“श्रीसुंदरी शक्तिपीठ” (देवी सती का “दाएँ पैर की पायल” और “दक्षिण गुल्फ (एड़ी)” गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना 

भारत की आध्यात्मिक परंपरा देवी माँ के चरणों की महिमा से सदा ज्योतित होती रही है। देवी शक्ति के 51 शक्तिपीठों में कुछ ऐसे हैं, जिनकी पहचान वैदिक युग से लेकर आज तक रहस्य, श्रद्धा और चमत्कार से घिरी रही है। श्रीसुंदरी शक्तिपीठ उन्हीं दिव्य धामों में से एक है, एक ऐसा पवित्र स्थान जिसकी मान्यताएँ दो स्थलों से जुड़ती हैं। पहला लद्दाख-कश्मीर का पर्वतीय क्षेत्र, जहाँ माता की “दाएँ पैर की पायल” गिरी थी, और दूसरा आंध्रप्रदेश का श्रीशैलम क्षेत्र, जहाँ माता की “दक्षिण गुल्फ (एड़ी)” गिरने की प्राचीन मान्यता है। दोनों स्थानों पर “श्रीसुंदरी” शक्ति की उपासना होती है और दोनों ही स्थानों के भैरव को सुंदरानंद कहा जाता है।

देवी के शक्तिपीठ वह दिव्य स्थल हैं, जहाँ सती के शरीर के अंग, आभूषण या रक्त गिरे थे। इन स्थानों पर महत-शक्ति का संचार हुआ और प्रत्येक धाम देवी की किसी विशेष शक्ति का अवतार बन गया। श्रीसुंदरी भी ऐसा ही एक धाम है, जहाँ देवी शक्ति के चरणों से जुड़ी दिव्य ऊर्जा अनंत काल से प्रवाहित होती रही है। चरण- अर्थात भक्ति का स्थान, समर्पण का स्थान और ऊर्जा का सबसे कोमल केंद्र। इसीलिए “श्रीसुंदरी शक्तिपीठ” को “चरण-शक्ति-पुष्टि धाम” कहा जाता है।

“सुंदरी” नाम स्वयं में अद्वितीय है। इसमें सौंदर्य, माधुर्य, कोमलता, दिव्यता, करुणा और मातृत्व, सभी का सम्मिलन है। “श्रीसुंदरी” में “श्री” जुड़ने से यह देवी महालक्ष्मी और महाशक्ति दोनों का संयुक्त रूप बन जाती है। शक्तिपीठों में तीन नाम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पहला त्रिपुरसुंदरी-  सौंदर्य और तांत्रिक सिद्धि की अधिष्ठात्री, दूसरा भुवनेश्वरी-  सृष्टि की संचालिका और तीसरा श्रीसुंदरी- चरणों की कृपा से जीवन सुंदर करने वाली शक्ति। श्रीसुंदरी का रूप अत्यंत सौम्य, कृपालु, शीतल और भक्तवत्सला माना गया है।

सती का शरीर जब भगवान विष्णु के सुदर्शन से खंड–खंड होकर धरती पर गिरा, तब जहाँ अंग गिरा वहाँ शक्ति पीठ बना।

एक परंपरा के अनुसार, देवी के दाएँ पैर की पायल (नूपुर) लद्दाख-कश्मीर में गिरा। दूसरा परंपरा कहता है कि दक्षिण गुल्फ यानि एड़ी श्रीशैलम में गिरा। चरण का दैवीय अर्थ है- चरण त्याग का प्रतीक हैं। चरण सेवा का केंद्र हैं। चरण शक्ति का आधार हैं और चरणों में शरण ही भक्त का परम ध्येय है। इसी कारण श्रीसुंदरी शक्तिपीठ को “शरणागत–कल्याण–पीठ” कहा जाता है।

