शारदीय नवरात्र 2025 - कलश स्थापना और माँ शैलपुत्री की आराधना

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारत की संस्कृति और परंपराओं में देवी-उपासना का विशेष स्थान है। शक्ति की आराधना, साधना और उपासना का पर्व है नवरात्र। वर्ष भर में चार बार नवरात्र आते हैं – चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं जबकि दो अन्य गुप्त नवरात्र साधकों के लिए विशेष होते हैं। इस वर्ष शारदीय नवरात्र 22 सितम्बर 2025, सोमवार से प्रारंभ हो रहे हैं। प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना और प्रथम दिवस माँ शैलपुत्री की पूजा-अर्चना से नवरात्र का शुभारंभ होगा। यह नौ दिवसीय पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नवरात्र का अर्थ है – नौ रातें। इन नौ रातों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना की जाती है। यह पर्व आत्मशुद्धि, साधना, तप और संयम का प्रतीक है। भक्तगण अपने जीवन में ऊर्जा, शक्ति, ज्ञान और सद्बुद्धि की प्राप्ति के लिए देवी की आराधना करते हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित है कि नवरात्र का प्रत्येक दिन एक विशेष देवी को समर्पित होता है। इस प्रकार से साधक क्रमशः नवदुर्गा की साधना करते हैं और अंततः विजयदशमी के दिन देवी की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

कलश स्थापना को नवरात्र का आधार माना गया है। यह घट-स्थापना ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आमंत्रित करने की प्रक्रिया है। कलश को स्वयं ब्रह्मांड का प्रतीक कहा गया है। इसके शीर्ष पर रखा नारियल देवत्व और समृद्धि का प्रतीक है, आम्रपल्लव हरितिमा और विकास का द्योतक हैं तथा कलश में भरा जल जीवन और ऊर्जा का प्रतीक है।

कलश की स्थापना सदैव पूजा घर के ईशान कोण यानि उत्तर-पूर्व दिशा में करनी चाहिए। यह दिशा देवताओं की दिशा माना जाता है और यहीं से सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है। कलश स्थापना में सबसे पहले पूजा स्थान को शुद्ध करके गंगाजल का छिड़काव करना चाहिए। चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर मिट्टी रखकर उसमें जौ बोना चाहिए। उसके बाद मिट्टी के ऊपर जल से भरा हुआ कलश स्थापित कर, कलश के ऊपर आम्रपल्लव और नारियल रखना चाहिए। कलश पर स्वस्तिक बनाकर मौली बांधना चाहिए। देवी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।




नवरात्र के पहले दिन देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। ‘शैल’ का अर्थ है पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ है पुत्री। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है। माँ शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत मनोहारी है। वे नंदी बैल पर सवार रहती हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल होता है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र शोभित है। यह स्वरूप शक्ति, साहस और संयम का प्रतीक है।

पौराणिक कथा के अनुसार, माँ शैलपुत्री पूर्वजन्म में सती थीं। सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सह न पाने के कारण योगाग्नि से अपने प्राण त्याग दिए। अगले जन्म में वे हिमालय की पुत्री के रूप में अवतरित हुईं और ‘शैलपुत्री’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।

माँ शैलपुत्री की उपासना से साधक ‘मूलाधार चक्र’ को जाग्रत करते हैं। योगशास्त्र के अनुसार, यही साधना का प्रथम चरण होता है। साधक अपने मन को स्थिर करके आत्मबल और जीवनशक्ति की प्राप्ति करता है।

माँ शैलपुत्री की पूजा के लिए सबसे पहले स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर, पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर, कलश स्थापना के बाद माँ शैलपुत्री की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जला कर, उन्हें लाल पुष्प, अक्षत, दुर्गा सप्तश्लोकी, और सुगंध अर्पित करना चाहिए। इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य और आरती अर्पित कर, माँ शैलपुत्री का ध्यान करके उनका मंत्र  "ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः" का जप करना चाहिए। 

माँ शैलपुत्री की आराधना करने से जीवन में स्थिरता और आत्मबल की प्राप्ति होती है। परिवारिक जीवन में सुख-शांति। मानसिक शांति और संयम तथा योग साधना का प्रथम चरण सिद्ध होता है।

नवरात्र में संयमित भोजन का विशेष महत्व होता है। भक्त पूरे नौ दिनों तक व्रत रखकर आत्मशुद्धि करते हैं। केवल गंगाजल और दूध का सेवन करना श्रेष्ठ माना गया है। कागजी नींबू का उपयोग भी किया जा सकता है। फलाहार पर रहना उत्तम होता है। यदि संभव न हो तो शाम को अरवा चावल, सेंधा नमक, चने की दाल और घी से बनी सब्जी का सेवन किया जा सकता है। 

नवरात्र केवल देवी-पूजन का पर्व नहीं है, बल्कि यह स्त्री-शक्ति के सम्मान का पर्व है। यह त्योहार समाज को यह संदेश देता है कि शक्ति और धैर्य से हर विपत्ति का सामना किया जा सकता है। माँ शैलपुत्री के रूप में पर्वत की स्थिरता और दृढ़ता का संदेश मिलता है।

22 सितम्बर 2025 से प्रारंभ हो रहे शारदीय नवरात्र का प्रथम दिवस माँ शैलपुत्री को समर्पित है। कलश स्थापना और माँ की विधिपूर्वक आराधना करने से साधक के जीवन में सुख, शांति और आत्मबल का संचार होता है। नवरात्र केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मकता, शक्ति और साहस जगाने का अवसर है।



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