बिहार की जेलों में एक नई सुबह की शुरुआत हो रहा है। अब कैदी केवल सजा नहीं भुगतेंगे, बल्कि खुद को तकनीकी रूप से सशक्त भी बनाएंगे। राज्य सरकार ने एक अभिनव पहल करते हुए जेलों में बंदियों को कंप्यूटर का प्रशिक्षण देने का निर्णय लिया है। यह योजना न केवल एक सुधारात्मक कदम है, बल्कि समाज की मुख्यधारा से कटे हुए लोगों को फिर से जोड़ने की एक ठोस कोशिश भी है।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के रूप में तीन प्रमुख केंद्रीय काराओं (1) पटना स्थित बेऊर आदर्श केंद्रीय कारा, (2) मुजफ्फरपुर का शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा और (3) बक्सर केंद्रीय कारा, में किया गया है। इन तीनों जेलों से कुल 116 बंदियों का चयन किया गया है, जिन्हें चरणबद्ध तरीके से कंप्यूटर की शिक्षा दिया जाएगा।
इस ऐतिहासिक पहल का शुरुआत गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव अरविंद चौधरी ने किया है। उक्त अवसर पर उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम न केवल बंदियों के पुनर्वास में सहायक होगा, बल्कि अपराध की पुनरावृत्ति को भी रोकेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जो कैदी पहले से कंप्यूटर में दक्ष हैं, उन्हें ही प्रशिक्षक के रूप में प्रयोग किया जाए, जिससे उनके आत्मविश्वास को भी बल मिलेगा।
कार्यक्रम के तहत कंप्यूटर कॉन्सेप्ट और डिजिटल साक्षरता का प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसे राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (नाइलेट) के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। संस्थान के कार्यकारी निदेशक नितिन पुरी ने विश्वास दिलाया कि उनका संस्थान इस प्रशिक्षण में पूरी निष्ठा से काम करेगा और कैदियों को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग देगा।
कारा महानिरीक्षक प्रणव कुमार ने इस पहल को विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक बताया है। उन्होंने कहा है कि कौशल विकास का यह प्रयास बंदियों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाने वाला है। इससे न केवल वे अपनी सजा के दौरान व्यस्त रहेंगे, बल्कि जेल से बाहर निकलने के बाद उन्हें रोजगार के अवसर भी मिल सकेंगे।
भविष्य की योजना के तहत राज्य की 41 जेलों में कंप्यूटर लैब स्थापित किया जाएगा, ताकि यह प्रशिक्षण व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जा सके। यह पहल कारावास को एक अवसर में बदलने की दिशा में बड़ा कदम है। ऐसे समय में जब डिजिटल इंडिया की बात हो रही है, बिहार की जेलें एक उदाहरण बनकर उभर रही हैं कि तकनीक से केवल भविष्य नहीं, बल्कि जीवन भी बदला जा सकता है।
बिहार सरकार की यह सोच वाकई काबिल-ए-तारीफ है, जो सजा को सुधार में बदलने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो न केवल राज्य, बल्कि देश के अन्य जेलों के लिए भी यह एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है।
