प्यार, शक और साजिश पर आधारित है फिल्म - ‘साली मोहब्बत’

Jitendra Kumar Sinha
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हिन्दी सिनेमा में सस्पेंस-थ्रिलर की दुनिया अब तेजी से परिपक्व हो रही है और इसी कड़ी में एक दमदार फिल्म के रूप में सामने आती है ‘साली मोहब्बत’। यह फिल्म न सिर्फ अपराध की कहानी कहती है, बल्कि रिश्तों के भीतर छिपे अंधेरे को भी बेनकाब करती है। छोटे शहर की एक साधारण-सी दिखने वाली गृहिणी की जिंदगी कैसे एक रहस्यमय भंवर में फंस जाती है, यही इस फिल्म का मूल आधार है।


फिल्म की कहानी स्मिता (राधिका आप्टे) के इर्द-गिर्द घूमती है। बाहर से शांत, जिम्मेदार और घरेलू नजर आने वाली स्मिता की जिंदगी उस वक्त उलट-पुलट हो जाती है, जब वह एक नहीं बल्कि दोहरी हत्या के जाल में उलझ जाती है। पुलिस जांच, समाज की निगाहें और रिश्तों का दबाव, इन सबके बीच स्मिता खुद से भी लड़ती नजर आती है। दर्शक लगातार इस दुविधा में रहते हैं कि क्या स्मिता वाकई अपराधी है या फिर किसी बड़ी साजिश का शिकार?


‘साली मोहब्बत’ सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है, बल्कि यह रिश्तों की उस जटिल संरचना को दिखाती है, जहां प्यार, लालच, ईर्ष्या और धोखा एक-दूसरे से गुथे हुए हैं। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या रिश्तों में सच्चाई कभी पूरी तरह सामने आ पाती है? या फिर हर मुस्कान के पीछे कोई राज छिपा होता है?


कहानी में बेवफाई और विश्वासघात को बेहद सूक्ष्म तरीके से बुना गया है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, हर किरदार पर शक गहराता जाता है। यही सस्पेंस फिल्म को अंत तक बांधे रखता है।


राधिका आप्टे ने स्मिता के किरदार में एक बार फिर साबित किया है कि वह जटिल और मनोवैज्ञानिक भूमिकाओं की मास्टर हैं। उनके चेहरे के भाव, आंखों की बेचैनी और भीतर चल रही उथल-पुथल दर्शक तक सीधे पहुंचती है। दिव्येंदु शर्मा अपने किरदार में रहस्यमय प्रभाव छोड़ते हैं, जबकि अनुराग कश्यप की मौजूदगी कहानी को और गहराई देती है। शरत सक्सेना और कुशा कपिला जैसे कलाकार सहायक भूमिकाओं में कहानी को मजबूती प्रदान करते हैं।


निर्देशक टिस्का चोपड़ा ने इस फिल्म को बेहद नियंत्रित और परिपक्व अंदाज में पेश किया है। उन्होंने सस्पेंस को शोर में नहीं बदला, बल्कि मनोवैज्ञानिक तनाव के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया है। छोटे शहर का माहौल, सीमित लोकेशन और धीमी लेकिन सटीक गति फिल्म को और प्रभावी बनाता है।



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