महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के श्रृंगार में उपयोग होने वाले भांग को किया गया कम

Jitendra Kumar Sinha
0

 




उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का नाम लेते ही आस्था, भक्ति और शिवत्व की अनुभूति मन में जागृत हो उठता है। बाबा महाकाल, बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र हैं। उनकी भस्म आरती और दिव्य श्रृंगार, श्रद्धालुओं को अद्वितीय अनुभव कराता है। प्रतिदिन हजारों भक्त देश और विदेश से यहां दर्शन करने आते हैं और बाबा के विभिन्न रूपों को निहारकर आत्मिक संतोष पाते हैं।

किन्तु हाल के वर्षों में बाबा महाकाल के शिवलिंग पर क्षरण की समस्या सामने आई है। पुरातत्व और भूवैज्ञानिक विशेषज्ञों ने पाया कि लगातार भस्म रगड़ने, पूजा सामग्री चिपकने और अत्यधिक स्पर्श के कारण शिवलिंग पर छोटे-छोटे छिद्र उत्पन्न हो रहे हैं। इन छिद्रों में नमी और जैविक पदार्थ जमा होने से बैक्टीरिया पनपते हैं, जिससे शिवलिंग की पवित्रता और स्थायित्व को खतरा पहुंच रहा है।

यही कारण है कि मंदिर प्रशासन ने हाल ही में बाबा महाकाल के श्रृंगार से जुड़ी परंपराओं में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सबसे प्रमुख निर्णय है ‘भांग की मात्रा में कमी’, ताकि शिवलिंग पर होने वाले क्षरण को रोका जा सके।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान रखता है। मान्यता है कि यहां स्वयं भगवान शिव काल के अधिपति के रूप में विराजमान हैं, जो भक्तों को मृत्यु और भय से मुक्त करते हैं। महाकाल की भस्म आरती, विश्व की अद्वितीय परंपरा है, जिसमें शिव को अग्नि और भस्म के साथ अनंत रूप में पूजित किया जाता है। 

महाकाल मंदिर उज्जैन की पहचान और भारत की प्राचीन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। सिंहस्थ कुम्भ जैसे पर्वों में महाकाल मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहां के श्रृंगार और आरतियां कला, संस्कृति और लोक परंपरा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने हाल ही में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार किया है। रिपोर्ट के अनुसार,  प्रतिदिन की भस्म आरती में शिवलिंग पर भस्म लगाने और बार-बार रगड़ने से सतह पर छिद्र उत्पन्न हो रहा है।  भांग, दूध, दही, शहद, फल और सूखे मेवे जैसे जैविक पदार्थ शिवलिंग पर टिक जाते हैं। पूरी तरह साफ न होने पर ये कण नमी में बैक्टीरिया को जन्म देता है। प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु जलाभिषेक और पूजा के दौरान शिवलिंग को स्पर्श करते हैं। लगातार संपर्क से भी पत्थर की सतह पर असर पड़ता है। जैविक कण और नमी के कारण सूक्ष्म जीवाणु पत्थर की संरचना में प्रवेश कर रहे हैं, जो लंबे समय में शिवलिंग को कमजोर बना सकता है।

क्षरण रोकने के लिए प्रशासन ने कई बदलाव किया है। पहले श्रृंगार में 5 से 7 किलो भांग का उपयोग होता था। अब इसे घटाकर अधिकतम 3 किलो कर दिया गया है। मंदिर में तोला-कांटा लगाया गया है ताकि भांग का वजन किया जा सके। भांग सीधे शिवलिंग की सतह पर अधिक मात्रा में न लगाकर, नियंत्रित रूप से उपयोग किया जाएगा। इससे श्रृंगार की परंपरा भी निभेगी और क्षरण का खतरा भी घटेगा। पुजारी अब श्रृंगार के दौरान निर्धारित सीमा का पालन करेंगे। श्रृंगार से पहले सभी सामग्री का वजन और परीक्षण किया जाएगा। श्रृंगार कराने वाले भक्तों के नाम की रसीद और बोर्ड पर उल्लेख होगा। भक्त केवल नंदी हॉल से श्रृंगार और आरती देख सकेंगे।

श्रृंगार केवल भक्ति नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक अनुष्ठान है। महाकाल को गणेश, श्रीकृष्ण, बालाजी, हनुमानजी, शेषनाग, तिरुपति आदि रूपों में सजाया जाता है। विवाह वर्षगांठ, जन्मदिन या विशेष तिथि पर भक्त अपने नाम से श्रृंगार करा सकते हैं। श्रृंगार कराने के लिए 1100 रुपये की शासकीय रसीद कटाई जाती है। इसमें वस्त्र, आभूषण, सूखे मेवे, भांग और अन्य पूजन सामग्री शामिल होता है। कुल खर्च लगभग 5-6 हजार रुपये तक आता है। श्रृंगार के समय भक्तों को नंदी हॉल में बैठकर आरती और दर्शन का अनुमति मिलता है। यह अनुभव भक्तों के लिए जीवन भर की अमूल्य स्मृति बन जाता है। भांग और भस्म महाकाल का अनूठा पहचान है। इन परंपराओं से जुड़ी आस्था भक्तों के लिए अटूट है।

यदि शिवलिंग क्षतिग्रस्त होता है तो यह पूरे देश की धार्मिक धरोहर के लिए खतरा है। परंपरा तभी तक सार्थक है जब तक उसकी पवित्रता और स्थायित्व बना रहे। परंपरा को बनाए रखते हुए, वैज्ञानिक सुझावों को अपनाना जरूरी है। प्रशासन का निर्णय इस संतुलन की ओर एक कदम है। मंदिर प्रशासक प्रथम कौशिक ने स्पष्ट कहा है कि अब अधिकतम 3 किलो भांग का ही उपयोग होगा। पुजारी पंडित राम शर्मा का कहना है कि महाकाल निराकार हैं, उन्हें विभिन्न रूपों में सजाना भक्तों के लिए दर्शन को साकार बनाना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए महाकाल की पवित्रता और अस्तित्व को सुरक्षित रखेगा।

भक्तों के बीच इस निर्णय को लेकर मिश्रित भावनाएं देखने को मिल रहा है। कुछ ने कहा कि परंपरा में बदलाव आस्था को चोट पहुंचाता है। वहीं अधिकांश भक्तों ने इसे आवश्यक कदम बताते हुए समर्थन किया है। उनका मानना है कि अगर परंपरा थोड़ी बदले भी तो भी शिवलिंग का अस्तित्व बचाना सर्वोपरि है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और इतिहास का अद्वितीय संगम है। यहां की भस्म आरती और श्रृंगार परंपरा सदियों से भक्तों को आकर्षित करता रहा है। लेकिन समय के साथ यह भी आवश्यक है कि परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें और धरोहर की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएं। भांग की मात्रा में कमी एक छोटा सा परिवर्तन है, किंतु इसका उद्देश्य बहुत बड़ा है, बाबा महाकाल की पवित्रता और स्थायित्व को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top