प्रकृति ने जीव-जगत में ऐसे अनेक प्राणी रचे हैं, जो वैज्ञानिक समझ की सीमाओं को चुनौती देते हैं। “प्लैटिपस” उन्हीं में से एक है। यह ऐसा स्तनधारी है, जो अंडे देता है, एक तथ्य जिसने उन्नीसवीं सदी में वैज्ञानिकों को चकित कर दिया था। ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी हिस्सों और तस्मानिया में पाया जाने वाला यह अर्ध-जलीय जीव अपनी आकृति, व्यवहार और जैविक क्षमताओं के कारण आज भी शोध का विषय बना हुआ है।
“प्लैटिपस” का शरीर मानो कई जीवों का संयोजन हो। इसकी चोंच बत्तख जैसी, पूंछ बीवर जैसी और पैर ऊदबिलाव जैसे होते हैं। घने, जलरोधी फर की परत इसे ठंडे पानी में भी गर्म रखती है। यह फर हवा को फँसाकर ऊष्मा-संरक्षण का काम करता है, जिससे यह लंबे समय तक पानी में सक्रिय रह सकता है। इसकी आँखें और कान पानी में गोता लगाते समय बंद हो जाते हैं, जिससे यह पूरी तरह चोंच पर निर्भर हो जाता है।
“प्लैटिपस” उन गिने-चुने स्तनधारियों में शामिल है जो अंडे देते हैं। ये प्राणी ‘मोनोट्रीम’ कहलाते हैं। मादा प्लैटिपस मिट्टी के बिल में एक से तीन अंडे देती है। अंडों से बच्चे निकलने के बाद मादा उन्हें दूध पिलाती है, लेकिन रोचक बात यह है कि इसके पास निप्पल नहीं होते। दूध त्वचा के रोमछिद्रों से निकलकर फर पर जमा होता है, जिसे बच्चे चाटकर पीते हैं। यह स्तनधारी वर्ग में एक अनोखा प्रजनन तरीका है।
“नर प्लैटिपस” के पिछले पैरों में विषैले कांटे (स्पर) होते हैं। इनका उपयोग वह मुख्यतः आत्मरक्षा और प्रजनन के मौसम में प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबले के लिए करता है। यह विष मनुष्यों के लिए जानलेवा नहीं होता है, लेकिन अत्यंत दर्दनाक हो सकता है और इसका असर कई दिनों तक रह सकता है। मादा में ये कांटे नहीं होते हैं, जो नर और मादा के बीच स्पष्ट अंतर दर्शाते हैं।
“प्लैटिपस” की सबसे आश्चर्यजनक विशेषताओं में से एक है इसकी ‘इलेक्ट्रो-रिसेप्शन’ क्षमता। इसकी चोंच में विशेष संवेदक होता है, जो पानी में शिकार की मांसपेशियों से निकलने वाले हल्के विद्युत संकेतों को पकड़ लेता है। गंदले या अंधेरे पानी में भी यह क्षमता इसे सटीक शिकार करने में मदद करती है। यही कारण है कि यह आँखें बंद होने के बावजूद भोजन खोज लेता है।
“प्लैटिपस” का आहार मुख्यतः कीड़े, लार्वा, केंचुए, झींगे और छोटे जलीय जीवों से बना होता है। यह नदी या झील की तलहटी में चोंच से मिट्टी खोदकर भोजन खोजता है। अपने गालों में भोजन जमा कर यह सतह पर आता है और फिर उसे चबाता है। एक दिन में यह अपने शरीर के वजन के लगभग 20–30 प्रतिशत के बराबर भोजन कर सकता है, जो इसकी उच्च ऊर्जा आवश्यकताओं को दर्शाता है।
यह जीव आमतौर पर सुबह और शाम के समय अधिक सक्रिय रहता है। दिन के बाकी समय यह नदी किनारे बने जटिल बिलों में विश्राम करता है। ये बिल कई मीटर लंबा हो सकता है और इनमें अलग-अलग कक्ष होता है। “प्लैटिपस” एकाकी स्वभाव का होता है और केवल प्रजनन काल में ही नर-मादा साथ आता है।
“प्लैटिपस” अभी संकटग्रस्त की सूची में नहीं है, लेकिन आवास विनाश, जल प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन इसके लिए बढ़ती चुनौतियाँ हैं। नदियों का प्रदूषण और जल प्रवाह में बदलाव इसके भोजन और प्रजनन दोनों को प्रभावित कर सकता है। संरक्षण प्रयासों के माध्यम से इसके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना आवश्यक है।
“प्लैटिपस” प्रकृति की अद्भुत रचनात्मकता का प्रतीक है। अंडे देने वाला स्तनधारी होना, विषैले कांटे, और विद्युत-संवेदी चोंच जैसी विशेषताएँ इसे जीव-जगत में विशिष्ट बनाती हैं। यह न केवल वैज्ञानिक शोध के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी सिखाता है कि प्रकृति में विविधता और अनोखापन कितना गहरा और मूल्यवान है।
