का पहला प्रमुख पर्व धनतेरस छह नवंबर को मनाया जाएगा। सनातन परंपरा में इस दिन का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इसे धन, आरोग्य, समृद्धि और शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से आरोग्य और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और चिकित्सा परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए यह पर्व केवल धन-संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन की खुशहाली का भी संदेश देता है। धनतेरस के अवसर पर भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी, भगवान गणेश, कुबेर और सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाएगी। घरों में दीप जलाए जाएंगे और सुख-समृद्धि की कामना की जाएगी। इस दिन सोना-चांदी, बर्तन, आभूषण तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा भी प्रचलित है। बाजारों में खरीदारी को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है।


व्यापारी वर्ग के लिए भी धनतेरस का दिन महत्वपूर्ण होता है। दुकानों और प्रतिष्ठानों की सजावट की जाती है। नए सामान की खरीदारी, कारोबार की शुभ शुरुआत और ग्राहकों के स्वागत के लिए विशेष तैयारियां की जाती है। हालांकि, खरीदारी का वास्तविक महत्व अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपयोगी वस्तु लेने में है, न कि अनावश्यक खर्च करने में। धनतेरस पर यम दीपदान की परंपरा भी निभाई जाती है। मान्यता के अनुसार, संध्या के समय यमराज के निमित्त दीपदान करने से परिवार पर अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। इस धार्मिक परंपरा में जीवन की सुरक्षा, परिवार के कल्याण और दीर्घायु की कामना निहित है।


सात नवंबर को छोटी दीपावली मनाई जाएगी। इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। दीपावली से एक दिन पहले आने वाला यह पर्व घरों की सफाई, दीप सज्जा और उत्सव की अंतिम तैयारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन कई स्थानों पर प्रातःकाल स्नान, पूजा-पाठ और दीपदान की परंपरा निभाई जाती है। नरक चतुर्दशी से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं बुराई पर अच्छाई की विजय और नकारात्मकता से मुक्ति का संदेश देती हैं। पौराणिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की कथा इस दिन से जुड़ी हुई है। इस कथा को अन्याय, अत्याचार और अहंकार के अंत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।


इस बार सात नवंबर को हनुमान जयंती मनाए जाने का भी उल्लेख है। इस अवसर पर श्रद्धालु भगवान हनुमान की पूजा-अर्चना करेंगे और उनके बल, बुद्धि, भक्ति तथा सेवा भाव का स्मरण करेंगे। हनुमानजी भारतीय धार्मिक चेतना में साहस, निष्ठा और समर्पण के प्रतीक हैं। उनकी आराधना से भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है। छोटी दीपावली का संदेश यह भी है कि मुख्य पर्व के उल्लास के बीच अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर करने का प्रयास किया जाए। घर की सफाई के साथ मन के विकारों को दूर करना, दूसरों के प्रति सद्भाव रखना और जरूरतमंदों की सहायता करना पर्व की सार्थकता को बढ़ाता है।


आठ नवंबर को दीपावली का मुख्य पर्व मनाया जाएगा। इस दिन का इंतजार बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को रहता है। घरों की साफ-सफाई, रंगोली, फूलों की सजावट, दीपों की कतारें और पूजा की तैयारियां दीपावली को विशेष बनाती हैं। शाम होते ही घरों, दुकानों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर रोशनी का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है।


ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस बार दीपावली स्वाति नक्षत्र तथा आयुष्मान और सौभाग्य योग के संयोग में मनाई जाएगी। इस दिन स्थिर लग्न में महालक्ष्मी, महासरस्वती, भगवान गणेश और कुबेर की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर परिवार में सुख, शांति, धन-धान्य और समृद्धि की कामना करेंगे। दीपावली पर माता लक्ष्मी की आराधना का विशेष महत्व है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव, सौभाग्य और समृद्धि की देवी माना जाता है। भगवान गणेश की पूजा शुभारंभ, बुद्धि और विघ्नों के निवारण के लिए की जाती है। सरस्वती की आराधना ज्ञान, विवेक और विद्या की महत्ता को रेखांकित करती है, जबकि कुबेर को धन-संपदा का अधिपति माना जाता है। इन सभी की संयुक्त आराधना भारतीय संस्कृति की उस व्यापक दृष्टि को सामने लाती है, जिसमें जीवन की समृद्धि का अर्थ केवल धन अर्जित करना नहीं है। ज्ञान, विवेक, स्वास्थ्य, परिवार का सुख और सामाजिक सम्मान भी समृद्ध जीवन के आवश्यक अंग हैं।


