चीनी वैज्ञानिकों ने बनाई - बिना कांटों वाली मछली

Jitendra Kumar Sinha
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चीनी वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई बिना कांटों वाली मछली आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी और जीन-एडिटिंग के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है। यह उपलब्धि केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम लोगों के जीवन, भोजन की आदतों, पोषण सुरक्षा, मत्स्य उद्योग और भविष्य की खाद्य तकनीकों से जुड़ता है। 

सदियों से मछली मानव आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समुद्र, नदियों, झीलों और तालाबों से मिलने वाली यह प्रोटीन से भरपूर खाद्य सामग्री दुनिया की बड़ी आबादी के लिए मुख्य पोषण स्रोत है। लेकिन मछली खाने में एक बड़ी व्यावहारिक समस्या हमेशा से रही है, उसके भीतर मौजूद छोटे-छोटे कांटे। 

कांटे कई बार भोजन करते समय गले में अटक जाती हैं, जिससे दम घुटने का खतरा, चोट, संक्रमण और यहां तक कि मृत्यु तक की घटनाएं सामने आती रही हैं। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए यह खतरा और भी अधिक होता है। इसी समस्या के समाधान की दिशा में चीनी वैज्ञानिकों ने वर्षों की मेहनत और अनुसंधान के बाद बिना कांटों वाली मछली विकसित कर एक नई राह खोल दी है।

इस मछली का नाम ‘झोंगके नंबर 6’ रखा गया है और यह ‘गिबेल कार्प’ नामक मछली की एक उन्नत किस्म है। गिबेल कार्प चीन में व्यापक रूप से पाई जाने वाली और खाई जाने वाली मछली है। यह पहले से ही तेजी से बढ़ने वाली, आसानी से पालन की जा सकने वाली और स्वाद में लोकप्रिय मछली मानी जाती रही है। लेकिन इसकी एक बड़ी कमी इसके मांस में मौजूद असंख्य बारीक कांटे थे। एक सामान्य गिबेल कार्प मछली में 80 से भी अधिक सूक्ष्म कांटे हो सकते हैं, जो मांस के भीतर जाल की तरह फैले रहते हैं। इन्हें निकालना बेहद कठिन होता है और यही वजह है कि बहुत से लोग मछली खाना पसंद नहीं करते हैं या डर के कारण इससे दूरी बनाए रखते हैं। चीन में ही नहीं, भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में भी यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है।

चीनी वैज्ञानिकों ने इस समस्या को केवल पाक-कला या प्रोसेसिंग तकनीक से हल करने की बजाय जैविक स्तर पर समाधान खोजने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने मछली के जीनोम पर गहन अध्ययन शुरू किया। जीनोम वह संपूर्ण आनुवंशिक नक्शा होता है, जिसमें किसी जीव के सभी जीनों की जानकारी मौजूद होती है। छह वर्षों तक चले इस शोध में वैज्ञानिकों ने गिबेल कार्प के डीएनए का सूक्ष्म विश्लेषण किया। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि मछली के शरीर में ये बारीक कांटे किस जीन की वजह से विकसित होते हैं, उनका निर्माण किस अवस्था में शुरू होता है और क्या उन्हें रोका या बदला जा सकता है।

लंबे शोध और प्रयोगों के बाद वैज्ञानिकों ने एक विशेष जीन की पहचान की, जो मछली के शरीर में इन बारीक कांटों के विकास के लिए जिम्मेदार था। यह जीन भ्रूण अवस्था में सक्रिय होकर मछली के मांस के भीतर सूक्ष्म हड्डियों का निर्माण शुरू करता है। एक बार यह जीन सक्रिय हो जाए, तो मछली के बढ़ने के साथ-साथ ये कांटे भी विकसित होते चले जाते हैं। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि यदि इस जीन को सही समय पर निष्क्रिय कर दिया जाए, तो मछली का मुख्य कंकाल यानि रीढ़ और बड़ी हड्डियां तो सामान्य रूप से विकसित होगी, लेकिन मांस के भीतर मौजूद वे खतरनाक बारीक कांटे नहीं बनेंगे।

यहीं से जीन-एडिटिंग तकनीक की भूमिका शुरू होती है। जीन-एडिटिंग एक आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है, जिसके माध्यम से किसी जीव के डीएनए में बहुत सटीक बदलाव किया जा सकता है। इसमें किसी विशेष जीन को हटाया, बदला या निष्क्रिय किया जा सकता है। हाल के वर्षों में CRISPR जैसी तकनीकों ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है। चीनी वैज्ञानिकों ने इसी तरह की उन्नत जीन-एडिटिंग तकनीक का उपयोग करते हुए गिबेल कार्प के भ्रूण अवस्था में उस विशेष जीन को निष्क्रिय कर दिया, जो बारीक कांटों के विकास के लिए जिम्मेदार था।

