पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद की घटना, निःसंदेह देश को डरा दिया है। यह सही है कि अब केन्द्र सरकार को चुपचाप बैठने की जगह घटनाओं की यथार्थ को समझ कर इसके अनुरूप काम करनी चाहिए, यानि अब कारवाई करने का समय आ गया है।
बंगाल में वक्फ कानून को लेकर हो रही हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है बल्कि तेज हो रहा है और हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है, ऐसी स्थित में मुर्शिदाबाद से हिन्दुओं को पलायन होने के लिए विवश किया जा रहा है, वह मुस्लिम तुष्टीकरण की खतरनाक राजनीति का प्रतिफल तो है ही, कुशासन एवं अराजकता की भी चरम पराकाष्ठा है।
बंगाल में जब तक वाम मोर्चा की सरकार थी तब तक सेकुलर राजनीति हावी था। लेकिन जब से तृणमूल कांग्रेस का शासन है, तब से सांप्रदायिकता का प्रभाव बढ़ने की बात बार-बार कही जा रही है।
देखा जाए तो धर्मनिरपेक्ष ताकतों को पूरे देश में चुनौती मिल रही है। राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कुछ राजनीतिक दल सांप्रदायिक तनावों को लगातार हवा देते रहते हैं, जबकि सर्वविदित है कि इस तरह की हिंसा लंबे समय तक सियासी फायदा नहीं पहुंचाती है। लेकिन यह भी सही है कि इस तरह की घटनाएँ समाज को सिर्फ नुकसान पहुंचाती है। बंगाल में जब वाम मोर्चा सरकार थी, तब वहाँ धर्मनिरपेक्षता की राजनीति हावी थी। मगर तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में सांप्रदायिक ताकतों का प्रभाव बढ़ने की बात बार-बार कही जा रही है। इस तरह की राजनीति पर लगाम लगनी चाहिए।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से भागीरथी नदी में नाव पर बैठकर हिंदुओं का पलायन करते हुए और फिर मालवा जिले में उतरते हुए, लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया, समाचार पत्र और न्यूज चैनलों पर दिखता है जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिला देगी।
बंगाल में कानून व्यवस्था ने, सुनियोजित हिंसा के दुष्चक्र के समक्ष, एक बार फिर अपने आपको समर्पण कर दिया है। क्योंकि बंगाल में इसके पहले भी ऐसा हो चुका है। मई 2021 में विधान सभा चुनावों के बाद वहां तृणमूल समर्थक तत्वों ने अपने राजनीतिक विरोधियों को इतना आतंकित किया था कि वे जान बचाने के लिए असम में शरण लेने को मजबूर हुए थे। तब भी उस समय पुलिस मूकदर्शक बनी हुई थी।
सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में कुल 23 जिले हैं, जिनमें से तीन जिला मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दीनानपुर है। इन जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या 50 फीसदी या इससे अधिक है। मुर्शिदाबाद जिला में मुसलमानों की सबसे अधिक 66.27 फीसदी जनसंख्या हैं। मुर्शिदाबाद में जिस तरह से हिंसक घटनाएं हुई हैं, यह एक नई प्रवृत्ति का संकेत दे रहा हैं।
असम के मुख्यमंत्री की पोस्ट से पता चला कि 2021 विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल से जो हिन्दू असम और झारखंड में पहुंच गए थे, स्थानीय लोगों ने उन्हें गले लगाया और खाने-पीने की व्यवस्था कर रहे थे। लगता है कि वे सभी लोग वहीं रह गए हैं, क्योंकि आज तक पश्चिम बंगाल वापस लौटे हैं या नहीं, इसकी जानकारी किसी को नहीं है ।
वर्तमान घटना में पलायन कर गए लोग मुर्शिदाबाद के धुलिवान के हैं। वे लोग बता रहे है कि घरों में आग लगा दी गई है और मारपीट की गई है। अब उनके पास न घर रहा और न खाने को सामान बचा है करें तो क्या करें, जो कुछ था वह सब लूट कर ले गए।
वक्फ संशोधन कानून से विरोध समझ में आता है, लेकिन उसका तरीका हिन्दुओं पर हमला करके कैसे हो सकता है? वैसे देखा जाए तो वक्फ कानून में ऐसा कुछ नहीं है जिससे मुसलमान का इस्लाम के विरुद्ध साबित किया जा रहा है। इस तरह की जहर फैलाने वाले वास्तव में स्वयं मुस्लिम समाज के ही दुश्मन होंगे। यदि वक्फ संशोधन कानून का विरोध ही करना है तो क्या इसके लिए हिंदुओं के घरों पर हमले करने, धर्म स्थली को क्षतिग्रस्त करने, हिन्दुओं का हत्याएं करने, हिन्दुओं के दुकान और घर को जलाने आदि की आवश्यकता कैसे हो सकती है। ऐसा होना निश्चित ही किसी और दिशा की ओर संकेत दे रहा है।