लद्दाख और कश्मीर के मध्य हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं में यह स्थान बताया गया है। यह क्षेत्र ऊँचे पहाड़, बर्फीली चोटियाँ, कठिन यात्राएँ, दुर्लभ आबादी, वज्रयान और हिन्दू–बौद्ध प्रभाव का अद्भुत संगम हैं। यहीं कहीं श्रीसुंदरी का मूल स्थान माना जाता है। कई परंपराओं के अनुसार, यह स्थान वर्षों तक रहस्य में रहा, ना कोई स्पष्ट मार्ग, ना कोई बड़ा मंदिर, ना ही भव्य स्थापत्य, बल्कि एक ऊर्जा स्थल, जहाँ साधकों ने दिव्य अनुभव किया।



देवी के दाएँ पैर की पायल, जिसे नूपुर भी कहते हैं, का गिरना अत्यंत पावन माना जाता है। पायल का आध्यात्मिक अर्थ है- नूपुर की ध्वनि नादयोग का प्रतीक है। चरण का अलंकार शुभता का प्रतीक है। यह दैवी स्त्री-ऊर्जा का एक विशेष संकेत है। इसीलिए यह पीठ सौभाग्य, सौंदर्य और जीवन-सिद्धि प्रदान करने वाला शक्तिपीठ माना जाता है।

लद्दाख परंपरा में श्रीसुंदरी का वर्णन कुछ इस प्रकार है गोरी आभा, हिमालय जैसी शीतलता, त्रिशक्ति का सम्मिलित तेज, ध्यानमग्न मुद्रा और आभामंडल में नूपुर की झंकार। कई साधक कहते हैं कि यहाँ ध्यान करते समय उन्हें नूपुर जैसी ध्वनि सुनाई देती है।

भैरव इस क्षेत्र में संरक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। सुंदरानंद भैरव जिसमें ‘सुंदर’ का अर्थ सौम्यता और ‘आनंद’ का अर्थ परमानंद है। यही इस पीठ की विशेषता है कठोर हिमालय, लेकिन सौम्य भैरव।

आंध्रप्रदेश के कुर्नूल जिला में स्थित श्रीशैलम, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक मल्लिकार्जुन, शक्तिपीठ भ्रामरम्बा, प्राचीन शैव–शाक्त–तांत्रिक परंपरा, द्रविड़ स्थापत्य, वनों, पर्वतों और नदी घाटियों से घिरा क्षेत्र, इन सबका केंद्र है।

इसी क्षेत्र में श्रीसुंदरी का पवित्र स्थान माना जाता है, जहाँ देवी की दक्षिण एड़ी गिरी थी। एड़ी (गुल्फ) जीवन का आधार है,  चलना, बढ़ना, सहना, सब इसी से है। एड़ी गिरने का अर्थ है भक्त को अडिग शक्ति प्रदान होना, जीवन के संघर्षों में स्थिरता, साधक को साधना में दृढ़ता, परिवार में स्थिरता और सौभाग्य, दक्षिण भारत में इसे ‘जीवन-आधार शक्ति’ कहा जाता है।

श्रीशैलम की श्रीसुंदरी को माना जाता है कमल पर विराजमान, चार भुजाएँ, हाथों में पुष्प और वरद मुद्रा, मुख पर सौम्यता और भक्त-रक्षक रूप। 

श्रीशैलम में भैरव की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यहाँ विभिन्न रूपों में भैरव पूजे जाते हैं। श्रीसुंदरी के भैरव सुंदरानंद, शिव का आनंदमय रूप, तांत्रिक अनुष्ठानों के रक्षक और भक्त को भयमुक्त करने वाले है।

श्रीसुंदरी को श्रीविद्या, त्रिपुरसुंदरी परंपरा से भी जोड़ा जाता है। इस शक्तिपीठ में नवरत्न विद्या, कौल मार्ग, श्रीचक्र साधना, ललिता सहस्रनाम, नूपुर-नाद ध्यान, शक्ति पाद-पूजन, का विशेष महत्व है। शक्ति परंपरा में चरणों का पूजन अत्यंत फलदायक माना गया है। चरण- कर्मों को दिशा देता है। जीवन की गति बदलता हैं। भक्त को शरण प्रदान करता है। इसी पीठ पर नूपुर-नाद ध्यान एक अनोखी साधना मानी जाती है।

