बोधगया विश्वभर के बौद्ध अनुयायियों के लिए आस्था और साधना का प्रमुख केंद्र है। महाबोधि महाविहार के आसपास विभिन्न देशों द्वारा स्थापित बौद्ध मठ न केवल धार्मिक गतिविधियों के केंद्र हैं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का भी बड़ा माध्यम रहे हैं। ऐसे में बोधगया में बौद्ध मठों के निर्माण और उपयोग को लेकर जिला प्रशासन द्वारा अचानक सख्ती बरतना चर्चा का विषय बन गया है।
गया जी जिला प्रशासन को हाल के महीनों में यह शिकायतें मिली थीं कि कुछ बौद्ध मठों का उपयोग धार्मिक उद्देश्य से हटकर व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। आरोप यह भी लगे है कि कई परिसरों में बिना नगर निकाय की अनुमति के निर्माण कार्य कराए गए हैं, जबकि भवन नक्शा स्वीकृति और कर भुगतान जैसे नियमों की अनदेखी की गई है। इन्हीं शिकायतों के आधार पर जिलाधिकारी के निर्देश पर एक विशेष जांच टीम का गठन किया गया है।
जांच शुरू होते ही प्रशासन ने बोधगया क्षेत्र में नए बौद्ध मठों के निर्माण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। इसके साथ-साथ पुराने मठ परिसरों में किसी भी प्रकार के नए निर्माण या विस्तार कार्य को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि जब तक सभी मठों की वैधानिक स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती है, तब तक किसी तरह की निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी।
प्रशासन द्वारा गठित टीम मठों की बहुआयामी जांच कर रही है। इसमें कमरों की वास्तविक संख्या और उसका उपयोग। आवासीय बनाम व्यावसायिक गतिविधियों की स्थिति। विदेशी नागरिकों के ठहराव की जानकारी। वीजा और पासपोर्ट का सत्यापन। कर भुगतान की स्थिति। भवन नक्शा स्वीकृति और नगर निकाय की अनुमति। जैसे बिंदुओं को शामिल किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, यह जांच पारदर्शिता सुनिश्चित करने और कानून के दायरे में गतिविधियों को लाने के उद्देश्य से की जा रही है।
अपर समाहर्ता की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी गठित की गई है, जिसे 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी है। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। यदि किसी मठ में गंभीर अनियमितता पाई जाती है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई, जुर्माना या उपयोग में बदलाव जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
इस प्रशासनिक सख्ती से कई बौद्ध संगठनों और मठ प्रबंधन में चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि अधिकांश मठ धार्मिक, शैक्षणिक और ध्यान-साधना से जुड़ी गतिविधियों में संलग्न हैं। कुछ मठों ने यह भी तर्क दिया है कि बढ़ती श्रद्धालुओं और भिक्षुओं की संख्या के कारण आवासीय सुविधाओं का विस्तार आवश्यक हो गया था, जिसे गलत तरीके से व्यावसायिक उपयोग समझ लिया गया है।
बोधगया का पर्यटन मुख्यतः बौद्ध तीर्थयात्रियों पर निर्भर करता है। मठों में ठहरने वाले विदेशी श्रद्धालु स्थानीय होटल, परिवहन, गाइड और हस्तशिल्प व्यवसाय को भी सहारा देते हैं। ऐसे में यदि लंबे समय तक निर्माण और उपयोग पर रोक रहती है, तो इसका असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी पड़ सकता है। प्रशासन का दावा है कि यह कदम दीर्घकाल में क्षेत्र को व्यवस्थित और विश्वसनीय बनाने में मदद करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन और धार्मिक संस्थानों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। कानून का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है, लेकिन साथ ही बोधगया की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पहचान और संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना होगा। पारदर्शी नियम, स्पष्ट दिशा-निर्देश और संवाद के जरिए ही इस विवाद का स्थायी समाधान निकल सकता है।
गया जी, विशेषकर बोधगया में बौद्ध मठों के निर्माण पर लगी रोक ने धार्मिक, प्रशासनिक और पर्यटन तीनों क्षेत्रों में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले 30 दिनों में कमेटी की रिपोर्ट यह तय करेगी कि यह सख्ती केवल अस्थायी जांच प्रक्रिया है या भविष्य में बोधगया की धार्मिक-पर्यटन संरचना को नए सिरे से आकार देने वाला कदम। फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासनिक फैसलों और उनके दूरगामी प्रभावों पर टिकी हैं।
