12 फरवरी को बिहार में ठप रहेगा ऑटो-ई-रिक्शा और टैक्सी परिचालन

Jitendra Kumar Sinha
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पटना में आयोजित ऑल इंडिया रोड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन बिहार की राज्य कमेटी की बैठक में 12 फरवरी को राज्यव्यापी हड़ताल का निर्णय लिया गया है। इस दिन पूरे बिहार में ऑटो, ई-रिक्शा और टैक्सी का परिचालन बंद रहेगा। साथ ही, सभी जिला मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन भी किया जाएगा। बैठक की अध्यक्षता फेडरेशन के अध्यक्ष चुन्नू सिंह ने की।


फेडरेशन के नेताओं का कहना है कि राज्य में ऑटो, ई-रिक्शा और टैक्सी चालकों की समस्याओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। खासकर जिला स्तर पर किसी भी प्रकार के अधिकृत स्टैंड की व्यवस्था नहीं होना, चालकों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन रहा है। इससे न केवल उन्हें रोजगार में दिक्कत होती है, बल्कि पुलिस और प्रशासन के साथ अनावश्यक टकराव भी झेलना पड़ता है।


हड़ताल के पीछे चालकों की कई अहम मांगें हैं। फेडरेशन का आरोप है कि मुख्यमंत्री वाहन चालक कल्याण योजना का लाभ जमीनी स्तर पर चालकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। योजना कागजों में तो मौजूद है, लेकिन वास्तविक लाभार्थियों को इसका फायदा नहीं मिल रहा है।


इसके अतिरिक्त प्रमुख मांगों में शामिल हैं हर जिले में ऑटो, ई-रिक्शा और टैक्सी के लिए अधिकृत स्टैंड की व्यवस्था। चालकों के लिए पहचान पत्र और लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाना। ट्रैफिक नियमों के नाम पर होने वाली कथित मनमानी और उत्पीड़न पर रोक। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का वास्तविक लाभ। 


फेडरेशन नेताओं का कहना है कि यदि सरकार इन मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान दे, तो लाखों चालकों और उनके परिवारों की स्थिति में सुधार हो सकता है।


12 फरवरी को होने वाली हड़ताल का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। ऑटो, ई-रिक्शा और टैक्सी बंद रहने से स्कूल जाने वाले बच्चे, दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, मरीज और दैनिक यात्री सबसे अधिक प्रभावित होंगे। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में, जहां सार्वजनिक परिवहन के विकल्प सीमित हैं, वहां लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ सकता है।


फेडरेशन ने स्पष्ट किया है कि यह कदम सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए उठाया गया है। उनका कहना है कि वे आम जनता को परेशान करना नहीं चाहते हैं, लेकिन वर्षों से लंबित मांगों को उठाने के लिए यह रास्ता अपनाना मजबूरी बन गया है।


फेडरेशन ने सरकार से अपील की है कि हड़ताल से पहले उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाए और संवाद का रास्ता खोला जाए। यदि सरकार समय रहते ठोस पहल करती है, तो आंदोलन को टाला भी जा सकता है।


चालकों का मानना है कि वे भी समाज का हिस्सा हैं और राज्य की परिवहन व्यवस्था की रीढ़ हैं। उनकी समस्याओं का समाधान न केवल उनके जीवन को बेहतर बनाएगा, बल्कि परिवहन व्यवस्था को भी अधिक सुव्यवस्थित और सुरक्षित करेगा।


12 फरवरी की हड़ताल बिहार की परिवहन व्यवस्था और सरकार की नीतियों पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि क्या चालक समुदाय की आवाज अब सुनी जाएगी?



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