कोलकाता हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को दी राहत - फोन पर जातिसूचक शब्द एससी/एसटी एक्ट के तहत नहीं

Jitendra Kumar Sinha
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भारत का संविधान समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित है। इन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए समय-समय पर विशेष कानून बनाए गए, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानून है। इस अधिनियम का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित और उत्पीड़ित समुदायों को सामाजिक अपमान, भेदभाव, हिंसा और अत्याचार से बचाना है।

हाल ही में कोलकाता हाईकोर्ट का एक आदेश चर्चा में आयाहै, जिसमें अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा फोन पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया है और वह सार्वजनिक रूप से नहीं हुआ है, तो उस पर एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे। यह आदेश न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके सामाजिक, संवैधानिक और व्यावहारिक प्रभाव भी दूरगामी हैं।

कोलकाता हाईकोर्ट के समक्ष एक अग्रिम जमानत याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता पर आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता को टेलीफोन पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए गालियां दी। शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय से संबंधित था, जिसके आधार पर पुलिस ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दलील दी कि आरोप केवल टेलीफोन पर कथित गाली-गलौज से संबंधित हैं। किसी सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक मंच पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ है। एससी/एसटी एक्ट की धारा तभी लागू होती है जब अपराध “सार्वजनिक दृष्टि में” किया गया हो। शेष आरोप भारतीय दंड संहिता के तहत जमानती हैं।

इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जय सेनगुप्त ने कहा कि यदि आरोपों को प्रथम दृष्टया सत्य भी मान लिया जाए, तो भी चूंकि कथित गालियां फोन पर दी गईं और सार्वजनिक रूप से नहीं थीं, इसलिए एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

एससी/एसटी एक्ट वर्ष 1989 में इसलिए लाया गया था कि सामान्य आपराधिक कानून (IPC) दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोकने में अपर्याप्त साबित हो रहा था। सामाजिक बहिष्कार, अपमान, शारीरिक हिंसा, भूमि हड़पना, और सार्वजनिक अपमान जैसी घटनाएं व्यापक थी। पीड़ितों को न्याय मिलने में कठिनाइयां आती थी।

एससी/एसटी एक्ट की धारा 3 विभिन्न प्रकार के अत्याचारों को परिभाषित करती है, जिनमें शामिल हैं सार्वजनिक स्थान पर जातिसूचक शब्दों से अपमान करना। सामाजिक बहिष्कार। जबरन श्रम। भूमि या संपत्ति पर कब्जा। शारीरिक और यौन हिंसा। विशेष रूप से, धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) में “सार्वजनिक दृष्टि में अपमान” की बात कही गई है।

कानून में “public place” और “public view” अलग-अलग अवधारणाएं हैं। सार्वजनिक स्थान का अर्थ है जहां आम जनता का प्रवेश हो, जैसे सड़क, पार्क, बाजार। वहीं सार्वजनिक दृष्टि का अर्थ है जहां कोई तीसरा व्यक्ति घटना को देख या सुन सके। न्यायालयों ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि घटना निजी स्थान पर भी हो सकती है, लेकिन यदि वह दूसरों की नजर में है, तो वह “सार्वजनिक दृष्टि” में मानी जाएगी। इसके विपरीत, यदि घटना निजी संवाद में हो और कोई तीसरा व्यक्ति न हो, तो वह सार्वजनिक दृष्टि में नहीं आती।

फोन पर बातचीत आमतौर पर दो व्यक्तियों के बीच निजी संवाद होती है। उसमें कोई तीसरा व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं होता है। इसलिए उसे सामान्यतः सार्वजनिक दृष्टि में नहीं माना जाता है। इसी सिद्धांत के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि फोन पर कही गई कथित गालियां एससी/एसटी एक्ट के दायरे में नहीं आती।

