1976 में प्रदर्शित हिंदी फिल्म “मां” अपने समय की उन चुनिंदा फिल्मों में रही है, जिन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक गहरा नैतिक संदेश दिया है। यह फिल्म उस वर्ष की नौवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिन्दी फिल्म थी, जो इसकी लोकप्रियता और दर्शकों से मिले व्यापक समर्थन को दर्शाती है। जानवरों के प्रति करुणा, मानवता और मातृत्व के भाव को केंद्र में रखकर बनी यह फिल्म आज भी अपनी संवेदनशीलता के कारण याद की जाती है।
फिल्म “मां” की कथा का मूल भाव करुणा है। केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि मूक पशुओं के लिए भी। कहानी यह दर्शाती है कि मातृत्व केवल जैविक संबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक व्यापक मानवीय भावना है, जो हर जीव के प्रति संवेदना सिखाती है। फिल्म में जानवरों के साथ होने वाली क्रूरता के विरुद्ध एक सशक्त आवाज उठाई गई है, जो 1970 के दशक के सिनेमा में अपेक्षाकृत दुर्लभ विषय था।
फिल्म की सफलता का एक बड़ा कारण इसका प्रभावशाली कलाकार वर्ग रहा है। “धर्मेंद्र” ने अपने सहज और संवेदनशील अभिनय से कहानी को मजबूती दी। “हेमा मालिनी” ने करुणा और नारी-संवेदना को अपने अभिनय से जीवंत किया। “निरूपा रॉय” हमेशा की तरह मातृ-भूमिका में गहरी छाप छोड़ती हैं। “ओम प्रकाश” ने हास्य और भावनात्मक संतुलन बनाए रखा। “रंजीत” ने नकारात्मक भूमिका में कहानी को आवश्यक टकराव दिया। “पद्मा खन्ना” ने अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाया। इन सभी कलाकारों का संतुलित अभिनय फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है।
फिल्म का निर्देशन एम. ए. थिरुमुगम ने किया, जो पशु-केंद्रित संवेदनशील कथाओं के लिए जाने जाते थे। उनकी निर्देशन शैली में भावुकता के साथ-साथ सामाजिक चेतना स्पष्ट दिखती है। “मां“ में उन्होंने दृश्य-विन्यास और कथानक के माध्यम से दर्शकों को करुणा का महत्व सहज रूप से समझाया है।
फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया है। उनके संगीत ने कहानी के भावनात्मक उतार-चढ़ाव को और प्रभावी बनाया है। गीतों और पृष्ठभूमि संगीत ने दृश्यों को भावनात्मक गहराई दी है, जिससे दर्शक कहानी से और अधिक जुड़ सके।
1976 में मां का नौवीं सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बनना इस बात का प्रमाण है कि दर्शकों ने इसके विषय और प्रस्तुति को खुले दिल से स्वीकार किया है। यह केवल एक पारिवारिक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक संदेश वाली रचना थी, जिसने व्यावसायिक सफलता भी हासिल की।
फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसका तमिल रीमेक “अन्नाई ओरु आलयम” शीर्षक से बनाया गया है। यह रीमेक भी उसी मानवीय और करुणामय भावना को आगे बढ़ाता है, जो मूल हिन्दी फिल्म की आत्मा थी।
“मां” (1976) अपने समय से आगे की सोच रखने वाली फिल्म थी। जानवरों के प्रति दया, मातृत्व की व्यापक परिभाषा और मानवता के मूल्यों को जिस सादगी और प्रभाव से इस फिल्म ने प्रस्तुत किया, वह आज भी प्रासंगिक है। यही कारण है कि दशकों बाद भी “मां” को केवल एक हिट फिल्म नहीं, बल्कि एक संदेशपूर्ण सिनेमा के रूप में याद किया जाता है।
