सुप्रीम कोर्ट ने 22 अप्रैल 2025 को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति राज्य बार काउंसिल का सदस्य नहीं है, तो वह राज्य वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के योग्य नहीं होगा। यह फैसला वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 14(2) के तहत लिया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार का राज्य विधानसभा, संसद या बार काउंसिल का सदस्य होना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला मोहम्मद फिरोज अहमद खालिद से संबंधित है, जिन्हें मणिपुर वक्फ बोर्ड का सदस्य नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति के बाद, मणिपुर हाई कोर्ट की एकल पीठ ने इसे बरकरार रखा, लेकिन खंडपीठ ने इसे पलटते हुए कहा कि कानून में स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि बार काउंसिल का सदस्य न रहने पर वक्फ बोर्ड की सदस्यता समाप्त होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के फैसले को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड की सदस्यता बार काउंसिल की सदस्यता से जुड़ी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के लिए दो शर्तें हैं: पहली, उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से होना चाहिए, और दूसरी, वह राज्य विधानसभा, संसद या बार काउंसिल का सदस्य होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति इन शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो वह वक्फ बोर्ड का सदस्य नहीं बन सकता है। इस प्रकार, यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति बार काउंसिल का सदस्य नहीं है, तो वह वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के योग्य नहीं होगा।
यह निर्णय वक्फ बोर्ड की सदस्यता से संबंधित नियमों को स्पष्ट करता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल योग्य और निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले व्यक्ति ही वक्फ बोर्ड के सदस्य बन सकें। इससे वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी।