पश्चिम बंगालमें हिंसाका बढ़ना, हिन्दुओं में डर पैदा होना, भयका वातावरण बनना, आम जनजीवनका अनहोनी होनेको आशंकाओंसे घिरा होना चिन्ताजनक भी है और राष्ट्रीय शर्मका विषय भी है। यह बंगाल पुलिसके नाकारापन एवं ममता सरकार के मुस्लिम तुष्टीकरण का ही दुष्परिणाम ही कहा जायेगा। मुर्शिदाबाद के साथ ही अन्य शहरों में भी वक्फ कानून के विरोध के आड़ में हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी हो रही है। यह खतरनाक यह है। इस दौरान हिन्दुओं को जान-बूझकर निशाना बनाया जाना सोचनीय विषय है। मुर्शिदाबादमें 11 अप्रैल को हुई हिंसा के बाद से करीब 500 हिन्दू परिवार पलायन कर चुके हैं। हिन्दू परिवारों का आरोप है कि हिंसाके दौरान उनको चुन-चुनकर निशाना बनाया गया जा रहा है। ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी एवं उनकी सरकार देश में एकमात्र ऐसी सत्तारुढ़ पार्टी एवं नेता बन गयी है, जिसका देश के संविधान, न्यायपालिका एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा नहीं रह गया है। वक्फ कानून का विरोध करने सड़क पर उतरे तत्वों के दुस्साहस का पता इससे चलता है कि वे सीमा सुरक्षा बल के जवानों को भी निशाना बनाने से भी पीछे नहीं हिचक रहे हैं। उनके इसी दुस्साहस के चलते मुर्शिदाबादके हिन्दुओं ने खुद को असहाय पाकर पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं।
मणिपुर पर तुफान खड़ा करने वाले और यात्रा करने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव, शिव सेना (उद्धव) पार्टी नेता उद्धव ठाकरे, एन एस पी नेता शरद पवार, राजद नेता तेजस्वी यादव सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने मुर्शिदाबाद पर चुप्पी साध ली है, यह चुप्पी देश के लिए बहुत ही भयावह और की डरावनी है।
भारतीय लोकतंत्र का गौरव उसकी विविधता, भाषाओं और विचारों की स्वतंत्रता में निहित है। परंतु जब किसी राज्य में हिंसा, डर और अराजकता का माहौल बन जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत होता है। पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद जिला इन दिनों कुछ ऐसे ही भयावह स्थिति से गुजर रहा है। सुती, समसेरगंज, धुलियान और जंगीपुर की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ है और यह एक बड़ी हलचल की ओर इशारा कर रहा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है। विगत कुछ दिनों से लगातार हो रही हिंसा, इंटरनेट सेवाओं का ठप रहना, सुरक्षाबलों की भारी तैनाती होना, इस बात का संकेत दे रही है कि स्थिति सामान्य नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में प्रश्न उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लग सकता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 355 और 356 में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान है। अनुच्छेद 355 कहता है कि केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह राज्यों की सुरक्षा करे और उन्हें बाहरी आक्रमण या आंतरिक गड़बड़ी से बचाए। वहीं, अनुच्छेद 356 में उल्लेख है कि यदि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए, तो राष्ट्रपति राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकती हैं और स्वयं शासन संभाल सकती हैं। लेकिन, यह अधिकार निरंकुश नहीं हैं। इनका इस्तेमाल सिर्फ असाधारण हालात में ही किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले में अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई दिशा-निर्देश दिए हैं, जिसमें अनुच्छेद 356 का प्रयोग केवल तब किया जा सकता है जब राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य करने में पूरी तरह विफल हो। केवल कानून-व्यवस्था की समस्या, या प्रशासनिक चूक, राष्ट्रपति शासन लागू करने का आधार नहीं हो सकती है। धर्म, जाति या क्षेत्रीय हिंसा का हवाला देकर भी संविधान की मूल भावना — धर्मनिरपेक्षता — को कमजोर नहीं किया जा सकता। इसलिए, कोई भी राष्ट्रपति शासन का फैसला सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा।
देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन का इतिहास रहा है। अब तक पश्चिम बंगाल में चार बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। पहली बार 1 जुलाई 1962 से 9 दिन के लिए, दूसरी बार 20 फरवरी 1968 से लगभग 1 वर्ष के लिए, तीसरी बार 19 मार्च 1970 से लगभग 1 वर्ष के लिए और चौथी बार 29 जून 1971 से 20 मार्च 1972 तक। विगत पांच दशकों में पश्चिम बंगाल ने लोकतांत्रिक लड़ाइयों को कई बार झेला है। लेकिन अब फिर वही सिर उठाता दिख रहा है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान सर्वोच्च है। अगर किसी राज्य में हिंसा, प्रशासनिक विफलता या संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी होती है, तो निश्चित रूप से उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन क्या केवल राजनीतिक विरोध या कुछ घटनाएं किसी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने के लिए पर्याप्त हैं? संविधान कहता है – नहीं। जब तक कोई ठोस, स्पष्ट और गंभीर सबूत नहीं हों कि राज्य सरकार संविधान के अनुरूप कार्य नहीं कर रही है, तब तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
