आभा सिन्हा, पटना
भारत की आध्यात्मिक संस्कृति में शक्तिपीठों का महत्त्व अविस्मरणीय है। यह केवल मंदिर नहीं है, बल्कि ऊर्जा के वह स्रोत है जहाँ माता सती के अंगों के साथ-साथ भक्ति, आस्था और इतिहास की संवेदनाएँ जुड़ी होती है। इन्हीं शक्तिपीठों की श्रृंखला में एक अत्यंत रहस्यमय, किंतु श्रद्धा से परिपूर्ण नाम है “जयदुर्गा शक्तिपीठ”।
यह शक्तिपीठ अन्य पवित्र स्थलों की तरह ऐतिहासिक रूप से चिह्नित न होकर, मिथिला की कर्नाट वंशीय परंपरा, नेनाल क्षेत्र, और दूर दक्षिण के कर्नाटक, तीनों भू-भागों को जोड़ने वाली एक अनोखी आध्यात्मिक कड़ी है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, यहीं माता सती के दोनों कान (श्रवण) गिरा था, जिसके कारण यह अत्यंत शक्तिशाली, दुर्लभ और विशिष्ट पीठ माना जाता है। यहाँ शक्ति का नाम जयदुर्गा और भैरव का नाम अभिरु बताया गया है।
शक्तिपीठों की कथा शुरू होती है माता सती के उस महान त्याग से, जब उन्होंने पिता दक्ष द्वारा शिव का अपमान सहन न कर पाकर यज्ञ कुंड में प्राण त्याग दिए। करुणा से विह्वल शिव ने जब सती के शरीर को कंधों पर उठाकर तांडव किया, तो ब्रह्मांड का संतुलन डगमगा गया। देवताओं ने विष्णु से आग्रह किया कि शिव को शांत करें। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित कर विभिन्न हिस्सों में गिरा दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरा, वहाँ-वहाँ शक्ति की अद्भुत धारा फूटी और शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन्हीं स्थलों में से एक है “जयदुर्गा शक्तिपीठ”, जहाँ माता सती के दोनों कान गिरा था।
हिन्दू दर्शन में कान विशेष संवेदनाओं और दिव्य श्रवण-शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कान गिरने का अर्थ है धर्म के श्रवण का उद्गम, वेदों की ध्वनि का उद्भव, आध्यात्मिक आदेशों का प्रवाह और संस्कारों की जड़ों का आधार। इसलिए जयदुर्गा का पीठ केवल शक्तिपीठ ही नहीं है, बल्कि ध्वनि, मंत्र और श्रुति का प्रतीक है।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, “जयदुर्गा शक्तिपीठ” का संबंध मिथिला के कर्नाट वंश से माना जाता है।
कर्नाट वंश (1097–1324 ई.) मिथिला का एक अत्यंत प्रभावशाली राजवंश था, जिसने विद्यापति जैसे महान कवि को संरक्षण दिया। कला और साहित्य को पल्लवित किया। माँ दुर्गा की परंपरा को राजनीतिक और आध्यात्मिक संरक्षण प्रदान किया। दक्षिण भारतीय और मिथिला संस्कृतियों के बीच सेतु का कार्य किया। यह वंश मूलतः कर्नाटक क्षेत्र से आया था, जिसे इतिहासकार कर्नाट क्षत्रिय या कर्णाटक ब्राह्मण कहते हैं। इससे “जयदुर्गा शक्तिपीठ” की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता निकलती है। यह पीठ दो महान सांस्कृतिक क्षेत्रों मिथिला और कर्नाटक, को जोड़ता है।
“नेनाल” मिथिला क्षेत्र का एक प्राचीन स्थल माना जाता है, जिसका संबंध संभवतः कर्नाटीय वंश की राजनीतिक-सांस्कृतिक जड़ों से रहा है। इस क्षेत्र को कुछ परंपराओं में “कर्णाट जन” या “कर्णाटक मूल” से जोड़ा जाता है। पौराणिक दृष्टि से, कुछ विद्वानों का मानना है कि यहाँ देवी का कोई प्राचीन रूप पूजित था, जो कर्नाटक की जयदुर्गा परंपरा से मेल खाता है।
कर्नाटक में "जयदुर्गा" के कई मंदिर पाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं शिमोगा क्षेत्र, तुमकुरु जिला, कोलार जनपद
और चिक्कमगलूर क्षेत्र। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इसमें से एक स्थान को सती के कान गिरने का स्थल माना जाता है, हालाँकि इसकी ऐतिहासिक पहचान अस्पष्ट है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, मिथिला की परंपराओं में वर्णित "कर्नाट देवी" की कथा और कर्नाटक की "जयदुर्गा" की पूजा-परंपरा में कई समानताएँ दिखाई देती हैं।
मिथिला में जयमति, जयकाली, जयशक्ति और कर्नाटक में जयदुर्गा, जयचामुंडेश्वरी, जयहनुमानट्टि देवी, ऐसे अनेक नाम मिलता है, जिसमें “जय” उपसर्ग शक्ति की विजय-स्वरूप ऊर्जा का संकेत देता है।
