शिव और शक्ति के अभिसरण का महापर्व है - “महाशिवरात्रि”

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय सनातन परंपरा में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं होते हैं, बल्कि वे जीवन-दर्शन, ब्रह्मांडीय चेतना और आत्मबोध के द्वार खोलते हैं। महाशिवरात्रि ऐसा ही एक महापर्व है। यह केवल एक तिथि या व्रत नहीं है, बल्कि शिव और शक्ति के अभिसरण, पुरुष और प्रकृति के मिलन, चेतना और ऊर्जा के एकाकार होने का उत्सव है।

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि, सामान्य रात्रियों से भिन्न है। यह वह रात्रि है जब साधक जागरण करता है, इंद्रियों पर विजय पाने का प्रयास करता है और आत्मा को शिवत्व की ओर ले जाने का संकल्प लेता है।

शास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि वह दिव्य अवसर है जब भगवान शिव समाधि से जागृत होकर सृष्टि-लीला में प्रवृत्त हुए थे। इसे शिव और पार्वती के विवाह दिवस के रूप में भी स्वीकार किया गया है।

शिवपुराण, लिंगपुराण, स्कंदपुराण तथा पद्मपुराण में महाशिवरात्रि का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि इस व्रत को करने से साधक को हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में भगवान शिव निराकार से साकार होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।

जब ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब भगवान शिव एक अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों उसकी सीमा नहीं खोज सके। अंततः उन्होंने शिव को सर्वोच्च स्वीकार किया और पहली बार शिवलिंग की पूजा की। इसी कारण महाशिवरात्रि को भगवान शिव का जन्म-दिवस भी कहा जाता है।

शिवरात्रि व्रत की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवी लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री, इंद्राणी, सीता, पार्वती और रति जैसी देवियों ने भी शिवरात्रि का व्रत किया था। यह व्रत केवल स्त्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के लिए आत्मशुद्धि का माध्यम है।

मान्यता है कि महाशिवरात्रि के पश्चात प्रत्येक मास की शिवरात्रि को विधिपूर्वक करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में चार विशेष संकल्पों का उल्लेख है, भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा, रुद्र मंत्रों का जाप, शिव मंदिर में उपवास और रात्रि जागरण, काशी में देहत्याग की भावना (अर्थात शिव-स्मरण के साथ जीवन समाप्त करना) इसका पालन करने से जीवात्मा शिवलोक को प्राप्त होती है।

अविवाहित कन्याएँ योग्य वर की प्राप्ति हेतु शिवरात्रि व्रत करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएँ अपने दांपत्य जीवन में सुख, शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए यह व्रत रखती हैं। माता पार्वती द्वारा कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा इस व्रत को और भी पवित्र बनाती है।

महाशिवरात्रि में उपवास केवल शरीर को कष्ट देने का साधन नहीं है, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास है। रात्रि जागरण के माध्यम से साधक पंचेंद्रियों द्वारा आत्मा पर पड़ने वाले विकारों को पहचानता है और उनसे मुक्त होने का प्रयास करता है। शिवपुराण के अनुसार “जागरण से आत्मा जागृत होती है।”

शिवलिंग पूजन का प्रतीकात्मक अर्थ होता है क्रोध और ताप को शांत करने के लिए जलाभिषेक, त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) पर विजय का प्रतीक है बेलपत्र, शुभता और शीतलता का घोतक है चंदन, कष्ट और दुःख का नाश करता है धूप और अज्ञान के अंधकार से ज्ञान का प्रकाश देता है दीपक।

समुद्र मंथन के समय उत्पन्न हलाहल विष ने सम्पूर्ण सृष्टि को संकट में डाल दिया था तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष के प्रभाव को कम करने हेतु देवताओं ने रात्रि भर जागरण, नृत्य और संगीत किया था। यही परंपरा आगे चलकर महाशिवरात्रि के जागरण का आधार बना।

महाशिवरात्रि सिखाती है कि शिव कोई दूर बैठा हुआ देवता नहीं है, बल्कि भीतर स्थित चेतना है। जब अहंकार का विसर्जन होता है, तब शिव का प्राकट्य होता है।

महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि आत्मा के शिवत्व में प्रवेश करने की रात्रि है। यह रात्रि बताती है कि “जहाँ चेतना है, वहीं शिव है।”



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