राजनीति की किताब जितनी भी पढ़िए, उसके सिद्धांतों को कितना भी रट लीजिए, लेकिन व्यावहारिक राजनीति की परीक्षा में कब कौन अव्वल हो जाएगा और कौन पिछड़ जाएगा, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है। राजनीति की स्थिति कुछ-कुछ उन विद्यार्थियों जैसी है, जो कक्षा में पिछली बेंच पर बैठते हैं और परीक्षा में अच्छे परिणाम की उम्मीद भगवान भरोसे छोड़ देते हैं। अंतर केवल इतना है कि यहां परीक्षा के प्रश्नपत्र भी बदलते रहते हैं और उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन भी राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से होता है।
रविवार को राजनीति की पाठशाला में दो ऐसी कक्षाएं लगी, जिनकी चर्चा सामान्य राजनीतिक घटनाओं जैसी लग सकती है, लेकिन उनके भीतर छिपे संदेश को समझने की कोशिश कीजिए तो राजनीति का पूरा संसार दिखाई देने लगता है। एक कक्षा दिल्ली के रामलीला मैदान में लगी, जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने भाषण से कई राजनीतिक सवाल खड़े किए। दूसरी कक्षा बिहार की राजधानी पटना में लगी, जहां भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के बीच राजनीतिक समीकरणों को लेकर ऐसी गतिविधियां देखने को मिली, जिन्होंने सत्ता पक्ष के भीतर नेतृत्व, वर्चस्व और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की नई बहस छेड़ दी।
दिल्ली में शब्दों की राजनीति थी तो पटना में संख्याओं और समर्थन की राजनीति। वहां भाषणों से संदेश देने की कोशिश हुई, यहां राजनीतिक फैसलों से संदेश पढ़ने की चुनौती सामने आई। दोनों घटनाओं को एक साथ रखकर देखिए तो सवाल उठता है कि आखिर आज की राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत और राजनीतिक मर्यादा का स्थान कहां रह गया है?
दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को इंडिया गठबंधन की सभा हुई। मंच पर लोकतंत्र बचाने, चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता और विपक्ष की एकजुटता की बातें हुई। लेकिन इस राजनीतिक आयोजन में राहुल गांधी के तीन कथन विशेष चर्चा का विषय बन गए। उन्होंने शिव बरात को तांडव के रूप में प्रस्तुत करने की बात कही, वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को अवैध बताया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कहीं जाने नहीं देने जैसी राजनीतिक चेतावनी दी। इन तीनों बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है, क्योंकि इनके पीछे केवल भाषण की उत्तेजना नहीं है, बल्कि कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक रणनीति और विपक्ष की मनःस्थिति के संकेत भी दिखाई देते हैं।
पहला सवाल शिव बरात और तांडव को लेकर है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव की बारात का अपना विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। शिव बरात लोकजीवन में आनंद, उल्लास, वैराग्य और विविधता का प्रतीक है। वहीं तांडव भगवान शिव के विराट स्वरूप, सृजन और संहार की दार्शनिक अवधारणा से जुड़ा है। दोनों की अपनी अलग सांस्कृतिक और आध्यात्मिक व्याख्याएं हैं। ऐसे में राजनीतिक भाषण में इन प्रतीकों का इस्तेमाल करते समय शब्दों के चयन की सावधानी अपेक्षित है। राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख करना गलत नहीं है, लेकिन उनके अर्थ को लेकर भ्रम पैदा होने पर अनावश्यक विवाद खड़ा हो सकता है। राहुल गांधी के बयान का आशय क्या था, इसे उनके पूरे भाषण और संदर्भ में समझना चाहिए। फिर भी सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक विरोध व्यक्त करने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का सहारा लेना जरूरी है? क्या राजनीतिक विमर्श को अपनी बात कहने के लिए ऐसे प्रतीकों की आवश्यकता है, जिनकी समाज में गहरी आस्था और मान्यता है?
