नरेगा से “जी राम जी” तक - “जी राम जी” में भारतीय संस्कृति, नैतिकता और जीवन-दृष्टि का गहरा वैचारिक सार है

Jitendra Kumar Sinha
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भारत जैसे विशाल, विविधताओं से भरे और सामाजिक–आर्थिक विषमताओं से जूझते देश में जब भी किसी कल्याणकारी योजना का जन्म होता है, वह केवल एक सरकारी अधिसूचना नहीं होती है, बल्कि वह उस समय की राजनीतिक चेतना, सामाजिक दबाव और आर्थिक विवशताओं का प्रतिबिंब होती है। “राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम” (नरेगा) भी ऐसा ही एक प्रयोग था, जिसने ग्रामीण भारत को “काम के अधिकार” का वैधानिक भरोसा दिया। 

2005 में जब नरेगा अस्तित्व में आया, तब इसके पीछे एक बड़ा नैतिक दावा था, भूख से लड़ाई, बेरोजगारी पर प्रहार और ग्रामीण पलायन को रोकने का संकल्प। यह योजना कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक पहचान बन गई। इतना प्रबल दावा कि धीरे-धीरे यह योजना एक सरकार की नहीं, बल्कि एक दल की जागीर के रूप में देखी जाने लगी।

नरेगा की मूल आत्मा अत्यंत सरल थी कि ग्रामीण भारत में रहने वाला कोई भी वयस्क, यदि काम माँगता है, तो सरकार उसे 100 दिनों का अकुशल श्रम उपलब्ध कराने की कानूनी जिम्मेदारी लेगी। यदि काम नहीं दिया गया, तो बेरोज़गारी भत्ता देना पड़ेगा। यह अपने आप में ऐतिहासिक था। पहली बार किसी विकासशील देश में “रोज़गार” को अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया, लेकिन यहीं से एक और कहानी भी जन्म लेती है ‘नीति और नीयत के बीच की दूरी’।

नरेगा का नाम बदलकर “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम” (मनरेगा) करना केवल सम्मान का प्रश्न नहीं था। यह एक राजनीतिक प्रतीक था। चार वर्षों में ही नाम परिवर्तन यह दर्शाता है कि योजना को राष्ट्रीय सहमति की जगह वैचारिक विरासत से जोड़ा जाने लगा। महात्मा गांधी का नाम अपने आप में एक नैतिक कवच बन गया, जिसके भीतर आलोचना भी “असंवेदनशीलता” के आरोप में बदल दी जाती थी। यहीं से वह धारणा बनी, जिसका अत्यंत सटीक शब्दों में उल्लेख किया, “जिसे कांग्रेस अपनी जागीर समझती थी”

कागजों में मनरेगा विकास का इंजन था, लेकिन ज़मीन पर यह कई स्थानों पर भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बन गया। मस्टर रोल में मृत लोगों के नाम, काम हुए बिना भुगतान, तालाब, पोखर, बावड़ी, जो हर साल “नए” खोदे जाते, एक ही स्थान पर बार-बार खुदाई और भराई, सामग्री और श्रम के अनुपात में भारी हेराफेरी। विडम्बना यह थी कि जिन पोखरों का उद्देश्य जल-संरक्षण था, वह स्वयं कागजों में लबालब और वास्तविकता में सूखा रहता था। 

मनरेगा के अंतर्गत “पर्यावरणीय कार्यों” को प्राथमिकता दी गई,  वृक्षारोपण, भूमि संरक्षण, जल-संरक्षण। परंतु जब कर्म केवल भुगतान के लिए हो, तो उसका फल भी खोखला होता है। वन “कागजों में” लगते, पौधे रोपित तो होते, पर जीवित नहीं रहते, सिंचाई, संरक्षण और उत्तरदायित्व का अभाव। परिणाम यह हुआ कि प्रकृति भी इस योजना से वंचित रह गई। मनरेगा का सबसे बड़ा दावा था, ग्रामीण मजदूर को उसके गाँव में काम। लेकिन सच्चाई यह रही कि भुगतान में महीनों की देरी, बैंक-प्रणाली की जटिलताएँ, दलालों की भूमिका और काम की अनिश्चितता। अकुशल शारीरिक श्रमिक, जिसके नाम पर पूरी योजना खड़ी थी, वह आज भी प्रवासी मजदूर बना रहा। गाँव में काम मिला भी, तो इतना अस्थायी और अपमानजनक कि शहर की ओर पलायन जारी रहा।

मनरेगा एक समय तक “गरीबों का हथियार” नहीं, बल्कि चुनावी भाषणों का औजार बन गया। योजना की आलोचना करना गरीब-विरोधी कहलाता था, और समर्थन करना नैतिक प्रमाणपत्र बन गया। लेकिन विकास का मूल्यांकन नारे से नहीं, परिणाम से होता है और परिणाम यह था कि योजना थी, पैसा था, श्रमिक थे पर टिकाऊ परिवर्तन नहीं था।

