“अंबिका शक्तिपीठ” (देवी सती का बाएँ पैर की चार अंगुलियाँ गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना 

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति की उपासना उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं संस्कृति। माँ दुर्गा का स्वरूप अनंत है, और उनके 51 शक्तिपीठ देवी के अंगों की दिव्य ऊर्जा के प्रत्यक्ष प्राकट्य-स्थान माना जाता है। इन्हीं पावन स्थानों में राजस्थान के अलवर जिला के विराट नगर कस्बा में स्थित “अंबिका शक्तिपीठ” एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारिक स्थल है। यह वही पवित्र धरा है जहाँ माँ सती के बाएँ पैर की चार अंगुलियाँ गिरी थी और यहीं देवी का स्वरूप “अंबिका” तथा भैरव का नाम “अमृत” माना जाता है।

अरावली पर्वतशृंखला की शांत, घनी, रहस्यमय पहाड़ियों के बीच अवस्थित यह शक्तिपीठ आध्यात्मिक साधकों, इतिहासकारों, तीर्थयात्रियों और पुरातत्वविदों, सभी के लिए अनोखी आकांक्षा का केन्द्र रहा है। राजस्थान के वीर-धरा के तेज में माँ अंबिका का ओज और भी प्रखर प्रतीत होता है। यहाँ आकर लगता है जैसे समय रुक गया है, जैसे हजारों वर्षों की गाथाएँ हवा में गूँज रही हों। माँ अंबिका का यह स्थान न केवल पुराणों में वर्णित है, बल्कि स्थानीय किंवदंतियाँ, लोक-विश्वास, शिलालेख और पुरातन अवशेष इसकी प्राचीनता को और अधिक प्रमाणिक बनाता है।

राजस्थान का विराट नगर, जिसे प्राचीन काल में वीराटनगरी कहा जाता था, स्वयं में ऐतिहासिक धरोहर है। यह वही नगर है जहाँ पांडवों ने अज्ञातवास व्यतीत किया था। इसी पावन भूमि के आसपास अरावली की पर्वत श्रृंखला फैली हुई है, और इन्हीं प्राकृतिक पहाड़ियों की गोद में स्थित है “अंबिका शक्तिपीठ” का पावन धाम।

अरावली पर्वत भारत के सबसे प्राचीन पर्वत माना जाता है। यहाँ की चट्टानें करोड़ों वर्ष पुरानी हैं, और इन्हीं शिलाओं के मध्य देवी का यह प्राकट्य स्थान स्थित है। अंबिका मंदिर तक पहुँचते हुए जो नैसर्गिक शांति, निर्मलता और दिव्यता अनुभव होती है, वह साधारण नहीं है। जगह-जगह प्राकृतिक सुरंगें, छोटे-छोटे कंदराएँ, प्राचीन मूर्तियाँ और अनगिनत वनस्पतियाँ इस क्षेत्र को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत ऊर्जावान बनाती हैं।

यह क्षेत्र बौद्ध, हिन्दू और जैन, तीनों धर्मों का प्राचीन केन्द्र रहा है। यहाँ गुप्तकालीन गुफाएँ, शुंग और मौर्य काल की उपस्थिति, राजा वीराटक के अवशेष और पुराणों में वर्णित घटनाओं के स्थल, तीर्थयात्रियों को एक अद्भुत आध्यात्मिक-ऐतिहासिक अनुभूति प्रदान करता है। इसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर अंबिका माँ का शक्तिपीठ होना इसकी महिमा को और बढ़ाता है।

“अंबिका शक्तिपीठ” का मूल आधार वह अविस्मरणीय पौराणिक घटना है जिसमें माँ सती ने आत्मदाह किया और भगवान शिव तांडव में पृथ्वी पर विचरने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के खंड किए जिससे विभिन्न स्थानों पर देवी के अंग गिरे और वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए। यहाँ माँ सती के बाएँ पैर की चार अंगुलियाँ गिरी। इसलिए यह स्थान ऊपरी अंगों की ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। यह तेज, बल, साहस, आत्मविश्वास और मार्गदर्शन की शक्ति प्रदान करने वाला तीर्थ माना जाता है। 

शक्ति का नाम है "अंबिका" "अंबिका" का अर्थ होता है माँ, पोषक, रक्षक और सार्वभौमिक आधार। यह वही स्वरूप है जो देवताओं की सैन्यशक्ति को संरक्षित करता है और राक्षसी शक्तियों का संहार करती है।

यहाँ के भैरव का नाम “अमृत” है। अर्थात जो जीवन देता है, जो अमरत्व का प्रतीक है, जो साधकों के लिए ऊर्जा का स्रोत है। शास्त्रों में कहा गया है कि "शक्ति बिना भैरव शून्य, भैरव बिना शक्ति निर्जीव।" अंबिका एव अमृत भैरव की यह दिव्य जोड़ी आध्यात्मिक उन्नति के लिए अद्वितीय माना जाता है।

“अंबिका शक्तिपीठ” में स्थापित देवी का स्वरूप अत्यंत अनोखा है। उनका रूप मातृत्व, शक्ति, सौम्यता और ओज, चारों का सम्मिश्रण है। देवी की मूर्ति श्याम वर्ण, अर्ध-उग्र, अर्ध-शांत भाव, चार भुजाएँ, हाथों में त्रिशूल, कमल, वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा, सिंह वाहन संलग्न भावना।  

