हाल के शोध में मवेशियों के, दूध और सब्जियों में, पत्लोराइड की मौजूदगी से, वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ गई है। यह अध्ययन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूटिशन ने संयुक्त रूप से किया है, जिसमें मवेशियों के चारे और मिट्टी में फ्लोराइड के उच्च स्तर को प्रमुख कारण बताया गया है। इसमें 10 राज्यों के 50 नमूनों का विश्लेषण किया गया है।
बीकानेर और पंजाब के लुधियाना में फ्लोराइड का स्तर सबसे अधिक पाया गया है। इन क्षेत्रों के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा पहले से ही 2-3 मिलीग्राम प्रति लीटर है, जो मवेशियों और फसलों तक पहुंच रही है।
अजमेर, डेगाना, मकराना के ग्रामीण क्षेत्र में फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्र को बांकापट्टी नाम से जाना जाता है। इसमें फ्लोरोसिस रोग के चलते घुटने, कमर में टेडापन आ रहा है। यहां बीसलपुर, इंदिरा गांधी नहर के पानी की सप्लाई होने लगी है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के टीम ने बच्चों के दांतों की जांच की, जिसमें फ्लारोसिस रोग के लक्षण मिले हैं। टीम ने मवेशियों के पानी पीने के स्त्रोत, सिंचाई के पानी के नमूने लिए हैं।
दूध में फ्लोराइ के अध्ययन में पता चला है कि राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में गायों के दूध में फ्लोराइड का स्तर 0.8 से 1.2 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गया है, जो सामान्य से दोगुना है।
सब्जियों में पालक, गोभी और मूली जैसी सब्जियों में फ्लोराइड की मात्रा 2-3 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक मापी गई है, जो मिट्टी और सिंचाई जल से आ रही हैं।
औद्योगिक प्रदूषण, फॉस्फेट उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग और भूजल में प्राकृतिक फ्लोराइड इसका मूल स्रोत हैं।
इससे च्चों में दांतों का फ्लोरोसिस और हड्डियों की कमजोरी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। खासकर जहाँ फ्लोराइङ का स्तर 15 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक होता है।
सरकार ने इस मुद्दे पर एक समिति गठित की हैं जो मई 2025 तक अपनी रिपोर्ट देगी। तब तक लोगों से सावधानी बरतने और स्थानीय जल स्रोतों की जांच करने की सलाह दी है।