क्या कोई योजना केवल नाम, इतिहास और राजनीतिक संरक्षण से जीवित रह सकती है? या फिर उसे पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और ईमानदार क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है? यहीं से कहानी अगले मोड़ की ओर बढ़ती है। पिछले दस वर्षों का वह दौर, जहाँ “दफन होती योजना” को नए सांचे में ढालने का प्रयास हुआ।

मनरेगा में पारदर्शिता लाने का अर्थ था नकद भुगतान समाप्त करना। बिचौलियों की भूमिका कम करना। काम, मजदूरी और समय को जोड़ना। यह सब सुनने में साधारण लगता है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह पूरी कार्यसंस्कृति बदलने जैसा था। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) व्यवस्था ने योजना की जड़ों को हिला दिया। अब मजदूरी सरपंच के हाथ में नहीं, सचिव की मर्जी पर नहीं और दलाल के रहमोकरम पर नहीं रहा बल्कि सीधे मजदूर के खाते में जाने लगी। यहीं से वह असहजता शुरू हुई, जिसे कई लोगों ने “तकनीकी बाधा” कहा, लेकिन असल में वह पारदर्शिता का दर्द था।

आधार आधारित सत्यापन ने एक सरल प्रश्न खड़ा किया कि काम कौन कर रहा है और पैसा कौन ले रहा है? फर्जी नाम गायब होने लगे। मृत आत्माएँ मस्टर रोल से हटने लगी। एक व्यक्ति, कई जॉब कार्ड की परंपरा टूटी। यह वही चरण था जहाँ योजना में शोर बढ़ा, क्योंकि जिनके लिए मनरेगा “कमाई” का साधन था, उनके रास्ते बंद होने लगे। मनरेगा में जियो-टैगिंग का अर्थ था काम शुरू होने से पहले फोटो, काम के दौरान फोटो और काम पूरा होने के बाद फोटो। अब तालाब केवल कागज पर नहीं खोदे जा सकते थे। अब वही पोखर बार-बार नया नहीं बन सकता था और सबसे महत्वपूर्ण था खुदाई और भराई का चक्र टूटने लगा।

डिजिटल मस्टर रोल ने एक और सवाल पूछा कि मजदूर आया कब? गया कब? यह साधारण प्रश्न वर्षों से टाला जा रहा था। अब जवाब देना पड़ने लगा। समय की चोरी कठिन हुई। उपस्थिति फर्जी दिखाना जोखिम भरा हुआ और अकुशल श्रमिक की मेहनत को मापने का प्रयास शुरू हुआ। यह सुधार मजदूर के हित में था, लेकिन व्यवस्था के एक हिस्से को यह अनावश्यक अनुशासन लगा। जहाँ पारदर्शिता आती है, वहाँ प्रतिरोध स्वाभाविक है।  मनरेगा में भी यही हुआ। “नेटवर्क नहीं है”, “मजदूर अंगूठा नहीं लगा पा रहा”, “भुगतान देर से हो रहा है”, इन तर्कों में कुछ सच्चाई थी, लेकिन पूरी नहीं। क्योंकि वर्षों तक जब भ्रष्टाचार चलता रहा, तब असुविधा कभी मुद्दा नहीं बनी। यह संघर्ष केवल तकनीक और मजदूर के बीच नहीं था, बल्कि पुरानी आदत और नई व्यवस्था के बीच था। यह सच है कि DBT और तकनीकी प्रक्रियाओं ने भुगतान की गति को प्रभावित किया। लेकिन यहाँ एक मूल प्रश्न है कि क्या देरी बुरी है, या चोरी? देरी को सुधार से ठीक किया जा सकता है, लेकिन चोरी व्यवस्था को खोखला कर देती है। यह वह द्वंद्व था, जिसमें नीति-निर्माताओं को निर्णय लेना पड़ा। धीरे-धीरे मनरेगा का स्वरूप बदलने लगा केवल “काम का अधिकार” नहीं बल्कि “काम की गुणवत्ता” और “सार्वजनिक संपत्ति की उपयोगिता”। तालाब अब केवल मजदूरी का माध्यम नहीं, बल्कि सिंचाई, जल-संरक्षण और कृषि का साधन बनने लगे, जहाँ ईमानदारी से काम हुआ।

“जी राम जी” यहाँ कोई नाम नहीं है, बल्कि कर्मयोग का प्रतीक है बिना शोर, बिना राजनीतिक दावा और बिना नैतिक उपदेश के काम हो, भुगतान मिले, और सार्वजनिक संपत्ति बने, बस यही “जी राम जी” का दर्शन है। मनरेगा समाप्त नहीं हुई, उसे अपने ही बोझ से मुक्त करने का प्रयास हुआ। जहाँ पहले योजना पहचान थी, अब वहाँ कर्म की पहचान ज़रूरी हो गई।

मनरेगा के अंतर्गत मिलने वाली मजदूरी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ाया। यह एक ऐसा सच है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है। छोटे दुकानदारों की बिक्री बढ़ी। स्थानीय बाज़ार में क्रय-शक्ति आई। साहूकार पर निर्भरता कुछ हद तक घटी, परंतु यह प्रवाह स्थायी नहीं था। मजदूरी खर्च होती रही, लेकिन उत्पादन बढ़ने की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। यहीं से एक प्रश्न उठता है क्या केवल पैसा देना ही विकास है?

