पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने उठाए ऐतिहासिक कदम

Jitendra Kumar Sinha
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जम्मू-कश्मीर के शांत, सुरम्य पहलगाम में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं कहा जा सकता है। बल्कि यह मानवता पर हमला था, भारत की अस्मिता पर हमला था। पर्यटकों को निशाना बनाकर किया गया,  कायरतापूर्ण हमला न केवल आतंकवाद की एक नई घिनौनी शक्ल को उजागर करता है, बल्कि इसके पीछे छिपी पड़ोसी देश की राजनीतिक बौखलाहट और अंतरराष्ट्रीय पराजय को भी सामने लाता है।


पुलवामा के बाद सबसे बड़ा हमला है पहलगाम। लोन वुल्फ अटैक के रूप में सामने आया यह हमला योजनाबद्ध प्रतीत होता है, जिसमें विदेशी और भारतीय पर्यटकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया है। इससे न केवल भारत की पर्यटन अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचाने की कोशिश की गई है, बल्कि यह भी दिखाने का प्रयास किया गया कि आतंकवादी अब पहले से ज्यादा बर्बर और रणनीतिक रूप से सक्रिय हैं।


ऐसे भी देखा जाय तो मुंबई हमले के आरोपी तहव्वुर राणा की भारत वापसी ने पड़ोसी देश की नींद उड़ा दी है। क्योंकि पड़ोसी देश जानता है कि राणा भारत में उन सभी राजों से पर्दा उठा सकता है, जो सीधे तौर पर उन्हें कटघरे में खड़ा कर देंगे। 


अनुच्छेद 370 हटने के बाद भारत के साथ सऊदी अरब के संबंध और भी प्रगाढ़ हो गए हैं, भारत के प्रधानमंत्री सऊदी अरब यात्रा में व्यापार, रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के कई समझौते प्रस्तावित थे, जिससे पड़ोसी देश की बौखलाहट और भी बढ़ गई है।


भारत ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव सफलतापूर्वक करवा कर लोकतंत्र की बहाली को मजबूत किया है। उमर अब्दुल्ला की सरकार के गठन और लगातार बढ़ते पर्यटकों की संख्या ने घाटी में शांति और सामान्यता का वातावरण बनाया है। 


पहलगाम हमले के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका, रूस, इस्राइल, इटली, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र सभी ने कड़ी निंदा की है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री को फोन कर अपना समर्थन जताया है और दोषियों को सजा दिलाने में भारत के साथ खड़े रहने की बात कही है। 


केन्द्र सरकार ने इस हमले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। प्रधानमंत्री ने सऊदी अरब दौरा बीच में छोड़कर तुरंत वापसी की और गृहमंत्री ने जम्मू-कश्मीर जाकर स्थिति का जायजा लिया। पहलगाम हमला कोई सामान्य आतंकी हमला नहीं है। अब समय आ गया है कि भारत इस तरह के हमलों का जवाब ‘कड़ी निंदा’ से नहीं, बल्कि ठोस और निर्णायक कार्रवाई से दे। 


यह हमला तब हुआ जब देश के प्रधानमंत्री सऊदी अरब की यात्रा पर थे और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारत में। इस हमला यह स्पष्ट दिखता है कि पड़ोसी देश इस हमले से दो संदेश देने की कोशिश की है - एक, भारत की स्थिरता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सवालों के घेरे में लानाने की; और दूसरा, भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत से घबराकर उसे रोकने की।  


पुलवामा, उरी और मुंबई जैसे भयावह हमलों के बाद एक बार फिर भारत की जमीन पर आतंक का कहर टूटा है पहलगाम में। कश्मीर के इस पर्यटन स्थल पर हुए इस हमले ने सिर्फ़ निर्दोष लोगों की जान नहीं ली, बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया है। अब भारत को चेताने के लिए जो सख्त कदम उठाए हैं, उन्हें "कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक" कहा जा सकता है। इन फैसलों का असर सिर्फ सीमाओं तक ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, कृषि और ऊर्जा व्यवस्था पर भी पड़ेगा।


वर्ष 1960 में हुए “सिंधु जल समझौते” को भारत ने दशकों तक निभाया, इसके बावजूद पाकिस्तान लगातार आतंकवाद को समर्थन देता रहा है। लेकिन इस बार सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि “पानी अब नहीं बहेगा जब तक खून बहता रहेगा।


