इंद्राक्षी शक्तिपीठ (देवी सती के पायल गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारतवर्ष और भारतीय संस्कृति की सबसे अद्भुत धरोहरों में से एक है 51 शक्तिपीठ। यह केवल धार्मिक स्थलों की शृंखला नहीं है, बल्कि यह मातृशक्ति के अवतरण, उनकी महिमा और अनंत ऊर्जा के प्रतीक स्थल हैं। इन्हीं शक्तिपीठों में एक महत्वपूर्ण और रहस्यमयी शक्तिपीठ है “इंद्राक्षी शक्तिपीठ”, जो श्रीलंका के त्रिंकोमाली में स्थित है। यहाँ माता सती की पायल गिरी थी। इस पीठ पर माता का नाम इंद्राक्षी और भैरव का नाम राक्षसेश्वर है। यह स्थल हिन्दू आस्था, पौराणिक गौरव और सांस्कृतिक समरसता का अद्भुत संगम है।

शक्तिपीठों का उद्गम माता सती और भगवान शिव की कथा से जुड़ा हुआ है। जब पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर सती ने योगाग्नि में आत्मदाह कर लिया, तो भगवान शिव शोकाकुल होकर उनके शरीर को लेकर आकाशमार्ग में विचरण करने लगे। भगवान विष्णु ने सृष्टि संतुलन हेतु अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग-प्रत्यंग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिराए। जहाँ-जहाँ यह अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ की स्थापना हुई।

इन्हीं स्थलों में से एक है त्रिंकोमाली का “इंद्राक्षी शक्तिपीठ”, जहाँ माता की पायल गिरी। पायल स्वयं नारी-सौंदर्य, सुगंध और सौम्यता का प्रतीक है। अतः इस पीठ की शक्ति भी कोमलता, आकर्षण, सामंजस्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा हुआ माना जाता है।

श्रीलंका का त्रिंकोमाली नगर एक प्राचीन और महत्वपूर्ण बंदरगाह नगर है। यह स्थान हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म और स्थानीय परंपराओं में विशेष महत्व रखता है। त्रिंकोमाली में स्थित त्रिकोणेश्वर मंदिर भगवान शिव का एक प्राचीनतम मंदिर है। इसी के समीप  “इंद्राक्षी शक्तिपीठ” का वास माना जाता है।

त्रिंकोमाली का तट हिंद महासागर से घिरा हुआ है और यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य इस स्थान की धार्मिकता को और अधिक भव्यता प्रदान करता है। समुद्र की गूँज और लहरों की आवाज के बीच इंद्राक्षी शक्तिपीठ का दर्शन करना साधक को आत्मिक शांति और शक्ति प्रदान करता है।

हर शक्तिपीठ में माता और भैरव का युग्म होता है। माता की शक्ति ऊर्जा का रूप होता है तो भैरव उस ऊर्जा के रक्षक और संतुलक माने जाते हैं। यहाँ माता का स्वरूप इंद्राक्षी कहलाता है। इंद्राक्षी का अर्थ है "इंद्रियों पर शासन करने वाली"। यह रूप साधक को इंद्रिय संयम, आत्मबल और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। इस पीठ के भैरव को राक्षसेश्वर कहा गया है। यह नाम संकेत करता है कि यहाँ भैरव राक्षसों के नाशक और अधर्मियों का संहार करने वाले स्वरूप में हैं।

इंद्राक्षी माता साधक को अपने मन, वाणी और कर्म पर संयम रखने की प्रेरणा देती हैं। त्रिंकोमाली समुद्र के निकट स्थित है, इसलिए यहाँ का वातावरण साधकों को विशालता और उदारता का अनुभव कराता है। मान्यता है कि इंद्राक्षी शक्तिपीठ का दर्शन करने से साधक के जीवन में शांति, वैभव और सुकून प्राप्त होता है।

त्रिकोणेश्वर मंदिर भगवान शिव का एक प्राचीन और पूजनीय धाम है। यह मंदिर समुद्र तट पर स्थित होने के कारण अपने आप में अनूठा है।  “इंद्राक्षी शक्तिपीठ” इसी मंदिर के आसपास स्थित है, जिससे यह स्थान शिव-शक्ति के संयुक्त स्वरूप का अद्वितीय केंद्र बन जाता है। कहा जाता है कि यहाँ शिव और शक्ति का संयुक्त पूजन करने से साधक को मोक्ष प्राप्त होता है। 

श्रीलंका प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म का एक प्रमुख केंद्र रहा है। रामायण काल से लेकर चोल राजाओं तक, इस भूमि ने भारतीय संस्कृति और धर्म को अपनाया है। त्रिंकोमाली और  “इंद्राक्षी शक्तिपीठ” इस सांस्कृतिक धरोहर के प्रमाण हैं।

रामायण में वर्णन मिलता है कि भगवान राम ने भी श्रीलंका में कई स्थानों पर पूजा-अर्चना किया था। इसी तरह, त्रिकोणेश्वर और इंद्राक्षी का संबंध भारतीय सांस्कृतिक विस्तार से गहराई से जुड़ा हुआ है।

“इंद्राक्षी शक्तिपीठ” स्थल समुद्र तट पर स्थित होने के कारण अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा है। यहाँ माता का स्वरूप इंद्रियों पर विजय दिलाने वाला है। भैरव का स्वरूप राक्षसों और अधर्मियों का संहारक माना जाता है। यहाँ दर्शन करने से साधक के जीवन में संतुलन और सामंजस्य आता है।

“इंद्राक्षी शक्तिपीठ” की यात्रा एक आध्यात्मिक अनुभव है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु माता और भैरव की पूजा अर्चना करते हैं। माता इंद्राक्षी का पूजन में माता को सुगंधित पुष्प, पायल और चूड़ियाँ अर्पित किया जाता है। भैरव पूजन में राक्षसेश्वर भैरव की पूजा रात्रि में विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु समुद्र स्नान कर शुद्ध होकर माता के दर्शन करते हैं।

“इंद्राक्षी शक्तिपीठ” केवल धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारत और श्रीलंका के सांस्कृतिक रिश्तों का प्रतीक भी है। यह स्थान दर्शाता है कि हिन्दू धर्म का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि समुद्र पार भी इसकी जड़ें गहराई से फैली हुई हैं।

“इंद्राक्षी शक्तिपीठ” की यात्रा करने वाला साधक मानसिक शांति प्राप्त करता है। भौतिक जीवन में संतुलन और समृद्धि पाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा प्राप्त करता है।

“इंद्राक्षी शक्तिपीठ” केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह शक्ति और भक्ति का संगम है। यह स्थान बताता है कि शक्ति बिना शिव अधूरी है और शिव बिना शक्ति निरर्थक हैं। श्रीलंका के त्रिंकोमाली में स्थित यह शक्तिपीठ भारतीय संस्कृति की अनूठी धरोहर है, जो हर साधक को अपने जीवन में संयम, संतुलन और सामंजस्य स्थापित करने का संदेश देता है।



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