हाईकोर्ट का अहम फैसला - पत्नी द्वारा बार-बार ससुराल छोड़ना और शिकायतें करना - “क्रूरता है”

Jitendra Kumar Sinha
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अहम पारिवारिक विवाद के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी बिना ठोस कारण और बिना पति की सहमति के बार-बार ससुराल छोड़ती है तथा पति और उसके परिवारजन के खिलाफ निरंतर शिकायतें दर्ज कराती है, तो यह वैवाहिक जीवन में क्रूरता (Cruelty) की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में पति को तलाक का अधिकार मिल सकता है।

यह विवाद सतीश कुमार और उनकी पत्नी धनवती से जुड़ा हुआ है। सतीश कुमार ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी बिना बताए बार-बार घर छोड़ देती थी। इतना ही नहीं, उसने ससुराल वालों के खिलाफ झूठे मामले भी दर्ज कराए। पति ने अदालत में यह दलील दी कि पत्नी का यह व्यवहार न केवल विवाहिक संबंधों में तनाव पैदा करता है, बल्कि वैवाहिक जीवन की शांति और आपसी विश्वास को भी नष्ट करता है।

पारिवारिक अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पति के तलाक की अर्जी को मंजूर कर लिया था। इसके खिलाफ धनवती ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। उसने दावा किया कि ससुराल वालों ने उसके साथ क्रूरता की है। हालांकि, वह अदालत में अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने पारिवारिक अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा है कि वैवाहिक जिम्मेदारियों से बार-बार अनुपस्थित रहना पति-पत्नी के बीच विश्वास को तोड़ता है। ससुराल वालों के खिलाफ निराधार शिकायतें करना मानसिक प्रताड़ना का रूप है। वैवाहिक साहचर्य से वंचित रखना यानि पति-पत्नी के बीच अंतरंगता और साथ रहने से लगातार इनकार करना, वैवाहिक क्रूरता का चरम है। कोर्ट ने माना है कि इस मामले में पत्नी का आचरण पति के लिए मानसिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर कष्टकारी था, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

भारतीय कानून में "क्रूरता" सिर्फ शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। अदालतें कई बार यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि मानसिक उत्पीड़न, निरंतर झगड़े, फर्जी मुकदमे दर्ज कराना, वैवाहिक जिम्मेदारियों से दूरी बनाना, भी क्रूरता के दायरे में आता है। इस फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित किया कि विवाह सिर्फ एक सामाजिक बंधन नहीं है, बल्कि इसमें जिम्मेदारियों और आपसी सम्मान का निर्वाह भी अनिवार्य है।

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन दंपतियों के लिए एक नजीर है, जिनके बीच छोटे-छोटे विवाद तलाक तक पहुँच जाते हैं। अदालत ने यह संदेश दिया है कि विवाह में विश्वास, साथ और जिम्मेदारी बेहद जरूरी हैं। यदि इनमें से किसी भी पक्ष की ओर से लगातार लापरवाही या दुर्व्यवहार किया जाता है, तो इसे क्रूरता माना जाएगा और पीड़ित पक्ष को तलाक का अधिकार मिलेगा। यह निर्णय न केवल पारिवारिक न्यायालयों के लिए मार्गदर्शक है बल्कि समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि वैवाहिक संबंधों में पारदर्शिता और सहयोग बनाए रखना आवश्यक है।



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