दूसरी बात 2024 के लोकसभा चुनाव को अवैध बताने की है। यह कोई सामान्य राजनीतिक आरोप नहीं है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि जनता की सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति है। चुनाव आयोग, मतदान प्रक्रिया, मतगणना और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि किसी राजनीतिक दल को चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति है तो उसे प्रमाणों के साथ सामने आना चाहिए। कानूनी और संवैधानिक मंच भी उपलब्ध है। लेकिन किसी चुनाव को अवैध बताना एक गंभीर राजनीतिक दावा है। इसके लिए केवल भाषण पर्याप्त नहीं हो सकता है। जनता जानना चाहेगी कि आखिर चुनाव में कौन-सी अनियमितता हुई, उसके प्रमाण क्या हैं और उस अनियमितता का परिणाम पर कितना प्रभाव पड़ा? लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, उसकी जिम्मेदारी भी है। मगर लोकतंत्र की संस्थाओं पर सवाल उठाते समय जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो जाती है। चुनाव हारने के बाद सवाल उठाना और चुनावी प्रक्रिया में प्रमाणित गड़बड़ी सामने लाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। विपक्ष को अपनी शिकायतों को तथ्यों और तर्कों के आधार पर स्थापित करना होगा।
तीसरी बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कहीं जाने नहीं देने की है। राजनीति में विरोध, संघर्ष और सत्ता परिवर्तन की इच्छा स्वाभाविक है। लोकतंत्र में कोई भी दल किसी नेता को चुनौती दे सकता है और चुनाव के माध्यम से उसे सत्ता से बाहर करने का प्रयास कर सकता है। लेकिन राजनीतिक भाषा की भी एक मर्यादा होती है। प्रधानमंत्री किसी दल के नेता भर नहीं होती है, बल्कि देश के संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति होते हैं। उनके प्रति विरोध जताने का लोकतांत्रिक तरीका चुनाव, संसद, जनआंदोलन और संवैधानिक प्रक्रिया है। राहुल गांधी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस कथन का आशय राजनीतिक चुनौती है या कोई दूसरा संदेश। क्योंकि लोकतंत्र में किसी नेता को सत्ता से हटाने की बात और उसे कहीं जाने नहीं देने की बात के अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं।
अब दिल्ली से पटना की राजनीति पर आइए। यहां मामला भाषण का नहीं है, राजनीतिक समीकरणों का है। बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच गठबंधन की राजनीति लंबे समय से सत्ता का आधार रही है। दोनों दलों के संबंधों में कभी बड़े भाई और छोटे भाई की चर्चा होती रही है तो कभी सीटों और नेतृत्व को लेकर राजनीतिक संतुलन की परीक्षा होती रही है। रविवार को दो निर्दलीय एमएलसी को बीजेपी के साथ जोड़ने की राजनीतिक गतिविधि ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि आखिर गठबंधन में बड़ा भाई बनने की कोशिश किसकी है और इसका उद्देश्य क्या है?
राजनीति में संख्या का महत्व किसी से छिपा नहीं है। विधान परिषद हो या विधानसभा, सदन में संख्या बल राजनीतिक प्रभाव और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। ऐसे में निर्दलीय सदस्यों को अपने साथ जोड़ना किसी भी दल की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन गठबंधन की राजनीति में केवल संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होता है। सहयोगी दल के विश्वास और आपसी सम्मान को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। बीजेपी यदि दो निर्दलीय एमएलसी को अपने साथ जोड़ती है तो इसे उसकी संगठनात्मक और राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कदम केवल संख्या बल बढ़ाने के लिए उठाया गया है या इसके पीछे गठबंधन के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने की मंशा भी है?
