छोटा हाथी जैसा दिखता है - “टैपिर”

Jitendra Kumar Sinha
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https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/5/58/Schabrackentapir_Tapirus_indicus_Tiergarten-Nuernberg-1.jpg


टैपिर दुनिया के सबसे अनोखे और प्राचीन स्तनधारियों में गिना जाता है। पहली नजर में इसे देखकर ऐसा लगता है मानो यह हाथी और सूअर का मिला-जुला रूप हो। इसकी सबसे खास पहचान इसकी छोटी, लचीली सूंड जैसी नाक है, जो इसे अन्य जानवरों से बिल्कुल अलग बनाती है। यही कारण है कि टैपिर को अक्सर “छोटा हाथी” भी कहा जाता है। यह जीव मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिका, मध्य अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के घने, नम और वर्षावन क्षेत्रों में पाया जाता है।


टैपिर का शरीर भारी और गोल-मटोल होता है। इसके पैर छोटे लेकिन मजबूत होते हैं, जो इसे जंगल की कीचड़ भरी जमीन और दलदली इलाकों में चलने में मदद करते हैं। इसके कान छोटे और गोल होते हैं तथा पूंछ बहुत छोटी होती है। मलायन टैपिर की खास बात यह है कि उसके शरीर का रंग काला-सफेद होता है, जबकि अन्य प्रजातियों के टैपिर भूरे या गहरे रंग के होते हैं। यही रंग उसे जंगल के वातावरण में छिपने में मदद करता है।


टैपिर मुख्यतः शाकाहारी होता है। यह पत्तियां, कोमल टहनियां, फल और जलीय पौधे खाता है। इसकी लचीली नाक भोजन को पकड़ने और तोड़ने में अत्यंत उपयोगी होती है। भोजन के मामले में टैपिर बहुत चयनशील नहीं होता है, लेकिन उसे ताजे फल विशेष रूप से पसंद होते हैं। इस कारण टैपिर जंगल के बीज फैलाने में भी अहम भूमिका निभाता है, जिससे वन पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है।


स्वभाव से टैपिर शर्मीला और एकांतप्रिय जीव है। यह अधिकतर अकेला रहना पसंद करता है। दिन के समय यह घने झाड़ियों या पानी के पास छिपकर आराम करता है और रात के समय भोजन की तलाश में निकलता है। टैपिर को पानी बेहद पसंद है। यह अच्छा तैराक होता है और खतरे की स्थिति में अक्सर पानी में कूदकर खुद को शिकारियों से बचाता है। कई बार यह नदी या तालाब के तल में जाकर अपनी नाक को ऊपर रखकर सांस भी ले सकता है।


वैज्ञानिकों के अनुसार, टैपिर की उत्पत्ति लगभग 2 करोड़ वर्ष पहले हुई थी, यानि यह जीव डायनासोरों के बाद के प्राचीन काल से पृथ्वी पर मौजूद है। वर्तमान समय में टैपिर की चार प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश सभी संकटग्रस्त हैं। जंगलों की कटाई, शिकार और मानव गतिविधियों के कारण इनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।


आज टैपिर न केवल अपनी विचित्र बनावट के कारण बल्कि अपनी प्राचीनता और पारिस्थितिक महत्व के कारण भी विशेष ध्यान का विषय है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए, तो यह “छोटा हाथी” आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल किताबों और तस्वीरों तक ही सीमित रह जाएगा।



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