“जयदुर्गा शक्तिपीठ” का एक अनोखा पक्ष यह है कि इसकी सटीक भौगोलिक स्थिति इतिहास में अस्पष्ट रही है। पुराणों में नाम मिलता है “कर्नाट”, जिसे कई विद्वान भिन्न तरीकों से जोड़ता हैं। कुछ विद्वान इसे कर्नाटक प्रांत मानते हैं।कुछ इसे मिथिला का कर्नाट वंशस्थल बताते हैं। कुछ इसे नेनाल क्षेत्र से संबंधित करते हैं और कुछ मानते हैं कि यह स्थल समय के साथ लुप्त हो गया। इस प्रकार यह शक्तिपीठ एक जीवित आध्यात्मिक रहस्य बन गया है।
शास्त्र कहता है “देवी वही अधिक जाग्रत होती हैं, जिनकी खोज हृदय से की जाए, न कि केवल भूगोल से।” इसलिए जयदुर्गा शक्तिपीठ का अज्ञात होना अनेक साधकों के लिए रहस्य, तपस्या और अध्यात्म का स्रोत है।
जयदुर्गा का अर्थ है, वह जो जय प्रदान करे। वह जो अधर्म पर विजय का मार्ग दिखाए। वह जो साधक को साहस, तेज और श्रवण-शक्ति दे। कान के गिरने से संबंधित होने के कारण जयदुर्गा को विशेष रूप से मंत्र-सिद्धि, श्रवण-शक्ति, संगीत-कला, नाद-योग की अधिष्ठात्री माना जाता है।
जयदुर्गा के भैरव का नाम है “अभिरु”। अभिरु का अर्थ है, वह जो “भय का अभिग्रह” करे। वह जो अंधकार को भेद दे। वह जो साधक के मार्ग की रक्षा करे। इसलिए जयदुर्गा की साधना करते समय अभिरु भैरव का स्मरण विशेष फलदायी माना गया है।
विद्यापति के गीतों में भले प्रत्यक्ष उल्लेख न मिले, लेकिन उनकी रचनाओं में देवी के दिव्य स्वरूप का जो वर्णन है, वह कर्नाट परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कुछ लोकगीतों में “कर्णाट कन्या” और “जयशक्ति” का वर्णन मिलता है, जो इस परंपरा की गहराई को दर्शाता है।
कर्नाटक में विजयदुर्ग, जयचामुंडेश्वरी और दुर्गा पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। यहाँ ढोल-नाद, यक्षगान, और नाद-योग परंपराएँ देवी के नाद-स्वरूप को अभिव्यक्त करती है। कान गिरने के पौराणिक संदर्भ से यह नाद परंपरा आश्चर्यजनक रूप से मेल खाती है, क्योंकि यहाँ माता के कान गिरा, इसलिए इसे वेद-श्रुति का केंद्र, नाद-ब्रह्म का मूल, संगीत-सिद्धि का स्थान और सूक्ष्म चेतना का द्वार माना जाता है। जयदुर्गा की उपासना से श्रवण-सामर्थ्य प्रखर होता है। मंत्र-शक्ति सिद्ध होती है। अन्तर्ज्ञान जागृत होता है और रक्षा-कवच निर्मित होता है।
कुछ परंपराएँ जयदुर्गा को “कर्नाट देवी” बताती हैं। इसके पीछे तीन तर्क मिलते हैं। उन्हें कर्नाटक की भूमि में पूजित “जयदुर्गा” का स्वरूप कहा गया है। मिथिला के कर्नाट वंश ने इस देवी को अपना कुलदेवता स्वरूप माना है। देवस्थान का आसन ‘दक्षिण-पंथी’ (South Indian) शैली में पाया जाता है। इस प्रकार जयदुर्गा का स्वरूप दो महान परंपराओं का संगम है।
इतिहासकारों के लिए यह स्थल रहस्य से भरा एक गहन अध्ययन का विषय है। तीन प्रमुख प्रश्न शोध का आधार बनता है। क्या मिथिला में कर्नाट वंश का मूलस्थल ही सती का गिरा स्थान है? क्या कर्नाटक में कोई ऐसा स्थल है जहाँ गिरा हुए कानों का पुराण-आधारित साक्ष्य मिले? क्या नेनाल (Nainal/Nenal) क्षेत्र के पुरातात्विक अवशेष इस पीठ से जुड़े हैं? इन प्रश्नों के उत्तर भारतीय आध्यात्मिक भूगोल के अनगिनत खजाना खोल सकता है।
आज का युग सूचना का शोर, राजनीतिक संघर्ष, सांस्कृतिक अस्थिरता, मानसिक विचलन से भरा है। ऐसे समय में “जयदुर्गा शक्तिपीठ” का संदेश है “सुनो, आत्मा की आवाज सुनो। क्योंकि जहाँ कान गिरा, वहाँ सत्य की ध्वनि गूँजती है।” देवी जयदुर्गा सिखाती हैं, विवेक से सुनना, करुणा से समझना, साहस से बोलना और संकल्प से जीतना।
“जयदुर्गा शक्तिपीठ” केवल एक पवित्र स्थल नहीं है। यह भारतीय संस्कृति के तीन प्रमुख तत्वों का संगम है। पहला मिथिला की आध्यात्मिक विरासत। दूसरा कर्नाटक की नाद-परंपरा और तीसरा कर्नाट वंश का ऐतिहासिक सेतु। यहाँ सती के दोनों कान गिरा था, इसलिए यह शक्तिपीठ ब्रह्म-नाद का प्रतीक है। जयदुर्गा, अभिरु भैरव, कर्नाट परंपरा, नेनाल क्षेत्र और कर्नाटक, यह पाँचों मिलकर एक अद्भुत आध्यात्मिक वृत्त तैयार करता है, जो भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है।
