पंजाब की मिट्टी में रची-बसी फ़िल्म ‘रीत और रिवाज’ एक ऐसी पारिवारिक ड्रामा है, जो परंपरा और व्यक्तिगत सपनों के बीच चलने वाले टकराव को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। यह फिल्म केवल एक किशोर की कहानी नहीं है, बल्कि हर उस परिवार की दास्तान है जहाँ पीढ़ियों से चली आ रही अपेक्षाएँ नई पीढ़ी के सपनों से टकराती हैं।
फ़िल्म की कहानी केंद्रित है 16 वर्षीय घुप्पी सिंह पर, जो हकलाने की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। बोलने में कठिनाई होने के बावजूद घुप्पी के भीतर आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा है। उसे फुटबॉल से बेहद लगाव है और वह अपने दम पर जीवन में कुछ कर दिखाना चाहता है।
लेकिन घुप्पी के पिता हरमिंदर सिंह, जो एक सम्मानित रागी गायक हैं, अपने बेटे को उसी विरासत में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। उनके लिए संगीत केवल पेशा नहीं है, बल्कि पहचान, सम्मान और सामाजिक स्वीकृति का माध्यम है। ऐसे में पिता और पुत्र के बीच एक मौन संघर्ष शुरू हो जाता है, जहाँ एक ओर परंपरा है, तो दूसरी ओर आत्मनिर्भरता और सपनों की उड़ान।
हरमिंदर सिंह का चरित्र एक ऐसे पिता का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने बेटे का भला चाहता है, लेकिन अपने अनुभवों और समाज की कसौटियों से बाहर नहीं निकल पाता है। उन्हें लगता है कि संगीत की दुनिया में नाम बनाना ही घुप्पी के लिए सुरक्षित भविष्य है।
वहीं घुप्पी के लिए फुटबॉल केवल खेल नहीं है, बल्कि अपनी कमजोरी से बाहर निकलने और खुद को साबित करने का जरिया है। उसकी हकलाहट उसे समाज में बार-बार असहज बनाती है, लेकिन मैदान पर वह खुद को आजाद महसूस करता है। यही द्वंद्व फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है।
फिल्म ‘रीत और रिवाज’ हकलाने जैसी समस्या को सहानुभूति और सम्मान के साथ दिखाती है। घुप्पी के संघर्ष केवल शारीरिक या मानसिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी हैं। स्कूल, परिवार और समाज, हर जगह उसे खुद को साबित करना पड़ता है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या किसी बच्चे की पहचान केवल उसकी बोलने की क्षमता या पारिवारिक विरासत से तय होनी चाहिए? या फिर उसे अपने सपनों के अनुसार रास्ता चुनने की आजादी मिलनी चाहिए?
घुप्पी सिंह के किरदार में मिहिर ने बेहद प्रभावशाली अभिनय किया है। हकलाहट, झिझक और अंदरूनी साहस को उन्होंने स्वाभाविक ढंग से परदे पर उतारा है। सुविंदर विक्की हरमिंदर सिंह के रूप में दमदार नज़र आते हैं। उनका अभिनय यह दिखाता है कि एक पिता कैसे प्रेम और अनुशासन के बीच उलझा रहता है। माही जैन और तरनजीत कौर सहायक भूमिकाओं में कहानी को संतुलन और भावनात्मक सहारा देती हैं।
निर्देशक अमीत गुप्ता आहूजा ने कहानी को बिना अतिरिक्त नाटकीयता के सादगी से पेश किया है। पंजाब की पृष्ठभूमि, लोक-संगीत और पारिवारिक माहौल फिल्म को वास्तविकता के करीब लाता है। कैमरा वर्क और दृश्य संयोजन भावनाओं को उभारता है, बिना उन्हें थोपे।
‘रीत और रिवाज’ केवल परंपरा बनाम आधुनिकता की कहानी नहीं है, बल्कि यह संवाद की जरूरत पर जोर देती है। फिल्म बताती है कि सपनों को दबाने से नहीं, बल्कि समझने से परिवार मजबूत होते हैं।
अंततः यह फ़िल्म दर्शकों से यही प्रश्न पूछती है कि क्या अपनी अगली पीढ़ी को केवल अपनी इच्छाओं का विस्तार बनाना चाहते हैं, या उन्हें अपनी पहचान गढ़ने का अवसर देंगे? भावनात्मक, प्रेरक और विचारोत्तेजक ‘रीत और रिवाज’ एक ऐसी फिल्म है, जो लंबे समय तक मन में बनी रहती है।