बिहार की राजनीति में बड़े भाई और छोटे भाई का सवाल नया नहीं है। कभी जेडीयू इस भूमिका में रही तो कभी बीजेपी ने अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर नेतृत्वकारी भूमिका का दावा किया। समय और चुनावी परिणामों ने दोनों दलों की स्थिति में बदलाव किया है। इसलिए गठबंधन में बराबरी, नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक है। लेकिन यदि कोई सहयोगी दल अपनी ताकत दिखाने के लिए ऐसे कदम उठाता है, जिससे दूसरे सहयोगी को असहजता महसूस हो, तो गठबंधन की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लगना भी स्वाभाविक है।
पटना की राजनीतिक पाठशाला का सबसे दिलचस्प अध्याय राहुल राज को लेकर है। पिछले दो चुनावों में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण जिन लोगों की भूमिका सीमित या उपेक्षित दिखाई देती रही, वे अचानक राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण स्थान हासिल करते नजर आएं तो इसे राजनीति का बदलता हुआ पाठ ही कहा जाएगा। राहुल राज का राजनीतिक महत्व बढ़ना इस बात का संकेत हो सकता है कि बिहार की राजनीति में पुराने समीकरणों के साथ नए चेहरों और नए प्रभाव केंद्रों की भी जगह बन रही है। राजनीति में कोई व्यक्ति हमेशा हाशिये पर नहीं रहता है और कोई हमेशा केंद्र में नहीं बना रहता है। परिस्थितियां बदलती है तो राजनीतिक हैसियत भी बदल जाती है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है। क्या किसी व्यक्ति की राजनीतिक उपयोगिता का मूल्यांकन केवल तत्कालीन समीकरणों के आधार पर होना चाहिए? क्या संगठन में उसकी भूमिका, जनाधार, कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता और राजनीतिक योगदान को भी उतना ही महत्व नहीं मिलना चाहिए? लोकतंत्र में अवसर मिलना अच्छी बात है, लेकिन अवसर का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को अचानक बड़ी राजनीतिक भूमिका मिलती है तो उसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति, संगठनात्मक आवश्यकता या भविष्य की योजना अवश्य होगी। उसे समझना जरूरी है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और दिलचस्प पहलू वंशीधर को लेकर है। जेडीयू के अभिषेक को समर्थन देने की राजनीतिक स्थिति के बावजूद वंशीधर को बीजेपी द्वारा अपने साथ जोड़ने की चर्चा ने नए सवाल पैदा किए हैं। यदि एक ही राजनीतिक परिदृश्य में सहयोगी दल के किसी व्यक्ति को समर्थन दिया जा रहा हो और दूसरी ओर अलग राजनीतिक विकल्प को अपने पाले में लाने की कोशिश हो रही हो तो स्वाभाविक है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक इसका अर्थ तलाशेंगे। यहां सवाल किसी व्यक्ति के बीजेपी में आने या किसी दल को समर्थन देने के अधिकार का नहीं है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी राजनीतिक पसंद तय करने का अधिकार है। प्रश्न राजनीतिक संदेश का है। क्या यह केवल व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय है या इसके माध्यम से भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की जमीन तैयार की जा रही है? क्या बीजेपी बिहार में अपनी संगठनात्मक पकड़ को और मजबूत करना चाहती है? क्या वह गठबंधन के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत का विस्तार कर रही है? क्या जेडीयू और बीजेपी के बीच भविष्य की भूमिका को लेकर कोई नई प्रतिस्पर्धा दिखाई देने लगी है? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां इनकी संभावना को जरूर जन्म देती है।
गठबंधन की राजनीति अपने आप में एक अलग विज्ञान है। इसमें एक-दूसरे का सहयोग भी करना पड़ता है और अपनी राजनीतिक जमीन भी बचाकर रखनी पड़ती है। सहयोगी दलों को यह ध्यान रखना होता है कि उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा गठबंधन के सामूहिक उद्देश्य से बड़ी न हो जाए। बीजेपी और जेडीयू का राजनीतिक संबंध बिहार की सत्ता व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार रहा है। दोनों दलों के अपने संगठन, अपने मतदाता और अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। इसलिए यह अपेक्षा करना कि दोनों दलों के बीच हर मुद्दे पर पूर्ण सहमति होगी, व्यावहारिक नहीं है। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद का समाधान संवाद से होना चाहिए, न कि एक-दूसरे की राजनीतिक जमीन कमजोर करने की आशंका पैदा करके। बड़े भाई और छोटे भाई की बहस में एक बात भूलनी नहीं चाहिए कि जनता किसी दल को केवल उसके पुराने राजनीतिक दर्जे के आधार पर समर्थन नहीं देती है। जनता काम, नेतृत्व, विकास, स्थिरता और विश्वास के आधार पर निर्णय करती है। चुनाव परिणाम किसी दल की वास्तविक राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक पैमाना है। यदि बीजेपी अपनी ताकत बढ़ाना चाहती है तो उसे संगठन, कार्यकर्ता और जनाधार के माध्यम से ऐसा करना चाहिए। इसी तरह जेडीयू को भी अपने राजनीतिक योगदान और जनसमर्थन के आधार पर अपनी भूमिका मजबूत करनी चाहिए। गठबंधन में किसी की ताकत दूसरे की कमजोरी बन जाए तो अंततः नुकसान पूरे गठबंधन को उठाना पड़ सकता है।