श्रीसुंदरी शक्तिपीठ का उल्लेख तंत्र-चूड़ामणि, देवी भागवत, कालिका पुराण, शक्ति-संगम तंत्र, कश्मीर-शैव परंपरा और श्रीशैल-महात्म्य में मिलता है। कई श्लोक कहता है “यत्र देवी नूपुरं पतितं तत्र सुंदरी स्थिता।”
- देवी भागवत अर्थात  जहाँ देवी की पायल गिरी, वहीं सुंदरी शक्ति स्थापित हुई।

लद्दाख की कथा है कि वहाँ के चरवाहे नूपुर की ध्वनि सुनते थे। सर्दियों में एक चमत्कारी तारा उस स्थान के ऊपर ठहरता था। साधु कहते थे कि यहाँ अदृश्य देवता की परिक्रमा होती है।

श्रीशैलम की कथा है कि देवी ने एक साधक को स्वप्न में दर्शन दिए और अपनी एड़ी का स्थान बताया। यहाँ के जंगलों में सुगंध का विचित्र प्रवाह पाया जाता है। नवरात्रों में यहाँ ध्वनि रहस्यमय रूप से बढ़ जाती है। यह एकमात्र शक्तिपीठ है जहाँ दो स्थानों पर चरण से जुड़ी मान्यता है। सुंदरानंद भैरव का रूप अत्यंत सौम्य, शांत और आनंदमय माना जाता है। नूपुर-नाद साधना का अद्वितीय महत्व है और श्रीविद्या परंपरा का एक रहस्यमयी केंद्र।

भक्तों ने यहाँ अनुभव किया- ध्यान में नूपुर ध्वनि का श्रवण, कठिन समय में चमत्कारी सहायता, परिवार में शांति, कष्टों का अंत, ध्यान में प्रकाश रूपी दर्शन और स्वप्न में देवी के चरणाकृति संकेत। तांत्रिक साधकों के अनुसार, यहाँ शक्ति चरण-दया के रूप में मिलती है, जो सबसे ऊँची कृपा मानी जाती है।

सरल पूजन-विधि है लाल या गुलाबी पुष्प, चंदन, नैवेद्य, दीपक, श्रीसूक्त या ललिता-सहस्रनाम का पाठ। विशेष मंत्र है “ॐ श्रीं सुंदरी देव्यै नमः।” “ॐ सुंदरीपादाय नमः।” भैरव मंत्र है “ॐ सुंदरानंद भैरवाय नमः।”

पुराने साधक उत्तर से हिमालय पार करके, दक्षिण से दक्कन के घने वनों से, पश्चिम से व्यापारिक मार्गों द्वारा, पूर्व से तांत्रिक परंपराओं के माध्यम से इन दोनों स्थानों तक पहुँचते थे। श्रीसुंदरी का नाम पूरे भारत में फैला हुआ है।

कला, तांत्रिक विचार, पूजा-पद्धति, लोकगीत, नृत्य परंपरा, स्त्री-शक्ति का सम्मान, सब पर श्रीसुंदरी का प्रभाव स्पष्ट है। दक्षिण भारत में कुचिपुड़ी और उत्तर भारत में कश्मीरी-शक्ति स्तोत्र पर इसका प्रभाव मिलता है।

श्रीसुंदरी शक्तिपीठ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है जहाँ देवी माँ के चरणों की पवित्रता भक्त के जीवन को सुंदर बना देती है। दो स्थान, लेकिन एक ही दिव्य शक्ति, एक ही पवित्र नूपुर, एक ही सौम्यता और एक ही कृपा- श्रीसुंदरी और सुंदरानंद भैरव।



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