शीतकालीन सत्र - कांग्रेस के भविष्य का रास्ता - प्रियंका का अनुशासन और कांग्रेस के पुनर्जन्म की संभावना

Jitendra Kumar Sinha
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संसद का शीतकालीन सत्र औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है। विधायी प्रक्रिया की दृष्टि से यह एक सामान्य संसदीय सत्र था, कुछ विधेयक, कुछ हंगामा, कुछ वॉकआउट और कुछ स्थगन। लेकिन राजनीति केवल विधेयकों से नहीं चलती है, वह संकेतों, प्रतीकों और व्यक्तित्वों से भी दिशा तय करती है। यह सत्र भी ऐसा ही एक संकेत छोड़ गया है कि एक ऐसी ज्योत, जो अगर बुझी नहीं तो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए नए युग की मशाल बन सकती है। यह ज्योत न किसी प्रस्ताव से जली है, न किसी भाषण से। यह जली है व्यवहार, गंभीरता और मर्यादा से। और इस ज्योत का नाम है- प्रियंका गांधी वाड्रा।

आज कांग्रेस की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। एक समय था जब कांग्रेस का अर्थ था, सत्ता, नीति और राष्ट्र की दिशा। लेकिन आज कांग्रेस का अर्थ बन गया है, आंतरिक कलह, दिशाहीन नेतृत्व और चुनावी पराजय।

तथ्य बोलता हैं कि 2014 लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक पराजय, 2019 लोकसभा चुनाव में अपेक्षा से भी बड़ी हार  और 2024 के बाद कई राज्यों में संगठनात्मक शून्यता। कांग्रेस का पतन किसी एक चुनाव की हार नहीं है, बल्कि नेतृत्व की विफलता का परिणाम है।

राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस में दो धारणाएँ रही हैं। पहला समर्थकों की नजर में वे ईमानदार, संवेदनशील और विचारशील हैं। दूसरा आलोचकों की नजर में वे अपरिपक्व, अहंकारी और जमीनी राजनीति से कटे हुए हैं। समस्या यह नहीं है कि राहुल आलोचना के पात्र हैं बल्कि समस्या यह है कि राहुल आलोचना स्वीकार नहीं करते हैं।

आज भी जब कांग्रेस संगठन चुनावी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, तब राहुल गांधी का विदेश में रहना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं है, बल्कि राजनीतिक संदेश है। यह संदेश कहता है “पार्टी डूबे या उभरे, नेतृत्व को फर्क नहीं पड़ता है।”

शीतकालीन सत्र में राहुल गांधी का व्यवहार कोई नया नहीं था। सदन में कम उपस्थिति। तीखे नारे, पर ठोस रणनीति का अभाव। मीडिया में बयानबाजी और सदन में गंभीरता की कमी। यह वही राहुल हैं जिनकी राजनीति टेलीप्रॉम्प्टर से चलती है, लेकिन रणनीति बिना नक्शे के।

इस पूरे सत्र में जो नया था, वह था प्रियंका गांधी वाड्रा की उपस्थिति। सत्र के पहले दिन से अंतिम दिन तक निरंतर मौजूदगी। बिना अनावश्यक हंगामे के हस्तक्षेप। वरिष्ठ सांसदों से संवाद और सदन की मर्यादा का सम्मान। प्रियंका का व्यवहार यह संकेत दे रहा था कि “राजनीति केवल मंच से नहीं, संस्थाओं के भीतर भी की जाती है।”

संसद परिसर की वह चर्चित चाय पार्टी राजनीति के इतिहास में भले ही औपचारिक घटना न मानी जाए, लेकिन संकेतों की राजनीति में यह बेहद महत्वपूर्ण था। जहाँ राहुल गांधी का नाम अनुपस्थित रहा। प्रियंका गांधी संवाद का केंद्र रही। वरिष्ठ सांसदों ने उन्हें गंभीरता से सुना। यह कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की संभावित झलक थी।

भारतीय संसद में दो तरह की राजनीति चल रही है। एक है शोर आधारित राजनीति और दूसरा है संस्थागत मर्यादा आधारित राजनीति। राहुल गांधी पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि प्रियंका गांधी दूसरे वर्ग की ओर संकेत करती दिखीं। इतिहास गवाह है कि जो नेता संस्थाओं का सम्मान करता है, वही लंबे समय तक टिकता है।

आज कांग्रेस को भाजपा से नहीं, आज कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों से नहीं, आज कांग्रेस को सबसे पहले राहुल गांधी के अहंकार से मुक्ति चाहिए। क्योंकि संगठन राहुल के इर्द-गिर्द सिमट चुका है। निर्णय एक व्यक्ति  में केंद्रित हैं और असहमति को विद्रोह समझा जाता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक पार्टी के लिए घातक है।

कांग्रेस आज जिस रास्ते पर है, वह केवल हार की सेंचुरी नहीं है बल्कि वह डबल सेंचुरी की ओर बढ़ रही है। हर चुनाव के साथ जनाधार घटता जा रहा है। कार्यकर्ता निराश हो रहे हैं और वैकल्पिक नेतृत्व कुचला जा रहा है। अगर यही क्रम जारी रहा तो कांग्रेस इतिहास की किताबों में एक अध्याय बनकर रह जाएगी।

प्रियंका गांधी में जो संभावनाएँ दिखती हैं वह है संवाद की क्षमता। जमीनी राजनीति की समझ। सत्ता के बजाय संगठन पर फोकस और अहंकार की अनुपस्थिति। यह सब कांग्रेस के लिए संजीवनी हो सकता है।

प्रियंका गांधी के सामने चुनौतियाँ स्पष्ट हैं। परिवार के भीतर सत्ता संतुलन। राहुल समर्थक लॉबी। वर्षों से जमी गुटबाजी और संगठनात्मक ढांचा। परंतु इतिहास बताता है कि बड़े परिवर्तन कभी आसान नहीं होते हैं।

शीतकालीन सत्र समाप्त हो गया है, लेकिन उसने कांग्रेस को आत्ममंथन का दर्पण थमा दिया है। या तो कांग्रेस राहुल गांधी के अहंकार में डूबकर पराजयों की डबल सेंचुरी बनाये या फिर प्रियंका गांधी जैसे व्यवहारिक नेतृत्व को आगे बढ़ाकर खुद को फिर से प्रासंगिक बनाए। अब फैसला कांग्रेस को करना है। क्योंकि इतिहास अवसर बार-बार नहीं देता है।



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