दीपावली का धार्मिक महत्व भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की लोकप्रचलित परंपरा से भी जुड़ा है। मान्यता है कि लंका विजय और चौदह वर्ष के वनवास के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। यह प्रसंग जनमानस में धर्म की विजय, न्याय की स्थापना और प्रियजनों के पुनर्मिलन का प्रतीक बन गया है। दीपावली पर दीप जलाने का अर्थ केवल घर को प्रकाशमान करना नहीं, बल्कि जीवन में आशा और सकारात्मकता को स्थान देना भी है। मिट्टी के दीपक भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुम्हारों की मेहनत और स्वदेशी परंपरा से जुड़े हैं। स्थानीय कारीगरों से दीपक खरीदना और उनके श्रम का सम्मान करना पर्व को सामाजिक दृष्टि से भी सार्थक बना सकता है।


दीपावली के अगले दिन, नौ नवंबर को सोमवार पड़ने के कारण सोमवती अमावस्या का विशेष संयोग बनेगा। हिन्दू धार्मिक परंपरा में सोमवार और अमावस्या का यह मेल विशेष पुण्यकारी माना जाता है। इस अवसर पर महिलाएं पीपल वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करेगी तथा परिवार की सुख-शांति और कल्याण की कामना करेगी। पीपल वृक्ष भारतीय परंपरा में धार्मिक आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक रहा है। वृक्षों की पूजा की परंपरा यह भी याद दिलाती है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति से गहराई से जुड़ा है। पेड़-पौधों का संरक्षण, पर्यावरण की स्वच्छता और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान हमारी सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण पक्ष हैं। सोमवती अमावस्या के साथ इस दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व भी मनाया जाएगा। गोवर्धन पूजा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की उस पौराणिक कथा से है, जिसमें उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों को वर्षा और संकट से बचाया था। इस प्रसंग को प्रकृति, सामुदायिक सहयोग और लोकजीवन के संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।


गोवर्धन पूजा के अवसर पर अन्नकूट तैयार करने की परंपरा है। विभिन्न प्रकार के पकवान और खाद्य पदार्थ भगवान को अर्पित किए जाते हैं। मंदिरों में विशेष भोग लगाया जाता है तथा अनेक स्थानों पर प्रसाद का सामूहिक वितरण होता है। अन्नकूट का भाव अन्न के प्रति कृतज्ञता और भोजन की महत्ता को स्वीकार करना है। कृषि प्रधान भारतीय समाज में अन्न को जीवन का आधार माना गया है। इसलिए अन्नकूट का पर्व किसानों के परिश्रम, प्रकृति की उदारता और सामूहिक सहभागिता का सम्मान करने का अवसर भी है। भोजन की बर्बादी रोकना और जरूरतमंदों के साथ अन्न साझा करना इस परंपरा की भावना को व्यवहार में उतारने का अच्छा माध्यम हो सकता है।


11 नवंबर को भाई दूज मनाया जाएगा। इसके साथ छह दिवसीय दीपोत्सव का समापन होगा। भाई दूज भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने वाला पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई भी बहनों के प्रति स्नेह, सम्मान और सुरक्षा का संकल्प व्यक्त करते हैं। भारतीय समाज में भाई दूज का भाव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह रिश्तों की गर्माहट, परिवार की एकजुटता और परस्पर जिम्मेदारी का उत्सव है। बदलती जीवनशैली, व्यस्त दिनचर्या और दूर-दराज के शहरों में रहने के कारण कई परिवारों के सदस्य नियमित रूप से एक-दूसरे से नहीं मिल पाते। ऐसे में त्योहार अपनों के करीब आने और संबंधों को फिर से मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं। भाई दूज के दिन बहनों के घर जाने, साथ भोजन करने, उपहार देने और पारिवारिक स्मृतियां साझा करने की परंपरा अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है। इसका मूल संदेश यही है कि रिश्तों को निभाने के लिए समय, संवेदना और सम्मान आवश्यक है।


