“राकिनी शक्तिपीठ” (देवी सती का “वाम गंड (बाएँ गाल)” गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
0

 


आभा सिन्हा, पटना 

सनातन धर्म के विशाल आकाश में 51 से अधिक शक्तिपीठ ऐसी दिव्य ज्योतियाँ हैं, जिनका अस्तित्व माता सती के शरीर-भागों के पृथ्वी पर गिरने के कारण माना गया है। यह शक्तिपीठ केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं है, बल्कि वह आध्यात्मिक ऊर्जा-क्षेत्र हैं, जहाँ भक्त की हर पुकार को माँ तुरंत सुन लेती हैं। शक्ति और भैरव की संयुक्त उपस्थिति इन स्थानों को अनन्य, अतुलनीय और पूर्ण रूप से दिव्य बना देती है।

इन्हीं शक्तिपीठों में एक अत्यंत प्राचीन, अलौकिक और पूज्य स्थल है “राकिनी शक्तिपीठ”, जो आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र, पवित्र गोदावरी नदी के तट, और महाशिवलिंगों के केंद्र कोटिलिंगेश्वर मंदिर के समीप, ऐतिहासिक सर्वशैल पर्वत में स्थित है।

राकिनी शक्तिपीठ वह स्थान है जहाँ माता सती के वाम गंड (बाएँ गाल) गिरा था। इस पावन धरा की शक्ति को “राकिनी” और भैरव को “वत्सनाभम” कहा जाता है।

राजामुंद्री का यह शांत और आध्यात्मिक स्थान उसी क्षण दिव्य हो गया जब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से विच्छिन्न सती का वाम गंड यहाँ गिरा। सती का गाल, जो चेहरे की सबसे कोमल, सुंदर और भावनाओं से पूर्ण पहचान है। यह भी संकेत देता है कि यह स्थल करुणा, सौम्यता, दया और मातृत्व की ऊर्जा का केंद्र है। इसलिए “राकिनी शक्तिपीठ” में शक्ति के रूप में “ममतामयी, रक्षक और विनयशील देवी” की आराधना की जाती है। देवी का यह रूप भयंकर नहीं है, बल्कि अत्यंत शीतल, आकर्षक और शांत है। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर देवी, अपने नाम के अनुसार, “राकिनी”, युद्धक, वीरांगना और शत्रु-नाशिनी भी बन जाती हैं।

जहाँ यह शक्तिपीठ स्थित है, उसे सर्वशैल कहा जाता है, जिसका अर्थ है “सब पर्वतों में श्रेष्ठ”। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में है कि यहाँ के पर्वत स्वयं हिमालय की उप-पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता था। लोककथाओं के अनुसार इसी क्षेत्र में ॠषियों ने अग्निहोत्र किए। यहाँ विभिन्न तंत्र साधनाएँ सम्पन्न हुईं और अनेक सिद्धों को इसी भूमि ने सिद्धियां प्रदान की। पर्वत, नदी, घने वृक्षों और आकाश का अनूठा संगम इस स्थान को एक दैवीय ऊर्जा-क्षेत्र बनाता है जिसे साधक आज भी अनुभव करते हैं।

गोदावरी को दक्षिण गंगा कहा जाता है। यह नदी हजारों वर्षों से अन्न का आधार, व्यापार का मार्ग, साधना का स्थान और कई राजवंशों की जीवन-रेखा रही है। राकिनी शक्तिपीठ और गोदावरी का सम्बंध बहुत गहरा है। कहा जाता है कि गोदावरी में स्नान करने से मन-पाप नष्ट होते हैं और राकिनी के दर्शन से आत्मिक बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार यह संयोजन देह और आत्मा दोनों का शुद्धिकरण करता है।

राजामुंद्री को “संस्कृति का काशी” भी कहा जाता है। यह शहर सातवाहन काल, चोल साम्राज्य, विजयनगर शासन, चालुक्य वंश और ब्रिटिश काल, सभी उतना ही महत्त्वपूर्ण रहा है। यहाँ वेदों-पुराणों की शिक्षा का केंद्र था और अनेक विद्वानों ने इसी भूमि पर ग्रंथ रचे।

“राकिनी शक्तिपीठ” के पास स्थित कोटिलिंगेश्वर महादेव का मंदिर अनूठा है, जहाँ एक करोड़ शिवलिंगों की स्थापना का वर्णन मिलता है। यह स्थान तंत्रमार्गी, शैव साधकों और शक्तिपंथियों, तीनों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।

