हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने दावा किया है कि एलसीए तेजस मार्क-1ए लड़ाकू विमान के लिए इंजन सप्लाई में अब स्थिरता आ गई है और निर्माण की रफ्तार तेज हो रही है। लंबे समय तक अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक से इंजन की आपूर्ति बाधित होने के कारण विमान निर्माण धीमा पड़ा था, लेकिन अब कंपनी को नियमित रूप से इंजन मिल रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि इस वर्ष के अंत तक भारतीय वायुसेना को कम से कम 10 एलसीए मार्क-1ए विमान सौंप दिए जाएंगे। आने वाले महीनों में सप्लाई की गति और बढ़ेगी और 2026 तक हर महीने दो इंजन उपलब्ध होने लगेंगे।
भारतीय वायुसेना ने पहले चरण में 83 एलसीए मार्क-1ए विमानों का ऑर्डर दिया था, जिनमें ट्रेनर और फाइटर दोनों मॉडल शामिल हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने एक और बड़ा अनुबंध मंज़ूर किया है, जिसके तहत 97 अतिरिक्त विमान बनाए जाएंगे। यह सौदा लगभग 62,000 करोड़ रुपये का है और इससे देश में स्वदेशी रक्षा निर्माण को जबरदस्त बल मिलेगा। इस तरह वायुसेना के पास कुल 180 से अधिक एलसीए मार्क-1ए विमान होंगे।
तेजस निर्माण में निजी उद्योग और एमएसएमई कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। हैदराबाद स्थित एक निजी कंपनी ने हाल ही में एलसीए का पहला फ्यूज़लेज असेंबली HAL को सौंपा, जिससे चौथी उत्पादन लाइन की शुरुआत हो चुकी है। पहले से बेंगलुरु और नासिक में तीन उत्पादन लाइनें संचालित हो रही थीं। इस कदम से उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और समय पर विमान उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
हालांकि यह रास्ता इतना आसान नहीं रहा। इंजन सप्लाई में रुकावटों की वजह से शुरुआत में निर्माण की गति बहुत धीमी रही और यहां तक कि वायुसेना प्रमुख ने सार्वजनिक रूप से HAL को फटकार भी लगाई थी कि वायुसेना को तत्काल नए विमानों की ज़रूरत है। वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास 31 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं जबकि आवश्यकता कम से कम 42 स्क्वाड्रन की है। इसी दबाव ने HAL को उत्पादन गति बढ़ाने के लिए प्रेरित किया और अब कंपनी ने वादा किया है कि सालाना 16 से 24 विमान वायुसेना को सौंपे जाएंगे।
एलसीए तेजस मार्क-1ए भारतीय आत्मनिर्भरता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की एक बड़ी सफलता है। इस विमान में लगभग 70 प्रतिशत हिस्से देश में ही तैयार किए जाते हैं और लगातार इसमें स्वदेशी तकनीक का दायरा बढ़ाया जा रहा है। हल्के लेकिन आधुनिक सुविधाओं से लैस यह विमान भारतीय वायुसेना की ताक़त को नई दिशा देगा और आने वाले वर्षों में पड़ोसी देशों की किसी भी चुनौती का सामना करने में निर्णायक साबित होगा।