11 नवंबर को भाई दूज के साथ भगवान चित्रगुप्त की पूजा भी की जाएगी। कायस्थ समाज के लिए यह दिन विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। भगवान चित्रगुप्त को परंपरागत रूप से मनुष्य के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाला देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यता में वे धर्मराज के सहायक और कर्मों के अभिलेख के संरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित है। कायस्थ समाज के लोग इस अवसर पर भगवान चित्रगुप्त की प्रतिमा या चित्र के सामने पूजा-अर्चना करेंगे। कलम, दवात, बही-खाते और लेखन सामग्री का पूजन करने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है। पूजा के दौरान ज्ञान, विवेक, सत्यनिष्ठा और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदारी की कामना की जाती है। भगवान चित्रगुप्त की आराधना का व्यापक संदेश यह है कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए। जीवन में पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से अधिक महत्व इस बात का है कि व्यक्ति अपने दायित्वों का निर्वहन किस ईमानदारी से करता है। कर्मों के लेखे-जोखे की धार्मिक अवधारणा मनुष्य को आत्ममंथन करने और अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करती है। लेखन और ज्ञान से जुड़े कायस्थ समाज के लिए चित्रगुप्त पूजा अपनी सांस्कृतिक पहचान को याद करने का अवसर भी है। परिवारों में नई पीढ़ी को इस परंपरा से परिचित कराना और उसके नैतिक संदेश को समझाना सांस्कृतिक निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण है।


दीपोत्सव छह दिनों तक चलने के कारण बाजारों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में उत्सव का वातावरण लंबे समय तक बना रहने की उम्मीद है। धनतेरस से शुरू होने वाली खरीदारी दीपावली तक जारी रहेगी। घरों की सजावट, पूजा सामग्री, मिट्टी के दीपक, फूल, मिठाइयां, कपड़े और उपहारों की मांग पर्व के दौरान बढ़ती है। दीपावली के अवसर पर स्थानीय दुकानदारों, छोटे कारोबारियों, कुम्हारों, कारीगरों, फूल विक्रेताओं और मिठाई बनाने वालों को भी आर्थिक गतिविधियों का लाभ मिल सकता है। यदि लोग स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें, तो त्योहार की खुशियां समाज के अधिक व्यापक वर्ग तक पहुंच सकती है। हालांकि, त्योहार की चमक-दमक के बीच पर्यावरण और सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है। मिट्टी के दीपकों का उपयोग, सुरक्षित विद्युत सजावट, जरूरत के अनुसार खरीदारी और ध्वनि तथा वायु प्रदूषण को कम करने वाले विकल्प अपनाकर दीपावली को अधिक जिम्मेदार तरीके से मनाया जा सकता है। बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए पटाखों के इस्तेमाल में सावधानी बरतना भी आवश्यक है। त्योहार का वास्तविक आनंद तभी बढ़ता है, जब उत्सव के साथ दूसरों की सुविधा और सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए। जरूरतमंद परिवारों को मिठाई, कपड़े या अन्य आवश्यक वस्तुएं देकर उनकी खुशियों में सहभागी बनना दीपावली की भावना को और व्यापक बनाता है।


दीपावली के छह दिनों में अलग-अलग धार्मिक परंपराएं एक साझा भाव से जुड़ी दिखाई देती है। धनतेरस आरोग्य और समृद्धि का संदेश देता है। छोटी दीपावली बुराई के अंत और सकारात्मकता की प्रेरणा देती है। मुख्य दीपावली प्रकाश, ज्ञान और शुभता का उत्सव है। सोमवती अमावस्या और गोवर्धन पूजा प्रकृति, अन्न और सामुदायिक जीवन के प्रति कृतज्ञता की भावना जगाते हैं। भाई दूज पारिवारिक प्रेम को मजबूत करता है, जबकि चित्रगुप्त पूजा कर्म और नैतिकता की याद दिलाती है। इस दृष्टि से दीपोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों का उत्सव है। इसमें परिवार, समाज, प्रकृति, श्रम, ज्ञान और नैतिक जिम्मेदारी सभी के लिए स्थान है।


तीन साल बाद अमावस्या तिथि दो दिनों तक रहने से बने विशेष संयोग के कारण पर्वों की रौनक रहेगी। छह नवंबर को धनतेरस से शुरू होकर 11 नवंबर को भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा तक चलने वाला यह उत्सव श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना, पारिवारिक मिलन और सामाजिक सद्भाव के अनेक अवसर प्रदान करेगा। दीपोत्सव का सबसे सुंदर संदेश यही है कि दीपक की छोटी-सी लौ भी गहरे अंधकार को चुनौती दे सकती है। उसी तरह सद्भाव का एक प्रयास, सहायता का एक कदम और सत्यनिष्ठा का एक संकल्प समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। जब दीपावली पर घरों के साथ मन भी प्रकाशमान होगा, तभी यह पर्व अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक बनेगा।


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