अब होगा प्रकाश तरंगों से शुगर की जांच

Jitendra Kumar Sinha
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सुई चुभोकर ब्लड शुगर जांचना, यह वाक्य ही मधुमेह रोगियों की दिनचर्या का दर्द बयां कर देता है। हर दिन कई-कई बार उंगली में सुई चुभाना, खून निकालना, रीडिंग लेना, यह एक ऐसा झंझावात है, जिससे दुनिया भर के करोड़ों डायबिटिक मरीज जूझते हैं। तकनीक आगे बढ़ी और वियरेबल सेंसर आए, जो शरीर में एक छोटा-सा तार त्वचा के नीचे डालकर शुगर लेवल पढ़ते हैं। दर्द कम हुआ, पर खत्म नहीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानि  MIT के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो बिना सुई, बिना तार, बिना खून, सिर्फ प्रकाश की किरणों के माध्यम से शरीर के भीतर ग्लूकोज का स्तर कुछ ही सेकंड में पढ़ सकता है।

विश्व के हर कोने में, हर देश में, हर उम्र में मधुमेह ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमान के अनुसार दुनिया में 56 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। भारत की बात करें तो यह संख्या दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही है।

मधुमेह सिर्फ एक बीमारी नहीं है बल्कि यह एक “लाइफस्टाइल मैनेजमेंट” है, जिसका केंद्र ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखना है। और इसके लिए सबसे ज़रूरी है समय-समय पर ग्लूकोज जांच। सही समय पर दवा। खानपान पर नियंत्रण और निरंतर मॉनिटरिंग। यानि मरीज को दिन में कई बार जांच करनी ही पड़ती है और यहीं पैदा होती है वह समस्या, जिसे विज्ञान अब खत्म करने जा रहा है “दर्द”।

मधुमेह रोगियों को प्रतिदिन 3 - 9 बार तक उंगली में एक छोटी सुई चुभानी पड़ती है। कुछ मरीजों में यह 12 बार तक भी पहुंच जाता है। यह सुई त्वचा को भेदती है ताकि एक बूंद खून निकाला जा सके। इससे समस्या होता है उंगलियों में दर्द। त्वचा का सख्त होना। संक्रमण का खतरा। बच्चों और बुजुर्गों में भय। बार-बार की चुभन से त्वचा का काला पड़ना और सबसे बड़ी बात होती है मरीज अक्सर दर्द से बचने के लिए जांच टाल देते हैं, जिससे स्वास्थ्य बिगड़ता है।

दर्द टालने की यह प्रवृत्ति मरीज को अगले स्तर की बीमारी रेटिनोपैथी, किडनी फेल्योर, हार्ट अटैक, न्यूरोपैथी की ओर ले जाता है। यानि फिंगर प्रिक सिर्फ एक चुभन नहीं है यह मधुमेह रोगियों के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।

बीते दशक में वियरेबल ग्लूकोज मॉनिटर आए, जैसे स्मार्ट सेंसर जो त्वचा के नीचे एक पतली सुई या माइक्रो-ट्यूब डालकर ग्लूकोज मापते हैं। यह तकनीक उन कंपनियों के लिए बड़ी सफलता थी, जिन्होंने मरीजों को बार-बार सुई चुभाने से मुक्ति दिलाई। लेकिन इन उपकरणों की भी दिक्कतें हैं त्वचा में छेद करना पड़ता है। सुई या तार 7-14 दिन तक त्वचा में धंसा रहता है। एलर्जी या लाल निशान। पानी में सावधानी। बार-बार बदलने का खर्च। खून नहीं निकलता, लेकिन दर्द फिर भी होता है। विश्व भर से लगातार मांग उठती रही है कि क्या ऐसा कोई तरीका नहीं हो सकता है जो बिल्कुल नॉन-इनवेसिव हो? और MIT ने इस सवाल का उत्तर खोज लिया है।

MIT के वैज्ञानिकों ने एक नया सेंसर विकसित किया है, जो त्वचा को नहीं छूता है। सुई का इस्तेमाल नहीं करता है। कोई तार त्वचा के अंदर नहीं डालता है। सिर्फ प्रकाश की किरणों के माध्यम से शुगर लेवल पढ़ता है। यह एक पूर्णतः नॉन-इनवेसिव तकनीक है। इस सिस्टम में एक विशेष प्रकार की रोशनी त्वचा पर डाली जाती है। यह रोशनी त्वचा के ऊतकों, कोशिकाओं और शरीर के रासायनिक घटकों से टकराकर वापस लौटती है। लौटने वाले संकेतों में मौजूद सूक्ष्म बदलाव ग्लूकोज के स्तर की जानकारी देता है। रिपोर्ट के अनुसार रीडिंग सिर्फ 30 सेकंड में मिल जाती है। सटीकता बाजार के बड़े ग्लूकोज वियरेबल सेंसर के बराबर है। यह पहली ऐसी सच्ची “नॉन-इनवेसिव” तकनीक साबित हो रही है।