यह स्थान साधकों के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है क्योंकि यह ‘शक्ति-चक्र’ (ऊर्जा-चक्र) का एक मुख्य केंद्र माना गया है। जो भी साधक अंबिका माता के दर्शन कर अपने संकल्प की प्रार्थना करता है, उसका मार्ग अवश्य प्रशस्त होता है। माँ पैर के अंगुलियों का प्रतीक होने के कारण सही दिशा, सही निर्णय, सही पथ देने वाली देवी मानी जाती हैं।

“अंबिका शक्तिपीठ” का इतिहास बहुत विस्तृत है। यहाँ समय-समय पर अनेक आचार्यों, राजाओं और संतों ने तपस्या की। कालिका पुराण, देवी भागवत, तंत्र-चूड़ामणि और शक्ति-संगम तंत्र में इसका उल्लेख मिलता है। कहा गया है कि “जहाँ सती के पादांगुलि पातित हुई, वहाँ अंबिका महाशक्ति स्वयं प्रकाशमान है।”


महाभारत के अज्ञातवास प्रसंग में भी अंबिका देवी का उल्लेख मिलता है। कई विद्वानों के अनुसार, पांडवों ने भी इस स्थान पर श्रद्धा अर्पित की थी। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस पहाड़ी पर कई ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किए। एक कथा यह भी प्रसिद्ध है कि प्राचीन काल में एक तपस्वी को माँ अंबिका ने स्वयं दर्शन देकर इस स्थान के संरक्षण का आदेश दिया था। विराट नगर क्षेत्र में बौद्ध गुफाएँ, स्तूप और जैन मूर्तियाँ भी हैं, जो दर्शाता है कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों तक आध्यात्मिक केंद्र रहा है। यह मिश्रित परंपरा अंबिका मंदिर को और भी अद्वितीय बनाती है।

“अंबिका शक्तिपीठ” का मंदिर प्राकृतिक चट्टानों के बीच बना है। यहाँ बड़े-बड़े पत्थर, संकरी कंदराएँ, गुफानुमा गलियारा, पहाड़ी पथ मंदिर को रहस्यपूर्ण और दिव्य अनुभव प्रदान करता है। मंदिर का प्रवेश द्वार प्राचीन शैली का है। गर्भगृह चट्टान के भीतर स्थित है। भैरव मंदिर थोड़ी दूरी पर स्थित है। पर्वत-शिखर पर स्थित होने से वातावरण अत्यंत शांत और ऊर्जावान है। साधक बताते हैं कि गर्भगृह में जाते ही सिर के मध्य भाग (आज्ञा-चक्र) में हल्की कंपन की अनुभूति होती है। इसे तांत्रिक परंपरा में ‘शक्तिपात’ कहा गया है।

भारत के प्रत्येक शक्तिपीठ की तरह “अंबिका शक्तिपीठ” से भी कई चमत्कारिक घटनाएँ जुड़ी हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि किसी भी संकट में देवी से सच्चे मन से प्रार्थना करने पर समाधान अवश्य मिलता है। कई श्रद्धालु दावा करते हैं कि माँ की कृपा से असाध्य रोगों से भी उन्हें राहत मिली है। पहाड़ियों पर कभी-कभी रात में हल्की तेजस्वी ज्योति दिखाई देने की बातें लोककथाओं में मिलती हैं।

“अंबिका शक्तिपीठ” तांत्रिक परंपरा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ नवरात्रों में विशेष अनुष्ठान किया जाता है। साधक यहाँ शक्तिपात, कुंडलिनी जागरण, मंत्र जाप, सिद्धि साधना करते है। माँ अंबिका के यहाँ अनेक सिद्ध योगी और तांत्रिक आज भी साधना करते हैं। भैरव साधना का यह स्थान अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। विशेषकर अष्टमी और कच्ची अमावस्या पर यहाँ साधकों का जमावड़ा लगता है।

अंबिका शक्तिपीठ के आसपास कई ऐतिहासिक स्थल हैं “भीमगुहा”- कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय भीम यहाँ रहते थे। “बौद्ध स्तूप”- सम्राट अशोक के काल के होने का दावा किया जाता है। “जैन मंदिर एव मूर्तियाँ”- शांतिनाथ और अन्य तीर्थंकरों की मूर्तियाँ हैं। “गुफाएं एवं प्राचीन किले के अवशेष”- यहाँ राजपूत और प्राचीन आर्यकाल दोनों की छाप मिलती है। “अंबिका शक्तिपीठ” इन सभी धरोहरों का आध्यात्मिक केंद्र सा प्रतीत होता है।

नवरात्र, चैत्र-अष्टमी, दीपावली और शिवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु आते हैं। सीढ़ियाँ, पथ प्रकाश, सुरक्षा, पानी, यात्रा-मार्ग लगातार सुधारे जा रहे हैं। तीर्थयात्रा से स्थानीय अर्थव्यवस्था में छोटे दुकानदार, परिवहन, होटल व्यवसाय को बहुत लाभ मिलता है। 

अंबिका माँ सिखाती हैं साहस, दृढ़ संकल्प, मातृत्व, सहजता, धर्म की रक्षा। माँ के बाएँ पैर की अंगुलियाँ गिरने का अर्थ है  “जीवन में दिशा और गति मिलना।” जो साधक दिशा-भ्रमित हो, वह यहाँ आकर स्पष्ट मार्गदर्शन को प्राप्त कर सकता है।

“अंबिका शक्तिपीठ” राजस्थान की धरती का अलौकिक रत्न है। यह स्थान इतिहास, अध्यात्म, तंत्र, योग, पुराण और लोकविश्वास, सबको अपने भीतर समाहित किए हुए है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ियों की गोद, मंदिर की गहन मौनता और देवी की दिव्य शक्ति मिलकर ऐसे अनुभव कराती है जिसे शब्दों में पूरी तरह पिरोना संभव नहीं है।



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