राजद का संकट काल - क्या यह अस्थायी ठहराव है या बिहार की राजनीति में एक युग का अंत?

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति एक ऐसे चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ से आगे का रास्ता बेहद अनिश्चित, धुंधला और कई आशंकाओं से भरा हुआ है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन या समीकरणों के उलट-फेर का मामला नहीं था, बल्कि बिहार की राजनीति की आत्मा, उसके सामाजिक आधार और दशकों से जमे राजनीतिक विश्वासों को भी गहरा झटका दिया है। 

इस पूरे परिदृश्य में सबसे ज्यादा चर्चा और चिंता का विषय बना है राष्ट्रीय जनता दल (राजद)। इसे मिला अप्रत्याशित हार। यह हार सिर्फ सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने पार्टी की वैचारिक दिशा, संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। 

आज हालात ऐसा है कि पार्टी के अंदर असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। कार्यकर्ताओं की बेचैनी, नेताओं की खामोशी और शीर्ष नेतृत्व की गतिविधियाँ, सब कुछ मिलकर यह संकेत दे रहा है कि राजद किसी सामान्य राजनीतिक झटके से नहीं, बल्कि एक गहरे अस्तित्वगत संकट से गुजर रही है।

राजद की हार इसलिए भी ज्यादा चौंकाने वाली रही, क्योंकि चुनाव से पहले पार्टी खुद को सत्ता के बेहद करीब मान रही थी। जमीनी स्तर पर भी ऐसा माहौल बनाया गया था कि सत्ता परिवर्तन तय है। लेकिन नतीजा आया तो तस्वीर बिल्कुल उलट निकली। यह हार सिर्फ विरोधी दलों की जीत नहीं थी, बल्कि यह राजद के खिलाफ जनता के भीतर पनप रही नाराजगी, थकान और अविश्वास का परिणाम भी था। चुनावों में हार हर दल को मिलती है, लेकिन कुछ हार ऐसी होती हैं जो आने वाले लंबे समय के लिए राजनीतिक दिशा तय कर देती हैं। राजद की यह हार भी उसी श्रेणी में दिख रही है।

राजद कभी बिहार की सबसे मजबूत कैडर आधारित पार्टियों में गिना जाता था। गाँव-गाँव में कार्यकर्ता, हर गली में पहचान और हर संकट में पार्टी के लिए खड़े होने वाले समर्थक, यह उसकी पहचान थी। लेकिन इस चुनाव ने यह साफ कर दिया कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा अब वैसा मजबूत नहीं रहा। जिला स्तर पर निष्क्रियता, प्रखंड और पंचायत स्तर पर समन्वय की कमी, जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और टिकट वितरण में पारदर्शिता का अभाव। इन सभी कारणों ने मिलकर पार्टी को भीतर से कमजोर कर दिया। चुनाव के दौरान कई जगहों पर यह देखने को मिला कि पार्टी के कार्यकर्ता खुद चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिए पूरी तरह सक्रिय नहीं थे। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे खतरनाक संकेत होता है।

राजद ने पिछले कुछ वर्षों में खुद को “युवा नेतृत्व” वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। यह संदेश दिया गया कि पार्टी अब नई पीढ़ी के हाथों में है, जो पुराने तरीकों से हटकर आधुनिक राजनीति करेगी। लेकिन चुनाव परिणामों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या यह भरोसा जनता और कार्यकर्ताओं के दिलों में बन पाया?

पार्टी के भीतर ही यह चर्चा तेज है कि युवा नेतृत्व में वह परिपक्वता, अनुभव और राजनीतिक समझ नहीं दिखी, जिसकी बिहार जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक राज्य में जरूरत होती है। सिर्फ भाषण, सोशल मीडिया और आक्रामक बयानबाजी से राजनीति नहीं चलती है यह बात शायद इस चुनाव ने सबसे ज्यादा उजागर की।

राजद की राजनीति की रीढ़ हमेशा से जातीय समीकरण रहा है। एक समय था जब पार्टी का सामाजिक आधार बेहद मजबूत और लगभग अटूट माना जाता था। लेकिन समय के साथ बिहार का समीकरण बदला है। नई पीढ़ी की प्राथमिकताएँ बदली हैं। रोजगार, शिक्षा, विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे अब सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रह गए।

इस चुनाव में यह साफ दिखा कि परंपरागत जातीय समीकरणों में दरार पड़ी है। कुछ वर्गों ने विकल्प तलाशे, कुछ ने चुप्पी साधी और कुछ ने खुलकर विरोध किया। यह बदलाव राजद के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि उसकी राजनीति लंबे समय से इन्हीं समीकरणों पर टिकी रही है।

चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का विदेश सैर पर निकल जाना राजद के लिए किसी राजनीतिक भूल से कम नहीं माना जा रहा है। जब कार्यकर्ता हार की पीड़ा, जनता के सवालों और भविष्य की चिंता से जूझ रहा था, तब नेतृत्व का इस तरह सार्वजनिक जीवन से दूर होना गहरी नाराजगी का कारण बना।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, कई पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने खुलकर कहा है कि “इतनी बड़ी राजनीतिक त्रासदी के बाद कोई नेता सैर-सपाटा कैसे कर सकता है?” यह सवाल सिर्फ भावनात्मक नहीं है, बल्कि राजनीतिक भी है। नेतृत्व का संकट के समय सामने रहना, संवाद करना और जिम्मेदारी लेना किसी भी पार्टी की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी होता है।

राजद के भीतर असंतोष कोई नया विषय नहीं है, लेकिन इस बार यह खुलकर सामने आ रहा है। जो नेता और कार्यकर्ता पहले बंद कमरों में शिकायत करते थे, वे अब सार्वजनिक मंचों और मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। टिकट वितरण पर सवाल, नेतृत्व के फैसलों पर असहमति, संगठन में परिवारवाद का आरोप और वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा। यह सभी मुद्दे अब पार्टी के लिए “आंतरिक चर्चा” भर नहीं रहा, बल्कि उसकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुँचा रहा है।

राजद इससे पहले भी बुरे दौर से गुजर चुका है। 2010 का चुनाव इसका बड़ा उदाहरण है, जब पार्टी को करारी हार मिली थी। लेकिन उस समय और आज के हालात में एक बड़ा फर्क है। तब लालू प्रसाद पूरी ताकत के साथ राजनीति में सक्रिय थे। तब लालू प्रसाद की राजनीतिक ऊर्जा, जनसंपर्क और संकट से उबरने की क्षमता पार्टी के लिए संजीवनी का काम करती थी। आज वही लालू प्रसाद स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति में सीमित भूमिका में हैं। उनकी मौजूदगी अब प्रेरणात्मक जरूर है, लेकिन निर्णयात्मक नहीं है। यही कारण है कि 2010 का संकट और आज का संकट एक जैसा नहीं दिखता है।

लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति का एक युग हैं। उनकी शैली, उनका जनसंपर्क और उनकी राजनीतिक समझ ने दशकों तक राजद को जिंदा रखा। लेकिन समय किसी का इंतजार नहीं करता है। आज लालू प्रसाद का भूमिका सीमित हो चुका है। वे पार्टी के लिए भावनात्मक केंद्र जरूर हैं, लेकिन संगठन और रणनीति का बोझ अब उनके कंधों पर नहीं रह गया है। यह स्थिति राजद के लिए एक बड़ा संक्रमण काल है, जहाँ विरासत और वर्तमान के बीच संतुलन बनाना बेहद मुश्किल हो गया है।

आज बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजद इस संकट से उबर पाएगी, या यह दौर पार्टी के लंबे राजनीतिक पतन की शुरुआत है? इतिहास गवाह है कि कई बड़ी पार्टियाँ समय के साथ खत्म नहीं हुईं, बल्कि बदल गईं। लेकिन कुछ पार्टियाँ बदलाव न कर पाने के कारण इतिहास बन गईं। राजद किस रास्ते पर जाएगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह इस हार से क्या सबक लेती है।

राजद के सामने आज दो ही रास्ता है। पहला गहरा आत्ममंथन, संगठनात्मक सुधार, नेतृत्व में सामूहिकता और नई सामाजिक-राजनीतिक भाषा। दूसरा पुराने फार्मूले, पुराने चेहरे और बीते दौर की राजनीति पर अड़े रहना। पहला रास्ता कठिन है, दर्दनाक है, लेकिन भविष्य की संभावना वहीं है। दूसरा रास्ता आसान लग सकता है, लेकिन वह धीरे-धीरे राजनीतिक अप्रासंगिकता की ओर ले जा सकता है।

राजद का असली संकट उसकी सीटें नहीं है, बल्कि उसका कार्यकर्ता है। वही कार्यकर्ता जो सालों से पार्टी के लिए संघर्ष करता आया है, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उसका सीधा सवाल है कि “जब हम हार के बाद भी गाँव-गाँव में पार्टी का झंडा उठाए हुए हैं, तो हमारे नेता हमसे दूर क्यों हैं?” यह सवाल अगर अनसुना रहा, तो पार्टी का आधार और भी कमजोर हो सकता है।

राजद आज इतिहास के सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह दौर तय करेगा कि पार्टी आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति की मुख्यधारा में रहेगी या धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाएगी। हार के बाद का व्यवहार, नेतृत्व की संवेदनशीलता और संगठनात्मक सुधार, यही आने वाले समय की दिशा तय करेगा। 

बिहार की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव देखा है। राजद के पास अब भी अनुभव, इतिहास और सामाजिक समझ है। लेकिन सवाल यही है कि क्या वह खुद को समय के साथ बदलने का साहस दिखा पाएगी, या यह संकट उसके राजनीतिक सफर का सबसे लंबा अंधकारमय अध्याय बन जाएगा? इसका जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन फिलहाल बिहार की राजनीति में सबसे गूंजता हुआ सवाल यही है।



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