मनरेगा का कृषि से संबंध हमेशा विवादित रहा। एक ओर जल-संरक्षण, भूमि समतलीकरण, मेड़बंदी, खेत-तालाब। इनसे कृषि को दीर्घकालीन लाभ मिलना चाहिए था। दूसरी ओर फसल के मौसम में मजदूरों की अनुपलब्धता, किसानों की बढ़ी लागत, कृषि मजदूरी और मनरेगा मजदूरी के बीच असंतुलन, यह द्वंद्व वास्तविक था। जहाँ मनरेगा ईमानदारी से लागू हुआ, वहाँ कृषि को सहारा मिला। जहाँ यह केवल मजदूरी वितरण बना, वहाँ कृषि को नुकसान भी हुआ। मनरेगा का सबसे संभावनाशील पक्ष जल-संरक्षण था। तालाब, पोखर, बावड़ी, चेकडैम,  यदि यह सही स्थान पर, सही तकनीक से और सही उद्देश्य से बनते, तो ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकता था। कुछ स्थानों पर ऐसा हुआ भी। भूजल स्तर में सुधार, सिंचाई क्षमता में वृद्धि और फसल विविधीकरण। परंतु जहाँ कर्म की जगह औपचारिकता हावी रही, वहाँ यह संरचनाएँ केवल फोटो-फ्रेम बनकर रह गईं।

फिर भी यह कहना अन्याय होगा कि मनरेगा से कुछ बदला ही नहीं। जहाँ पंचायतें ईमानदार थीं, अधिकारी उत्तरदायी थे और समुदाय सहभागी था, वहाँ मनरेगा ने जल दिया, रोजगार दिया और भरोसा दिया। यही वह बिंदु है जहाँ “जी राम जी” का अर्थ और गहरा हो जाता है। “जी राम जी” यहाँ किसी दल, व्यक्ति या प्रतीक का नाम नहीं है बल्कि उस मानसिकता का प्रतिनिधि है जहाँ काम पहले हो, श्रेय बाद में और शोर की आवश्यकता न हो। यह वही स्थिति है जहाँ योजना स्वयं बोलती है।

“जी राम जी” केवल एक सामान्य अभिवादन या सहमति सूचक वाक्य नहीं है, बल्कि इसके भीतर भारतीय संस्कृति, नैतिकता और जीवन-दृष्टि का गहरा वैचारिक सार छिपा हुआ है। यह वाक्य भारतीय समाज की उस परंपरा को दर्शाता है जिसमें ईश्वर का स्मरण केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवहार, भाषा और सोच का हिस्सा होता है। “जी” शब्द सम्मान, विनम्रता और स्वीकार्यता का प्रतीक है, जबकि “राम” मर्यादा, सत्य, धर्म और आदर्श जीवन का बिंब हैं। जब दोनों शब्द मिलकर “जी राम जी” बनता है, तो यह केवल उत्तर नहीं रहता, बल्कि एक नैतिक संकल्प बन जाता है।

इस वाक्य का नैतिक निष्कर्ष यह है कि मनुष्य अपने हर कर्म, विचार और प्रतिक्रिया को मर्यादा और धर्म के दायरे में रखे। “जी राम जी” कहने वाला व्यक्ति अनजाने में ही यह स्वीकार करता है कि वह अहंकार को त्यागकर विनम्रता को अपनाने को तैयार है। यह वाक्य सिखाता है कि असहमति या कठिन परिस्थिति में भी कटुता नहीं, बल्कि शालीनता और संतुलन होना चाहिए। भारतीय समाज में बुजुर्गों के प्रति सम्मान, संवाद में धैर्य और परिस्थितियों को स्वीकार करने की मानसिकता इसी भाव से निकलती है।

वैचारिक स्तर पर “जी राम जी” एक समन्वयवादी दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह किसी पर मत थोपने का नहीं है, बल्कि सामंजस्य बनाने का संकेत है। राम भारतीय चिंतन में केवल एक धार्मिक पात्र नहीं हैं, बल्कि आदर्श पुरुष, आदर्श शासक, आदर्श पुत्र और आदर्श मानव के रूप में देखे जाते हैं। इसलिए “राम” का स्मरण जीवन के हर क्षेत्र में नैतिकता की कसौटी बन जाता है। इस वाक्य के माध्यम से व्यक्ति यह संकेत देता है कि वह सत्य, करुणा और कर्तव्य के मार्ग से हटना नहीं चाहता।

आज के समय में, जब संवाद में आक्रामकता और असहिष्णुता बढ़ रही है, “जी राम जी” का भाव संयम और संतुलन का याद दिलाता है। यह सिखाता है कि हर उत्तर में विरोध आवश्यक नहीं है, हर प्रतिक्रिया में क्रोध जरूरी नहीं है। कभी-कभी विनम्र स्वीकार्यता ही सबसे बड़ा नैतिक बल होता है। यह वाक्य व्यक्ति को आत्मकेंद्रित होने से रोकता है और उसे व्यापक सामाजिक और नैतिक संदर्भ में सोचने के लिए प्रेरित करता है।



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