जस्टिस जय सेनगुप्त ने अपने आदेश में कहा है कि अग्रिम जमानत पर रोक केवल तभी लागू होती है जब एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान prima facie बनते हो। इस मामले में कथित अपराध सार्वजनिक रूप से नहीं हुआ है। इसलिए विशेष अधिनियम लागू नहीं होता है। जब विशेष अधिनियम लागू नहीं है, तो अग्रिम जमानत पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि कथित कृत्य अपराध नहीं है। यदि अन्य धाराएं बनती हैं, तो आरोपी पर उनके तहत कार्रवाई हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में “सार्वजनिक दृष्टि” की व्याख्या की है, जैसे स्वरण सिंह बनाम राज्य (2008)- अदालत ने कहा कि घर के भीतर, जहां केवल परिवार के सदस्य हों, वहां किया गया अपमान सार्वजनिक दृष्टि में नहीं माना जाएगा। हिमांशु बनाम राज्य- केवल पीड़ित की उपस्थिति में किया गया जातिसूचक अपमान एससी/एसटी एक्ट के तहत नहीं आएगा।

मद्रास हाईकोर्ट, बॉम्बे हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी फोन कॉल, निजी कमरे या बंद परिसर में हुए कथित अपमान को सार्वजनिक दृष्टि के बाहर माना है। हालांकि, यदि स्पीकरफोन पर बातचीत हो और अन्य लोग सुन रहे हों, तो स्थिति अलग हो सकती है।

इस आदेश के समर्थकों का कहना है कि एससी/एसटी एक्ट का कई मामलों में दुरुपयोग हुआ है। व्यक्तिगत रंजिश को कानून का रूप दे दिया जाता है। निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से कठोर कानून में फंसाया जाता है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि जातिसूचक शब्द चाहे सार्वजनिक हों या निजी, वे मानसिक उत्पीड़न करता है। फोन पर अपमान भी उतना ही गंभीर हो सकता है। इस तरह की व्याख्या से पीड़ितों का संरक्षण कमजोर हो सकता है।

अनुच्छेद 14 और 15-  संविधान समानता का अधिकार देता है। जाति के आधार पर भेदभाव निषिद्ध है। अनुच्छेद 19 और सीमाएं-  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निरंकुश नहीं है। जातिसूचक अपमान सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए इस पर कानूनन रोक जरूरी है। न्यायालय का प्रयास यही रहता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान के बीच संतुलन बना रहे। कानून का दायरा स्पष्ट और सीमित रहे। पुलिस को अब यह जांच करनी होगी कि कथित अपमान सार्वजनिक दृष्टि में हुआ या नहीं तो केवल एफआईआर के आरोप पर्याप्त नहीं होंगे। यह आदेश निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शक बनेगा। इससे कानून की व्याख्या में एकरूपता आएगी। लोगों में यह जागरूकता बढ़ेगी कि निजी संवाद और सार्वजनिक अपमान में कानूनी अंतर है। साथ ही, जातिगत भाषा के प्रयोग को लेकर सामाजिक चेतना भी जरूरी है।

कानून की स्पष्टता जरूरी है। हर विवाद को एससी/एसटी एक्ट के तहत लाना उचित नहीं है। निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। लेकिन मानसिक उत्पीड़न को नजरअंदाज किया जा रहा है। निजी अपमान भी सामाजिक जख्म देता है। पीड़ितों को न्याय पाने में और कठिनाई हो सकती है।

कोलकाता हाईकोर्ट का यह आदेश भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि जातिसूचक शब्दों का प्रयोग गलत नहीं है, बल्कि यह कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध तभी बनता है जब ऐसा अपमान सार्वजनिक दृष्टि में किया गया हो।

यह आदेश कानून की मंशा और उसके दायरे को स्पष्ट करता है। साथ ही, यह समाज के लिए भी एक संदेश है कि जातिगत अपमान किसी भी रूप में अस्वीकार्य है। लेकिन कानून का प्रयोग उसकी निर्धारित सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए। न्याय का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं है, बल्कि संतुलन, समानता और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना भी है। यह आदेश उसी संतुलन की एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।



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