यह प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और जटिल थी। भ्रूण अवस्था में जीन-एडिटिंग का मतलब है कि मछली के जीवन की सबसे शुरुआती अवस्था में ही उसके डीएनए में बदलाव करना। इसमें जरा सी गलती भी मछली के पूरे विकास को प्रभावित कर सकती थी। लेकिन वैज्ञानिकों ने अत्यंत सावधानी और सटीकता के साथ यह प्रयोग किया। परिणामस्वरूप जो मछलियां विकसित हुईं, उनमें मुख्य कंकाल पूरी तरह से सामान्य था। वे तैर सकती थीं, भोजन कर सकती थीं, बढ़ सकती थीं और उसका आकार, वजन और संरचना पारंपरिक गिबेल कार्प जैसी ही थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उनके मांस के भीतर मौजूद वे बारीक कांटे पूरी तरह गायब थे।

इस उपलब्धि का महत्व केवल एक नई मछली की किस्म तक सीमित नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा और पोषण के दृष्टिकोण से भी एक बड़ा कदम है। मछली दुनिया में प्रोटीन का एक सस्ता, सुलभ और पौष्टिक स्रोत माना जाता है। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन डी, कैल्शियम और कई आवश्यक खनिज पाया जाता है।

मत्स्य उद्योग के लिए भी यह खोज बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। मछली प्रोसेसिंग उद्योग में कांटों को निकालने के लिए काफी मेहनत, समय और लागत लगता है। बिना कांटों वाली मछली से प्रोसेसिंग आसान हो जाएगी, लागत कम होगी और उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर होगी। इससे मछली उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय बाजार भी विस्तृत हो सकता है। 

जीन-एडिटिंग से विकसित खाद्य पदार्थों को लेकर दुनिया भर में बहस भी होती रही है। कुछ लोग इसे वैज्ञानिक प्रगति मानते हैं, तो कुछ इसे प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कहते हैं। चीनी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मछली में कोई बाहरी जीन नहीं डाला गया है, बल्कि सिर्फ उसके अपने जीन को निष्क्रिय किया गया है। 

इस मछली के पर्यावरणीय प्रभाव पर भी वैज्ञानिक नजर बनाए हुए हैं। यदि बिना कांटों वाली मछली को बड़े पैमाने पर तालाबों, नदियों या झीलों में पाला जाता है, तो क्या यह पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करेगी? क्या यह अन्य मछलियों के साथ प्रतिस्पर्धा में कोई असंतुलन पैदा करेगी? क्या इसके प्राकृतिक व्यवहार में कोई बदलाव आएगा? इन सभी सवालों के जवाब ढूंढना जरूरी है, ताकि यह तकनीक जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया जा सके।

चीन पहले भी कृषि और मत्स्य क्षेत्र में जैव-प्रौद्योगिकी के प्रयोगों में अग्रणी रहा है। उच्च उपज वाली फसलें, रोग-प्रतिरोधी पौधे और तेजी से बढ़ने वाली मछलियां विकसित करने में चीन ने बड़ी सफलता हासिल की है। बिना कांटों वाली मछली इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। यह दिखाता है कि कैसे आधुनिक विज्ञान पारंपरिक समस्याओं का स्थायी समाधान दे सकता है।

भारत जैसे देशों के लिए भी यह शोध विशेष रूप से प्रासंगिक है। भारत दुनिया के सबसे बड़े मत्स्य उत्पादक देशों में से एक है और यहां मछली खाने वालों की संख्या भी बहुत अधिक है। लेकिन कांटों की समस्या भारत में भी उतनी ही गंभीर है। यदि भविष्य में इस तरह की तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जाए, तो यह भारतीय मत्स्य उद्योग के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

यह कहा जा सकता है कि ‘झोंगके नंबर 6’ केवल एक नई मछली नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, समाज और भोजन के रिश्ते में एक नए अध्याय की शुरुआत है। यदि वैज्ञानिक सोच को मानवीय जरूरतों से जोड़ा जाए, तो ऐसी खोजें संभव हैं जो आम लोगों के जीवन को सचमुच आसान बना सके। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मछली किस तरह बाजार में आती है, लोगों द्वारा कितनी स्वीकार की जाती है और क्या यह अन्य मछलियों और खाद्य जीवों के लिए भी इसी तरह के नवाचारों का रास्ता खोलती है।



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