“सिंधु जल समझौते” की तहत भारत को पूर्वी नदियों (ब्यास, रावी, सतलुज) का और पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का अधिकार दिया गया था। 80% पानी पाकिस्तान को जाता है, जो अब रोका जा सकता है। भारत को क्या मिलेगा? अब भारत अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग कर सकता है, बांध बना सकता है और जलविद्युत परियोजनाएं विकसित कर सकता है।


अटारी-वाघा बॉर्डर बंद करने से इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। लेकिन अब सीमाएं सील करने की आवश्यकता हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि आतंक के सामने नरमी नहीं अपनाया जाय। केन्द्र सरकार ने अटारी-वाघा बॉर्डर बंद करने का फैसला तत्काल प्रभाव से लागू किया है। पाकिस्तानी नागरिकों को 1 मई से पहले भारत छोड़ने का भी निर्देश दिया है। ऐसा होने से व्यापार, पर्यटन और मानव संपर्क प्रभावित होंगे। अब पाकिस्तानियों के लिए भारत का दरवाज़ा बंद हो गया है। नई वीजा जारी करने पर रोक। भारत में पहले से मौजूद पाकिस्तानी नागरिकों को 48 घंटे में देश छोड़ने का आदेश दिया गया है। यह एक कड़ा संदेश है कि अब भारत आतिथ्य की भावना आतंक के सामने नहीं रखेगा। भारत ने पाकिस्तान के उच्चायोग में कार्यरत चार सैन्य अधिकारियों को 'अवांछित व्यक्ति' घोषित किया है और उन्हें 7 दिनों में भारत छोड़ने के निर्देश दिया है। यह कदम स्पष्ट करता है कि अब राजनयिक मर्यादाओं की आड़ में आतंकवाद को छिपाया नहीं जा सकता है। भारत ने इस्लामाबाद से अपने रक्षा, नौसेना और वायुसेना के सलाहकारों को वापस बुला लिया है। यह कदम पाकिस्तान के साथ सभी सैन्य संवादों को ठंडे बस्ते में डालने जैसा है। 


भारत के इन निर्णयों से पाकिस्तान पर कई स्तरों पर असर होगा। पाकिस्तान को जल संकट का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि पाकिस्तान की 80% खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। पानी रोके जाने से कृषि संकट, खाद्य संकट और सामाजिक उथल-पुथल बढ़ेगी। वहीं पाकिस्तान की ऊर्जा संकट भी बढ़ेगी, क्योंकि पाकिस्तान की बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं तरबेला और मंगला, सिंधु और झेलम नदियों पर आधारित हैं। पानी की कमी से बिजली उत्पादन प्रभावित होगा, उद्योग बंद होंगे, अंधेरा छा जाएगा। पाकिस्तान की शहरी जीवन पर असर भी असर पड़ेगा जैसे कराची, लाहौर, मुल्तान जैसे शहर सिंधु प्रणाली के जल पर निर्भर हैं। ऐसा होने से पानी की आपूर्ति ठप हो जाएगी और जनाक्रोश फूट सकता है।


भारत को ऐसा करने से  भारत नदी जल का पूर्ण उपयोग करेगा, नए बांध और सिंचाई परियोजनाएं बनायेगा, बिजली उत्पादन में वृद्धि होगी, कृषि उत्पादकता में सुधार होगा और यह निर्णय भारत के आत्मनिर्भरता अभियान को बल देगा।


भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष को सभी जानकारी देने और समर्थन जुटाने की कोशिश की है। इससे यह दिखता है कि सरकार पूरे लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ रही है। सभी दलों को एकजुट कर राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।


भारत ने जिस प्रकार बिना एक गोली चलाए पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से घुटनों पर लाया है, वह आने वाले समय की रणनीति का संकेत दे रहा है। यह स्पष्ट हो गया है कि भारत अब न केवल आतंक के खिलाफ लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाएगा, बल्कि जल, व्यापार और कूटनीति के मोर्चे पर भी अपनी शर्तें तय करेगा।


यह कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक एक नए युग की शुरुआत है जहाँ आतंक को जवाब तलवार से ही नहीं, रणनीति से भी मिलेगा।


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