हल्की-फुल्की, मनोरंजन से भरपूर और थोड़ी हटकर कहानी वाली फिल्मों के शौकीनों के लिए “घरवाली पेड़वाली” एक मजेदार सिनेमाई अनुभव लेकर आती है। यह सुपरनेचुरल कॉमेडी फिल्म बनारस की चहल-पहल, उसके लोककथाओं और वहां की अनोखी मान्यताओं को हास्य के साथ परोसती है। फिल्म की थीम जितनी विचित्र लगती है, उसका प्रस्तुतीकरण उतना ही हंसी से भरपूर है।
कहानी के केंद्र में है जीतू पांडे, एक सीधा-सादा युवक जिसकी कुंडली में भारी दोष निकल आता है। दोष मिटाने का एक ही उपाय बताया जाता है, पीपल के पेड़ से शादी। मजबूरन जीतू इस अनोखी शादी के लिए राजी हो जाता है। लेकिन उसकी जिन्दगी की असली ‘स्टार्टिंग’ तो तब होती है, जब वह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं रहता है, बल्कि उसकी पहली पत्नी बनकर सामने आती है “भूतनी लतिका”।
लतिका खूबसूरत भी है और डरावनी भी, मगर असल में वह उससे ज्यादा शरारती और प्यारी है। इंसानी पत्नी और ‘पेड़वाली’ पत्नी के बीच जीतू का फंसना हंसी का तूफान पैदा कर देता है। हर दिन कोई नया बखेड़ा, कोई नई गलतफहमी और कोई नया कॉमिक सीन बनारस की तंग गलियों में हलचल मचा देता है।
फिल्म की जान इसके कलाकारों की परफॉर्मेंस है। पारस अरोड़ा ने जीतू के किरदार में मासूमियत और मजाकिया भावों का बेहतरीन मिश्रण पेश किया है। निहारिका रॉय और प्रियंवदा कांत अपने-अपने किरदारों में ताजगी लाती हैं, वहीं सीरत कपूर और ऋचा सोनी कहानी में और रंग भरती हैं। हर कलाकार अपनी भूमिका में फिट बैठता है और हास्य का कोई मौका नहीं छोड़ता है।
आशीष खुराना और जेक्सन सेठी का निर्देशन फिल्म को हल्का, तेज और मनोरंजक बनाए रखता है। बनारस की लोकेशन, वहां का बोली-बानी वाला स्वाद और लोककथाओं का तड़का, सब मिलकर एक आकर्षक माहौल बनाता है।
यदि परिवार के साथ देखने लायक हल्की और मजेदार फिल्म चाहते हैं। अगर सुपरनेचुरल तत्वों से भरी कॉमेडी पसंद है। अगर बनारस की चटपटी बोली और मजेदार घटनाओं में हंसी ढूंढते हैं। तो “घरवाली पेड़वाली” एक ऐसी फिल्म है जो गंभीरता से ज्यादा हंसी, हल्के-फुल्के रोमांस और मनोरंजन पर जोर देती है। विचित्र कहानी, मजे से भरे ट्विस्ट और हास्य के साथ यह फिल्म दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है।
