बेसहारा गायों के लिए बना - 'रोटी बैंक'

Jitendra Kumar Sinha
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पटना के फतुहा में स्थित श्री गोपीकृष्ण गौ आश्रम ने समाज के सामने सेवा, संवेदना और सनातन संस्कार का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। बेसहारा, बीमार और दूध न देने वाली गायों की पीड़ा को समझते हुए आश्रम द्वारा शुरू किया गया ‘रोटी बैंक’ न केवल गौ संरक्षण की दिशा में एक अभिनव पहल है, बल्कि शहरी जीवन में मानवीय और धार्मिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी है। इस पहल के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि गौ सेवा किसी बड़े आयोजन या धन-संपदा की मोहताज नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों से भी की जा सकती है।


आश्रम के संचालक गोपाल कृष्ण मोदी के नेतृत्व में शुरू हुई इस व्यवस्था के तहत पटना के 60 से अधिक अपार्टमेंटों में स्टील के विशेष बॉक्स लगाए गए हैं। इन बॉक्सों में परिवार अपने घर की पहली रोटी डालते हैं, जिसे परंपरागत रूप से गौ माता को अर्पित करने का प्रतीक माना जाता है। हर सुबह आश्रम की वैन इन सभी अपार्टमेंटों से रोटियां एकत्र कर गौ आश्रम तक पहुंचाती है। यहां इन रोटियों को उन वृद्ध, लाचार और असहाय गायों को खिलाया जाता है, जो दूध न देने के कारण अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं।


इस समय इस सेवा से सैकड़ों परिवार जुड़े हुए हैं और प्रतिदिन 900 से अधिक रोटियां एकत्र हो रही हैं। इन रोटियों से आश्रम में रह रही 33 गौ माताओं का नियमित पोषण हो रहा है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है, बल्कि समाज की सामूहिक संवेदना और सहभागिता का प्रमाण है। श्री गोपाल कृष्ण मोदी का कहना है कि हर घर की रसोई से निकली पहली रोटी यदि गौ माता के लिए समर्पित हो जाए, तो इससे बड़ा कोई सनातन संस्कार नहीं हो सकता है। यह विचार लोगों को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का भी माध्यम बन रहा है।


रोटी बैंक की यह पहल केवल भोजन तक सीमित नहीं है। श्री गोपीकृष्ण गौ आश्रम में गौ आधारित स्वावलंबन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यहां गोबर और गौमूत्र से जैविक खाद, उपले और पंचगव्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जो पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हैं। इससे एक ओर जहां गौ सेवा सुदृढ़ हो रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों को रोजगार और किसानों को जैविक विकल्प भी मिल रहा है। 


भविष्य को देखते हुए आश्रम ने इस रोटी बैंक को 100 अपार्टमेंटों तक विस्तारित करने की योजना बनाई है। यदि यह योजना सफल होती है, तो न केवल अधिक गायों को जीवनदान मिलेगा, बल्कि समाज में सेवा और करुणा की भावना और भी मजबूत होगी। फतुहा का यह रोटी बैंक यह साबित करता है कि यदि संकल्प सच्चा हो और समाज साथ दे, तो छोटे प्रयास भी बड़ी सामाजिक क्रांति का रूप ले सकता है।


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