रविवार की इन दोनों राजनीतिक कक्षाओं को एक साथ रखकर देखिए तो भारतीय राजनीति की दो अलग तस्वीरें सामने आती है। दिल्ली में राहुल गांधी अपने भाषण के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष को तीखा करने की कोशिश करते दिखाई दिए। वहीं पटना में राजनीतिक दल संख्या, समर्थन और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की रणनीति में व्यस्त नजर आए। एक ओर चुनाव की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर चुनावी राजनीति से इतर सदन के भीतर अपनी संख्या बढ़ाने की कवायद हो रही है। एक ओर लोकतंत्र बचाने की बात है तो दूसरी ओर गठबंधन में राजनीतिक वर्चस्व की चिंता। यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं का है। जनता महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सड़क, बिजली और विकास की अपेक्षा करती है। बिहार जैसे राज्य में रोजगार के अवसर, पलायन, कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर लगातार गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा अक्सर कौन बड़ा नेता है, कौन किसके साथ है, किसने किसका समर्थन किया और किसने किसे अपने पाले में कर लिया, जैसे सवालों में उलझ जाता है। राजनीतिक रणनीति अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता के सवाल उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि सत्ता पक्ष का समय केवल गठबंधन में अपनी स्थिति मजबूत करने में बीते और विपक्ष का समय केवल चुनाव की वैधता पर राजनीतिक आरोप लगाने में, तो विकास के मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।
राजनीति की पाठशाला में नेताओं के लिए सबसे कठिन परीक्षा जनता की अदालत में होती है। यहां न रटी हुई बातें काम आती हैं और न ही राजनीतिक जोड़-तोड़ हमेशा सफलता की गारंटी बन सकती है। यहां जनता अपने अनुभव के आधार पर फैसला करती है। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होती है। इसके लिए तथ्यों, प्रमाणों, संस्थाओं के प्रति जिम्मेदार व्यवहार और वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। प्रधानमंत्री का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध की भाषा भी लोकतांत्रिक होनी चाहिए। चुनाव पर सवाल उठाना अधिकार है, लेकिन उसके लिए प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान जरूरी है। इसी तरह बीजेपी को भी समझना होगा कि गठबंधन में संख्या बढ़ाने से राजनीतिक प्रभाव तो बढ़ सकता है, लेकिन सहयोगी का विश्वास कमजोर हुआ तो उसका दूरगामी असर पड़ सकता है। जेडीयू को भी अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर स्पष्ट रहना होगा। दोनों दलों को यह याद रखना चाहिए कि बिहार की जनता ने गठबंधन को केवल सत्ता का समीकरण बनाने के लिए नहीं, बल्कि शासन और विकास की अपेक्षाओं के साथ समर्थन दिया है। राजनीति में कोई स्थायी बड़ा भाई नहीं होता। परिस्थितियां बदलती हैं, चुनाव परिणाम बदलते हैं और जनता का फैसला भी बदलता है। आज जो सिरमौर है, कल उसे भी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। अंततः सवाल वही है कि राजनीति किसके लिए हो रही है? सत्ता के लिए, संख्या के लिए, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए या जनता के लिए?
रविवार की दोनों कक्षाओं ने हमें सोचने का अवसर दिया है। दिल्ली ने बताया है कि शब्दों की ताकत कितनी बड़ी हो सकती है और पटना ने दिखाया कि राजनीतिक गणित में एक-एक संख्या कितनी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इन दोनों के बीच एक तीसरी शक्ति भी है, जिसे अक्सर राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार भूल जाते हैं। वह है जनता। राजनीति की किताब में चाहे जितने अध्याय पढ़ लिए जाएं, अंत में परीक्षा जनता ही लेती है। भगवान के भरोसे पिछली बेंच पर बैठकर अच्छे परिणाम की उम्मीद करने वाले विद्यार्थियों की तरह राजनीति नहीं चलती। यहां हर बयान, हर फैसला और हर राजनीतिक चाल का हिसाब देना पड़ता है। इसलिए नेताओं को भी आत्ममंथन करना चाहिए। आखिर जनता को रामलीला मैदान के भाषणों से क्या मिला और पटना की राजनीतिक जोड़-तोड़ से क्या हासिल हुआ? लोकतंत्र को बचाने की चिंता करने वालों को लोकतांत्रिक मर्यादा भी बचानी होगी और सत्ता में भागीदारी करने वालों को सत्ता के साथ जिम्मेदारी भी निभानी होगी। क्योंकि राजनीति की असली पाठशाला संसद, विधानसभा या रामलीला मैदान नहीं है, बल्कि जनता के बीच है और इस पाठशाला में अंतिम परिणाम किसी नेता की इच्छा से नहीं, जनता के विवेक से तय होता है।

