बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रही है और इसका सीधा असर भारत–बांग्लादेश संबंधों पर साफ़ दिखाई देने लगा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हाल ही में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और उसके प्रमुख मोहम्मद यूनुस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश में कट्टरपंथी ताकतें हावी हो चुकी हैं और सरकार उन्हें नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। हसीना का यह बयान केवल राजनीतिक आलोचना नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी है।
शेख हसीना ने विशेष रूप से भारत के उत्तर-पूर्व को जोड़ने वाले रणनीतिक क्षेत्र, जिसे आम तौर पर ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, को लेकर दिए जा रहे बयानों पर आपत्ति जताई। यह क्षेत्र, जिसे आधिकारिक रूप से सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहा जाता है, भारत के लिए न केवल भौगोलिक बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हसीना का कहना है कि इस तरह के बयान गैर-जिम्मेदाराना हैं और इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में अविश्वास पैदा होता है। उनके अनुसार, किसी भी अस्थायी या अंतरिम सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह ऐसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उकसाने वाली भाषा का प्रयोग करे।
बांग्लादेश में हाल के महीनों में जिस तरह से हिंसा, राजनीतिक हत्याएँ और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं, उसने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। शेख हसीना का आरोप है कि मौजूदा सत्ता व्यवस्था न तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम है और न ही चरमपंथी तत्वों पर लगाम लगाने में। उनका यह भी कहना है कि भारत इन हालात को बारीकी से देख रहा है और नई दिल्ली की चिंता पूरी तरह जायज़ है, क्योंकि अस्थिर बांग्लादेश का सीधा असर पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ता है।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते शेख हसीना के कार्यकाल में एक नई ऊँचाई पर पहुँचे थे। सीमा समझौते, व्यापार, ट्रांजिट सुविधाएँ और सुरक्षा सहयोग जैसे कई मुद्दों पर दोनों देशों ने मिलकर काम किया था। आज जो तनाव दिख रहा है, वह केवल कूटनीतिक मतभेद नहीं बल्कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीतिक कमजोरी का परिणाम है। हसीना का यह संकेत भी साफ़ है कि भारत के साथ टकराव की भाषा बांग्लादेश के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट होती है कि दक्षिण एशिया में स्थिरता केवल बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि जिम्मेदार शासन और संतुलित विदेश नीति से आती है। शेख हसीना का बयान उसी पुरानी सोच की याद दिलाता है जिसमें पड़ोसी देशों के साथ सहयोग को प्राथमिकता दी जाती थी। मौजूदा हालात में यह देखना अहम होगा कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार हालात को संभालने में कितनी सक्षम साबित होती है और क्या भारत-बांग्लादेश संबंध फिर से विश्वास और स्थिरता की पटरी पर लौट पाते हैं या नहीं।
