चंद्रशेखर आज़ाद — एक ऐसा नाम जो सिर्फ़ स्वतंत्रता आंदोलन का नहीं, बल्कि बलिदान और विद्रोह की आत्मा का प्रतीक था।
जिन्होंने जीवन भर अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने आप को "आज़ाद" कहा — और आखिर तक उसी नाम को निभाया। लेकिन अफसोस, आज हम उनकी विरासत के साथ वही कर रहे हैं जो एक जंग जीतने के बाद लावारिस मैदान के साथ होता है — भूल जाना, तोड़-फोड़ करना और अपने मतलब के हिसाब से मरोड़ देना।
आज़ाद कौन थे?
चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को हुआ था। वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मुख्य स्तंभों में से एक थे। भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह छेड़ा। उनका संकल्प था —
"दुश्मन की गोली का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।"
और उन्होंने इसे अंतिम सांस तक निभाया। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब चंद्रशेखर आज़ाद पार्क) में, जब उन्हें घेर लिया गया, तो उन्होंने आखिरी गोली खुद को मारकर अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार नहीं होने दी।
हमने उनकी विरासत के साथ क्या किया?
भूल जाना
आज चंद्रशेखर आज़ाद का नाम स्कूलों की किताबों में एक-आध पैराग्राफ से ज्यादा नहीं मिलता। हमने उन्हें 'एक क्रांतिकारी' के दायरे में बंद कर दिया — जैसे उनका संघर्ष और बलिदान बस एक रोमांचक कहानी हो। उनके विचार, उनका आदर्श समाज बनाने का सपना — सब कुछ किताबों के पीले पन्नों में दब गया।
राजनीतिक इस्तेमाल
आज भी कुछ पार्टियां और नेता आज़ाद जैसे शहीदों के नाम का इस्तेमाल सिर्फ वोट बटोरने के लिए करते हैं। उनके असली विचार — स्वतंत्रता के बाद एक समानता आधारित, शोषणमुक्त भारत बनाने का सपना — कहीं पीछे छूट गया। वे समाजवादी सोचते थे, गरीबी हटाना चाहते थे, जातिवाद और भेदभाव को जड़ से खत्म करना चाहते थे। लेकिन आज कौन याद करता है इस सोच को? सिर्फ मूर्ति लगवाओ, फूल चढ़ाओ, फोटो खिंचवाओ — काम खत्म।
यादगारों की दुर्दशा
अल्फ्रेड पार्क जहां आज़ाद ने प्राण त्यागे थे, वहाँ आज भी श्रद्धांजलि देने लोग आते हैं, लेकिन देखरेख और सम्मान जैसा होना चाहिए था — वैसा नहीं है। कई जगह उनकी प्रतिमाएँ जर्जर हालत में हैं, मेले-जुलूसों में गुम हो जाती हैं।
क्रांति के मूल्यों की अनदेखी
चंद्रशेखर आज़ाद सिर्फ एक हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे। वे चाहते थे कि आज़ादी का मतलब सिर्फ सत्ता बदलना नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी बदलना हो। आजादी के इतने दशक बाद भी देश में भ्रष्टाचार, गरीबी, असमानता और जातिगत राजनीति चरम पर है — जिस व्यवस्था को आज़ाद ने तोड़ने का सपना देखा था, वही और मजबूत हो गई है।
चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने जीवन का हर पल भारत माता के नाम कर दिया। लेकिन आज हम उनकी विरासत को भुला रहे हैं, राजनीति में घसीट रहे हैं, और उनके सपनों को रौंद रहे हैं। सच कहें तो — हमने आज़ाद को शहीद तो बनाया, मगर उनका सपना मार दिया। अब भी समय है। अगर हम सच में उन्हें श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो सिर्फ मूर्ति पर फूल चढ़ाने से नहीं होगा — हमें उस भारत के लिए लड़ना होगा, जिसका सपना उन्होंने देखा था —
एक समानता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित भारत।

