जब रिश्तों की कसौटी पर खरे उतरते थे किरदार - फिल्म ‘उधार का सिंदूर’

Jitendra Kumar Sinha
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हिन्दी सिनेमा का सत्तर का दशक अपने आप में एक खास दौर था। यह वह समय था, जब फिल्मों में केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि परिवार, रिश्ते, त्याग, प्रेम, संघर्ष और भावनाओं को भी प्रमुखता दी जाती थी। दर्शक पर्दे पर दिखाई देने वाले किरदारों में अपने जीवन की झलक तलाशते थे। इसी दौर की चर्चित पारिवारिक और भावनात्मक फिल्मों में ‘उधार का सिंदूर’ का नाम भी लिया जाता है। जितेन्द्र अभिनीत यह फिल्म पारिवारिक रिश्तों और भावनात्मक परिस्थितियों को केंद्र में रखकर बनाई गई थी। फिल्म में उस दौर के कई लोकप्रिय कलाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें रीना रॉय, आशा पारेख, असरानी और ओम शिवपुरी जैसे नाम शामिल थे।


जितेन्द्र उस दौर के लोकप्रिय अभिनेताओं में शामिल थे। उनकी पहचान एक ऐसे अभिनेता के रूप में भी थी, जो रोमांटिक भूमिकाओं के साथ-साथ पारिवारिक फिल्मों में भी सहज दिखाई देते थे। ‘उधार का सिंदूर’ में उनकी भूमिका ने दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ने का प्रयास किया। फिल्म की कहानी में रिश्तों की जटिलता, परिस्थितियों का दबाव और मानवीय भावनाओं का संघर्ष दिखाई देता है। यही वजह थी कि यह फिल्म केवल कलाकारों के कारण नहीं, बल्कि अपनी पारिवारिक संवेदना के कारण भी दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनी।


‘उधार का सिंदूर’ को रीना रॉय के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के शुरुआती दौर में रीना रॉय को संघर्ष करना पड़ा था। उन्हें लगातार ऐसी भूमिका और फिल्म की तलाश थी, जो उन्हें दर्शकों के बीच एक मजबूत पहचान दिला सके। ‘उधार का सिंदूर’ ने उन्हें वह अवसर दिया। फिल्म में उनकी अदाकारी ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया और उनके करियर को आगे बढ़ने में मदद मिली। इसके बाद रीना रॉय हिन्दी सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल होती चली गईं। उनकी अभिनय शैली में भावनाओं को सहजता से व्यक्त करने की क्षमता थी। यही खूबी पारिवारिक कहानियों में विशेष रूप से प्रभावी साबित हुई।


फिल्म की एक खासियत इसका कलाकार चयन भी था। आशा पारेख जैसी स्थापित अभिनेत्री की मौजूदगी ने फिल्म को मजबूती दी। वहीं असरानी ने अपने विशिष्ट अंदाज से कहानी में अलग रंग भरने का काम किया। ओम शिवपुरी जैसे अनुभवी कलाकार की उपस्थिति ने भी फिल्म के पारिवारिक वातावरण को विश्वसनीय बनाया। उस दौर में चरित्र कलाकारों की भूमिकाएं केवल कहानी को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं होती थीं, बल्कि वे फिल्म की भावनात्मक गहराई को भी मजबूत करते थे।


‘उधार का सिंदूर’ की एक दिलचस्प विशेषता यह भी थी कि यह एक तेलुगू फिल्म की रीमेक थी। भारतीय सिनेमा में दक्षिण भारतीय भाषाओं की सफल कहानियों को हिंदी दर्शकों के लिए नए कलाकारों और नए परिवेश के साथ प्रस्तुत करने की परंपरा पुरानी रही है। इस फिल्म के जरिए भी एक दक्षिण भारतीय कहानी को हिंदी दर्शकों तक पहुंचाया गया। हिंदी सिनेमा के बड़े सितारों और पारिवारिक भावनाओं से जुड़ी कथा ने इसे व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।


फिल्म का निर्देशन चंद्र बोहरा ने किया था। निर्देशक के लिए चुनौती यह होती है कि कहानी की मूल भावनाओं को बरकरार रखते हुए उसे दर्शकों के लिए प्रभावशाली बनाया जाए। ‘उधार का सिंदूर’ में पारिवारिक संवेदनाओं और रिश्तों के उतार-चढ़ाव को प्रमुखता दी गई। फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी राजेश रोशन ने संभाली थी। उस दौर में फिल्म का संगीत उसकी लोकप्रियता का महत्वपूर्ण आधार हुआ करता था। गीतों के बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे। मजरूह साहब की लेखनी की अपनी अलग पहचान थी और उनके शब्द फिल्मों के भावनात्मक वातावरण को और प्रभावशाली बनाने में सक्षम थे।


आज जब फिल्मों की कहानियों में तकनीक, तेज गति और नए तरह के विषयों का प्रभाव बढ़ गया है, ऐसे में सत्तर के दशक की पारिवारिक फिल्मों को याद करना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। ‘उधार का सिंदूर’ भी उसी दौर की याद दिलाती है, जब कहानी का केंद्र अक्सर परिवार और रिश्ते हुआ करते थे। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह अपने दौर के लोकप्रिय सितारों, भावनात्मक कहानी, मजबूत चरित्रों और मधुर संगीत को एक साथ लेकर सामने आई।


‘उधार का सिंदूर’ को याद करते समय सबसे अधिक चर्चा रीना रॉय की होती है। संघर्ष के दौर से निकलकर पहचान बनाने की उनकी यात्रा में इस फिल्म की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इसने उन्हें दर्शकों के बीच अधिक पहचान दिलाई और आगे के लिए उनके अभिनय करियर का रास्ता मजबूत किया। इस तरह ‘उधार का सिंदूर’ केवल जितेन्द्र अभिनीत एक पारिवारिक फिल्म नहीं, बल्कि रीना रॉय के करियर के महत्वपूर्ण पड़ाव और सत्तर के दशक के भावनात्मक हिंदी सिनेमा की यादगार झलक के रूप में भी याद की जा सकती है। उस दौर की फिल्मों की तरह इसमें भी रिश्ते, भावनाएं और परिस्थितियां कहानी के केंद्र में थी और शायद यही कारण है कि पुरानी फिल्मों की याद आज भी दर्शकों के मन में एक अलग जगह बनाए हुए है।


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