आभा सिन्हा, पटना
भारत की पवित्र धरती अनगिनत देवी-देवताओं की लीलाभूमि रही है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, वन और घाटियाँ हजारों वर्षों से दिव्य ऊर्जा और सनातन संस्कृति के संवाहक रहे हैं। इन्हीं अनंत पवित्र स्थलों में से एक है “विश्वेश्वरी शक्तिपीठ”, जो शक्ति भक्तों के लिए श्रद्धा, आस्था और भक्ति का अमूल्य केंद्र माना जाता है।
यह शक्तिपीठ आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी के निकट, गोदावरी नदी के पवित्र तट पर स्थित कोटिलेश्वर मंदिर परिसर में अवस्थित है। शक्ति रहस्य के अनुसार, यहाँ माता सती के दक्षिण गाल (दक्षिण गण्ड) का पतन हुआ था। इस स्थल की अधिष्ठात्री शक्ति को ‘विश्वेश्वरी’ और यहाँ के भैरव को ‘दंडपाणि’ कहा जाता है।
विश्वेश्वरी शक्तिपीठ न केवल देव-भक्तों के लिए एक यात्राधाम है, बल्कि यह भारत की अध्यात्म-परंपरा, शक्ति-साधना और लोक-संस्कृति का अद्भुत रूप भी है। यहाँ भक्ति, अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य, वास्तु-कला और गहन आध्यात्मिक तत्त्व, सब एक साथ मिलकर एक दिव्य अनुभूति प्रदान करता हैं।
शक्ति-परंपरा की प्रमुख धुरी है, भगवान शिव और देवी सती की दिव्य कथा। जब राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया और यज्ञ में सती का तिरस्कार हुआ, तब सती ने क्रोध और दुःख में आत्मदाह कर लिया। शिव शोक से व्याकुल होकर जब सती के शरीर को कंधों पर रखकर तांडव करने लगे, तब ब्रह्मांड का संतुलन डगमगाने लगा। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के विभिन्न अंगों को काटकर गिराया। जहाँ-जहाँ सती के अंग, अलंकरण या रक्तबिंदु गिरा, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुआ। इन्हीं पवित्र स्थलों में से एक है “विश्वेश्वरी शक्तिपीठ”, जहाँ माता का दक्षिण गण्ड गिरा है।
गोदावरी नदी दक्षिण भारत की सबसे पवित्र नदियों में गिना जाता है। इसे दक्षिण गंगा भी कहा जाता है। राजमुंदरी के समीप इसका प्रवाह शांत, विस्तृत और दिव्य दिखाई देता है। इसी पावन नदी के किनारे स्थित है, ‘कोटिलेश्वर धाम’, जो हजारों वर्षों से शक्ति-भक्ति का केंद्र है। नदी किनारे स्थित होने के कारण यह स्थान अत्यंत आध्यात्मिक माना जाता है। आसपास अनेक ऋषियों ने तपस्या की थी। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य ध्यान-साधना के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है।
कोटिलेश्वर मंदिर का इतिहास प्राचीन और आध्यात्मिक रूप से संपन्न है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, यह क्षेत्र हजारों वर्षों से शिव-साधना का आदिकेंद्र रहा है। यहाँ के काष्ठ और पाषाण-शिल्प चोल एव चालुक्य काल की कला का उदाहरण माना जाता है। मंदिर परिसर में शक्ति, शैव और वैदिक परंपराओं का सम्मिलित रूप दिखाई देता है। यही आध्यात्मिक भूमि “विश्वेश्वरी शक्तिपीठ” के रूप में और भी अधिक पवित्रता प्राप्त करती है।
कथाओं के अनुसार, जब विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाया तो सती के दक्षिण गाल इसी स्थान पर गिरा था। इसी कारण से यहाँ की शक्ति का नाम ‘विश्वेश्वरी’ पड़ा। ‘दंडपाणि भैरव’ यहाँ के रक्षक हैं, जो भक्तों को सभी प्रकार के संकटों से बचाते हैं।
विश्वेश्वरी नाम का अर्थ है, विश्व की ईश्वरी, संपूर्ण जगत की अधिष्ठात्री, सर्व दिशा-दिशांतों में व्याप्त शक्ति का केंद्र। देवी विश्वेश्वरी को ज्ञान, वैभव, करुणा और संरक्षण की देवी माना जाता है। यहाँ साधना करने से मानसिक संतुलन, आध्यात्मिक ऊर्जा और वाणी पर नियंत्रण प्राप्त होता है।