इस तकनीक का मूल है “रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी”, जो एक अत्यंत संवेदनशील वैज्ञानिक विधि है। यह तकनीक Raman spectroscopy पर आधारित है। रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी में होता क्या है? एक विशेष monochromatic प्रकाश किरण (आमतौर पर लेजर) त्वचा पर डाली जाती है। यह प्रकाश शरीर के अणुओं से टकराता है। कुछ प्रकाश ऊर्जा खो देता है इसे Raman Shift कहते हैं। लौटती किरणें (scattered light) अणुओं की पहचान बताती हैं। यानि ग्लूकोज के अणु अपनी अनोखी “ऑप्टिकल फिंगरप्रिंट” रखता है। रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी उसी “फिंगरप्रिंट” को पहचानती है।

इस नए सेंसर ने पूरे स्पेक्ट्रम को नहीं, बल्कि सिर्फ तीन प्रमुख रमन बैंडों को चुना है, जहां ग्लूकोज सबसे अधिक स्पष्ट संकेत देता है। इस वजह से मशीन का आकार छोटा हुआ, पुर्जे कम लगे, कीमत घटी और पोर्टेबल बनाना आसान हुआ।

MIT के शोध की यात्रा बेहद रोचक है। 2010 में उन्होंने पहली बार दिखाया कि बिना खून निकाले, सिर्फ प्रकाश के संकेतों से ग्लूकोज स्तर पढ़ा जा सकता है। यह प्रयोग सफल रहा, लेकिन उपकरण बहुत बड़ा था। तब उन्होंने प्रकाश के कोण बदले, तरंग दैर्ध्य बदले, रिडिंग फिल्टर किए, और ग्लूकोज सिग्नल को शोर (noise) से अलग किया। धीरे-धीरे डेटा अधिक साफ होने लगा। 2020 में वैज्ञानिकों ने यह खोज की कि अगर लेजर को एक खास कोण से त्वचा पर डाला जाए, तो ग्लूकोज का संकेत बेहद स्पष्ट मिलता है। यह रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की सटीकता में ऐतिहासिक सुधार था।

इस सेंसर में तीन मुख्य हिस्से हैं। पहला Laser Light Emitter- एक विशेष लेज़र बीम त्वचा की सतह पर डाली जाती है। दूसरा Detector- लौटकर आने वाली प्रकाश तरंगों को पकड़ता है और तीसरा AI-आधारित सिग्नल प्रोसेसर। ग्लूकोज की सांद्रता पहचानता है और स्क्रीन पर रीडिंग दिखाता है। पूरी प्रक्रिया सिर्फ 30 सेकंड में पूरी हो जाती है। स्क्रीन पर सीधा दिखाई देता है। बस न खून, न दर्द, न चुभन।

यह तकनीक मधुमेह रोगियों के जीवन में अनगिनत बदलाव ला सकती है। ना सुई, ना खून, ना डिवाइस त्वचा में घुसाना। त्वचा को कोई नुकसान नहीं होना। हर 7-14 दिनों में सेंसर बदलने की जरूरत नहीं। डर और दर्द दोनों खत्म। सिर्फ 30 सेकंड का काम।  AI रीडिंग को स्टोर कर लेता है, ग्राफ बनाता है, ट्रेंड बताता है। ब्लड शुगर की अचानक गिरावट या बढ़त जल्द पकड़ी जा सकती है।

मधुमेह के उपचार में “Artificial Pancreas” का सपना कई दशक पुराना है। इसके लिए अत्यंत सटीक और निरंतर ग्लूकोज मॉनिटर की जरूरत होती है। MIT की यह तकनीक AI आधारित है। नॉन-इनवेसिव है और रीयल-टाइम में अपडेट देती है, इसलिए भविष्य में इसे स्मार्ट इंसुलिन पंप से जोड़ा जा सकता है।

डायबिटीज उपकरण उद्योग दुनिया का सबसे बड़ा हेल्थकेयर बाजार है। इस नए सेंसर के आने से वियरेबल सेंसर कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा। कीमतें कम होगी। तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। बीमा कंपनियां इसे प्राथमिकता देगी। डॉक्टर इसे बेहतर मानेंगे। वैश्विक स्तर पर यह बदलाव की सुनामी लाएगा।

भारत दुनिया का डायबिटीज कैपिटल बन चुका है। यह तकनीक यहां सबसे अधिक प्रभाव डाल सकती है। क्योंकि यह सस्ती जांच, दर्द-रहित प्रक्रिया, बुजुर्गों के लिए वरदान, गांवों में उपयोग आसान और हॉस्पिटल में भारी भीड़ कम होगी। भारत का डायबिटीज भार इतना बड़ा है कि यह तकनीक स्वास्थ्य क्रांति ला सकती है।

MIT की इस तकनीक ने दिखा दिया है कि विज्ञान सिर्फ मशीनें नहीं बनाता है वह दर्द मिटाता है, जीवन आसान बनाता है और आशा जगाता है। प्रकाश तरंगों पर आधारित यह नया सेंसर दुनिया के करोड़ों मधुमेह मरीजों को राहत देगा। नियमित जांच को आसान बनाएगा। सटीकता और सुविधा का अनोखा मेल पेश करेगा और आने वाली पीढ़ियों को सुई चुभाने के दर्द से आजाद करेगा।



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