आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने बीते सौ वर्षों में संक्रामक रोगों के खिलाफ जो जीत हासिल की थी, वह अब एक बार फिर चुनौती के दौर में पहुंचती दिख रही है। एंटीबायोटिक दवाओं को मानव इतिहास की सबसे बड़ी चिकित्सा उपलब्धियों में गिना जाता है, लेकिन आज वही एंटीबायोटिक अपनी प्रभावशीलता खोती जा रही हैं। इसका सबसे भयावह उदाहरण हाल ही में सामने आया है, जहां अस्पतालों में फैलने वाला जानलेवा “एंटरोबैक्टर बैक्टीरिया” अब “कोलिस्टिन” जैसी “आख़िरी” दवा के प्रति भी प्रतिरोधी होता जा रहा है।
वाराणसी स्थित Institute of Medical Sciences, Banaras Hindu University के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा किए गए इस शोध ने न केवल चिकित्सा समुदाय को झकझोर दिया है, बल्कि आम लोगों के लिए भी यह एक गंभीर चेतावनी है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल The Microbe (एल्सेवियर) में प्रकाशित हुआ है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और गंभीरता, और भी बढ़ जाती है।
यह शोध गोपालनाथ के नेतृत्व में किया गया। अध्ययन के दौरान एंटरोबैक्टर बैक्टीरिया के 50 से अधिक नमूनों की जांच की गई। परिणाम चौंकाने वाले थे। 90 प्रतिशत से अधिक नमूनों में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस (MDR) पाया गया। एंटीबायोटिक प्रतिरोध का स्तर 0.6 से अधिक दर्ज किया गया। सेफ्ट्रियाक्सोन, सिप्रोफ्लॉक्सासिन, एमिकासिन और पाइपरासिलिन-टैजोबैक्टम जैसी प्रमुख दवाएं बेअसर रहीं। कुछ मामलों में कोलिस्टिन, जिसे आख़िरी विकल्प माना जाता है, उसके प्रति भी प्रतिरोध दर्ज हुआ। यह स्थिति चिकित्सा विज्ञान के लिए “रेड अलर्ट” से कम नहीं है।
एंटरोबैक्टर एक ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया है, जो सामान्यतः मानव आंत (गट) में पाया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में यह नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन जब रोगी की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो, व्यक्ति आईसीयू में भर्ती हो, हाल ही में सर्जरी हुई हो और लंबे समय तक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल किया गया हो, तब यही बैक्टीरिया गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है।
एंटरोबैक्टर से होने वाले प्रमुख संक्रमण है निमोनिया- आईसीयू में वेंटिलेटर पर मौजूद मरीजों में यह बैक्टीरिया फेफड़ों को संक्रमित कर सकता है। सेप्सिस- रक्त में संक्रमण फैलने पर सेप्सिस की स्थिति बनती है, जो जानलेवा हो सकती है। घाव और सर्जिकल साइट इंफेक्शन- ऑपरेशन के बाद घाव में संक्रमण का एक बड़ा कारण एंटरोबैक्टर बन रहा है। मूत्र मार्ग संक्रमण (UTI)- खासतौर पर कैथेटर लगे मरीजों में इसका खतरा अधिक रहता है।
मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस का अर्थ है कि बैक्टीरिया एक साथ कई एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ खुद को ढाल लेता है। इससे इलाज के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं। आईएमएस-बीएचयू के शोध में यह सामने आया कि पहली पंक्ति (First-line) की दवाएं पूरी तरह बेअसर। दूसरी पंक्ति (Second-line) की दवाओं पर भी असर नहीं। तीसरी और आख़िरी पंक्ति यानी कोलिस्टिन तक पर खतरा। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकता है।
कोलिस्टिन को “रिज़र्व एंटीबायोटिक” कहा जाता है। इसका इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब सभी अन्य दवाएं फेल हो जाएं। यह दवा किडनी पर गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकती है। सीमित परिस्थितियों में ही दी जाती है। बिना जरूरत इस्तेमाल करना खतरनाक है। अब जब इसी दवा के प्रति प्रतिरोध दिखने लगा है, तो स्थिति बेहद चिंताजनक है।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के पीछे मुख्य कारण है एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा उपयोग- सामान्य सर्दी-खांसी में भी एंटीबायोटिक लेना। बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेना- फार्मेसी से सीधे दवाएं खरीद लेना। अधूरा इलाज- लक्षण ठीक होते ही दवा बंद कर देना। गलत डोज- निर्धारित मात्रा से कम या ज्यादा दवा लेना। अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की कमी- हाथों की सफाई, उपकरणों की नसबंदी और आइसोलेशन प्रोटोकॉल का पालन न होना।
एंटरोबैक्टर मुख्य रूप से Hospital Acquired Infection (HAI) यानि अस्पताल में होने वाले संक्रमण के लिए जिम्मेदार है। आईसीयू, सर्जिकल वार्ड और नवजात शिशु इकाइयों में इसका खतरा सबसे अधिक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हर अस्पताल में Antibiotic Stewardship Program (ASP) को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। इसके तहत सही मरीज को सही दवा, सही डोज, सही अवधि के लिए और सही समय पर एंटीबायोटिक का उपयोग सुनिश्चित किया जाता है।
प्रो. गोपालनाथ के अनुसार “जो दवाएं फिलहाल फेल हो रही हैं, उन्हें कुछ अंतराल के बाद ही दोबारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि अभी से वैकल्पिक उपचारों और बैक्टीरियोफेज थेरेपी पर काम नहीं किया गया, तो भविष्य में स्थिति बेहद भयावह हो सकती है।”
बैक्टीरियोफेज ऐसे वायरस होते हैं, जो केवल बैक्टीरिया को संक्रमित कर उन्हें नष्ट करते हैं। यह थेरेपी एंटीबायोटिक का विकल्प बन सकती है। खास बैक्टीरिया को लक्षित करती है और दुष्प्रभाव अपेक्षाकृत कम होते हैं। भारत में इस दिशा में अभी सीमित शोध हुआ है।
मरीजों और आम जनता के लिए जरूरी सावधानियां है बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक न लें। पूरा दवा कोर्स जरूर पूरा करें। वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक की मांग न करें। अस्पताल में स्वच्छता नियमों का पालन करें और हाथ धोने की आदत को जीवनशैली बनाएं। स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका है हैंड हाइजीन का सख्ती से पालन, संक्रमित मरीजों का आइसोलेशन, उपकरणों की नियमित नसबंदी और दवा प्रतिरोध की नियमित निगरानी करना। नीतिगत स्तर पर एंटीबायोटिक बिक्री पर सख्त नियंत्रण, राष्ट्रीय स्तर पर रेजिस्टेंस सर्विलांस, मेडिकल पाठ्यक्रम में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर विशेष जोर और रिसर्च फंडिंग बढ़ाना चाहिए।
आईएमएस-बीएचयू का यह शोध केवल एक अकादमिक अध्ययन नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यदि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर अभी कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब साधारण संक्रमण भी मौत का कारण बन जाएगा। यह लड़ाई सिर्फ डॉक्टरों या वैज्ञानिकों की नहीं है, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। दवा का विवेकपूर्ण उपयोग, स्वच्छता और जागरूकता ही इस अदृश्य लेकिन घातक दुश्मन के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत है।