देवी की परिकल्पना इस प्रकार की जाती है स्वर्णाभा कांति, तीन नेत्र, चंद्र किरीट, वाम गंड पर लाल आभा और हाथों में त्रिशूल, कमल, वरमुद्रा, अभयमुद्रा यह स्वरूप दर्शाता है कि देवी रक्षक भी हैं, दाता भी, क्रूरता-विनाशिनी भी और करुणा-सागर भी, भैरव वत्सनाभम, शिव का उग्ररूप, देवी के प्रांगण की रक्षा करते हैं।

“राकिनी शक्तिपीठ” का निर्माण द्रविड़ शैली, नागर शैली और क्षेत्रीय आंध्र शिल्पकला, तीनों के अनूठे मिश्रण का रूप है। मंदिर में देखा जा सकता है गज-थंब (हाथी आधारित स्तम्भ), पत्थरों की नक्काशी, देवी के रूपों की मूर्तियाँ, तांबे और पीतल की कलाकृतियाँ, शिलालेख। गर्भगृह छोटा, अंधकारपूर्ण लेकिन अत्यंत शांत है।  यहाँ दीपक की रोशनी में देवी का तेजस्वी स्वरूप भक्त को विस्मित कर देता है। कहा जाता है कि गर्भगृह में प्रवेश करते ही मन के विकार शांत हो जाता है। हृदय हल्का हो जाता है और ध्यान स्वतः ही लगने लगता है।

भैरव के बिना शक्ति उपासना पूर्ण नहीं माना जाता है। वत्सनाभम का मंदिर, गर्भगृह से पश्चिम में, ऊँचे पत्थरीले मंच पर शिव के उग्र रूप की भव्य मूर्ति के साथ स्थित है। भैरव का आशीर्वाद तंत्र बाधा, शत्रु कष्ट और भूत-प्रेत दोष को मिटाने वाला माना जाता है।

नवरात्र के दिनों में हजारों भक्त यहाँ पहुँचते हैं। अनुष्ठानों में शामिल होते हैं और शक्तिपाठ, चंडी पाठ, कुमारी पूजन, रात्रि जागरण, दीपदान, तंत्र-साधना (गोपनीय) करते हैं। इस समय मंदिर में ऊर्जा कई गुना बढ़ जाता है।



राकिनी देवी तंत्र की छः रक्‍तिका देवियों में से एक मानी जाती हैं। यहाँ विशेष रूप से की जाती हैं मातंगी साधना, रक्‍तिका साधना, नवरात्र तांत्रिक होम और शक्ति कवच सिद्धि, लेकिन यह सब गुरु दीक्षा के बिना निषिद्ध है।

स्थानीय जनमान्यता है कि त्वचा रोग, मानसिक अस्थिरता, भय रोग, अनिद्रा, अवसाद देवी के चरणों में समाप्त हो जाता है। राकिनी देवी के एक विशेष नाम “कलह-शांति प्रदायिनी” का भी उल्लेख मिलता है। परिवारिक कलह, दाम्पत्य तनाव और रिश्तों की टूटन यहाँ पर आकर समाप्त होता है। तांत्रिक साधक कहते हैं कि राकिनी, काली और चामुंडा, इन तीनों के संयुक्त दर्शन से साधना कभी असफल नहीं होता है।

राकिनी की यात्रा में नदी घाट, पहाड़, पत्थर की सीढ़ियाँ और आश्रमों की शृंखला, भक्त को एक आध्यात्मिक प्रकृति-यात्रा का आनंद देती है। यह शहर भारत के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में से एक है। यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं कोटिलिंगेश्वर महादेव, दानीकुंद्र पार्क, इस्कॉन राजामुंद्री, पुलों का अद्भुत नेटवर्क और गोदावरी तट के सूर्योदय। भक्तों के लिए सरल मंत्र है “ॐ ह्रीं राकिन्यै नमः।” साधना में उपयोग होने वाला विस्तृत मंत्र भी है, लेकिन वह दीक्षित साधकों के लिए ही उपयुक्त माना जाता है। तेज जीवन, तनाव, मानसिक बोझ से ग्रस्त आधुनिक मनुष्य को यह स्थल: शांति, स्थिरता, आध्यात्मिक ऊर्जा और मानसिक पुनर्जागरण प्रदान करता है।

“राकिनी शक्तिपीठ” केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि धर्म, इतिहास, अध्यात्म, संस्कृति, प्रकृति, तंत्र और साधना का अद्वितीय संगम है। गोदावरी का पवित्र तट, पर्वतों की शांत छाया, कोटिलिंगेश्वर का दिव्य आशीर्वाद और राकिनी माँ की करुणामयी दृष्टि, इन सबका संयुक्त प्रभाव भक्त के जीवन को प्रकाशित कर देता है।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top