हर शक्तिपीठ में एक भैरव देव की व्यवस्था होती है। विश्वेश्वरी स्थल के भैरव हैं “दंडपाणि”, जिनके हाथ में दंड (लाठी) रहता है। यह दंड न्याय का, नीति का, अनुशासन का, साधक की रक्षा का, प्रतीक है। शास्त्रों में कहा गया है कि बिना भैरव की पूजा के शक्ति की कृपा प्राप्त नहीं होती है। दंडपाणि की आराधना से साधक भय से मुक्त होता है। दुष्ट शक्तियों से रक्षा पाता है और आध्यात्मिक मार्ग पर दृढ़ता हासिल करता है।
कोटिलेश्वर परिसर में स्थित यह शक्तिपीठ द्रविड़ शैली के सौंदर्य से परिपूर्ण है। मंदिर के मंडप, शिखर और द्वार, सब स्थानिक परंपराओं के अनुरूप अत्यंत आकर्षक हैं। पत्थरों पर उकेरी गई देव प्रतिमाएँ, शिल्प में चोलकाल की सूक्ष्मता, प्रवेश द्वार पर नक्काशीदार स्तंभ, देवालय के भीतर शांति और ऊर्जा का अलौकिक समन्वय, मंदिर की दीवारों पर शक्ति-भक्ति से जुड़े कई चित्रण भी हैं, जिनमें देवी की शक्ति-लीलाओं का अद्भुत वर्णन मिलता है।
शक्ति-उपासना में तंत्र का विशेष स्थान है और विश्वेश्वरी को तांत्रिक उपासना की अत्यंत शक्तिशाली पीठ माना जाता है। भक्त यहाँ त्राटक, ध्यान मंत्र-जप, समर्पण साधना, नवदुर्गा तथा षोडशी उपासना जैसी साधनाएँ करते हैं। कुछ परंपराओं में यहाँ का बीज मंत्र है “ॐ ह्रीं विश्वेश्वर्यै नमः”। बताया गया है कि साधक के मानसिक विकास, अंतर्ज्ञान और शक्ति-जागरण का कारक माना जाता है। कहा जाता है कि यहाँ की साधना से मन की चंचलता शांत होती है। आत्मविश्वास बढ़ता है। वाणी में मधुरता आती है। परिवारिक कष्ट दूर होते हैं और साधक की ऊर्जा तेजस्वी होती है।
यह क्षेत्र वैदिक, शैव, शक्त, राम-कथा, दक्षिण भारतीय संगीत, सभी परंपराओं का संगम रहा है। यहाँ के लोग शक्ति-पूजा में अत्यधिक आस्था रखते हैं। इस शक्तिपीठ में अनेक उत्सव मनाए जाते हैं, यहाँ नवरात्र अत्यंत भव्य रूप में मनाई जाती है। दूर-दूर से भक्त इन नौ दिनों में देवी के दर्शन के लिए आते हैं। मंत्रोच्चार, भजन और दीपों की पंक्तियाँ परिसर को दिव्य बना देती हैं। यह उत्सव बारह वर्षों में एक बार आता है और करोड़ों भक्त गोदावरी में पवित्र स्नान करते हैं।
“विश्वेश्वरी शक्तिपीठ” के दर्शन मात्र से मन को अत्यंत शांति मिलती है। भक्त बताते हैं कि यहाँ मानसिक तनाव दूर होता है। मन एकाग्र होता है और अदृश्य ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव होता है। कहा जाता है कि विश्वेश्वरी माता संकल्प-पूर्ति का वरदान देती हैं, विशेष रूप से कठिन पारिवारिक समस्याएँ, विवाह में बाधाएँ, मनोकामना, स्वास्थ्य-संबंधी कष्ट, व्यवसाय-वृद्धि, जैसी समस्याओं में माता का आशीर्वाद शीघ्र मिलता है। “विश्वेश्वरी शक्तिपीठ” के आस-पास इस्कॉन मंदिर, मार्कंडेय मंदिर, द्राक्षारामम् और कोटिलिंगेश्वर शिवालय, यह पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक यात्रा के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
देवी विश्वेश्वरी केवल स्थानीय देवी नहीं है, बल्कि सृष्टि की ऊर्जा, चेतना की अधिष्ठात्री, विश्व की प्रकृति का सार हैं। उनका स्वरूप हर जीव में व्याप्त दिव्यता का प्रतीक है। आज के तनाव, चिंता और असंतुलन के युग में शक्ति-उपासना, मानसिक शांति, आत्मबल, स्थिरता, धैर्य और कर्मयोग का अद्भुत आधार बन सकता है।
आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी के पास स्थित “विश्वेश्वरी शक्तिपीठ” केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि “शक्ति-तत्व का जीवंत स्वरूप” है। यहाँ आकर हर भक्त भक्ति का आनंद, प्रकृति की गोद, दिव्य ऊर्जा, मानसिक शांति और आत्मशक्ति का जागरण, का अद्भुत अनुभव करता है।
