बिहार में शराबबंदी कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं रही। यह एक राजनीतिक संकल्प, एक नैतिक दावा, एक सामाजिक प्रयोग और धीरे-धीरे राजनीतिक हथियार में तब्दील हो चुकी है। यह नीति जितनी कागजों पर कठोर है, उतनी ही जमीन पर लचीली, और जितनी भाषणों में पवित्र, उतनी ही व्यवहार में विरोधाभासी दिखती है। बिहार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो शराबबंदी की “हकीकत” से वाक़िफ़ न हो। फर्क बस इतना है कि कोई इसे ढाल बनाकर बचाव करता है तो कोई इसे हथियार बनाकर वार, और इसी द्वंद्व में बिहार की राजनीति पिछले नौ वर्षों से घूम रही है।
1 अप्रैल 2016, जिस दिन दुनिया फूल्स डे मनाती है, उसी दिन बिहार ने शराबबंदी लागू की थी। यह संयोग था या इतिहास का व्यंग्य, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि इस नीति का चरित्र शुरू से ही विवादास्पद रहा है। नीति का औपचारिक उद्देश्य था कि घरेलू हिंसा में कमी होगी, महिलाओं को सुरक्षा मिलेगा, गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य बेहतर रहेगा। लेकिन शुरुआत से ही सवाल उठ रहा है कि क्या पूर्ण प्रतिबंध व्यवहारिक है? क्या राज्य की प्रवर्तन क्षमता इतनी मजबूत है? क्या समाज को साथ लिए बिना कानून थोपा जा सकता है?
शराबबंदी को नैतिक राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बताया गया है। लेकिन बिहार की जमीन पर नैतिकता और यथार्थ का टकराव साफ़ दिखने लगा है। यथार्थ की तस्वीर है कि हर जिले में अवैध शराब, जहरीली शराब से मौतें, जेलों में क्षमता से कई गुना कैदी, गरीब, दलित, पिछड़े तबकों की गिरफ्तारी, बड़े तस्कर और माफिया प्रायः अछूते हैं। यह प्रश्न बार-बार उठाता रहा है कि क्या कानून अमीर और गरीब के लिए एक समान है?
शराबबंदी ने बिहार की न्याय व्यवस्था पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। आँकड़ों की सच्चाई है कि लाखों मुकदमे दर्ज है, निचली अदालतों में वर्षों की पेंडेंसी और जेलों में 70-80% कैदी शराबबंदी से जुड़े मामलों में हैं। यहाँ से शराबबंदी सामाजिक सुधार से ज्यादा दंडात्मक शासन में बदलती दिखी है।
महिलाओं के नाम पर शराबबंदी लाई गई है और यह भी सच है कि कई ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने इसका समर्थन किया है। इसका सकारात्मक पहलू है कुछ क्षेत्रों में घरेलू हिंसा में कमी आना, घर के खर्च में सुधार होना और महिला समूहों का समर्थन। लेकिन दूसरी तस्वीर है जहरीली शराब के कारण हुई विधवाएँ, परिवार के पुरुष जेल में, रोजगार छिनना और पुलिसिया उत्पीड़न से महिला लाभार्थी भी बनी, और पीड़िता भी।
शराब से बिहार को हर साल हजारों करोड़ का राजस्व मिलता था। शराबबंदी के बाद से राज्य ने यह राजस्व छोड़ा, वैकल्पिक आय के स्रोत खोजे और टैक्स का बोझ अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर बढ़ा। यह सवाल आज भी जिंदा है कि क्या नैतिकता की कीमत आम आदमी चुका रहा है?
हालियां विधानसभा सत्र ने दिखा दिया है कि शराबबंदी अब सिर्फ नीति नहीं है, राजनीतिक युद्धभूमि बन चुकी है। बिहार विधानसभा में बहस अब नीति से ज्यादा व्यक्तिगत आरोपों पर, सामाजिक सरोकार से ज्यादा राजनीतिक चुनौती पर और सुधार से ज्यादा अपमान और प्रतिशोध पर केंद्रित दिखी है। जब बहस चुनौती में बदली और चुनौती जांच की माँग में तो साफ़ हो गया कि मुद्दा नीति नहीं है, नैतिक श्रेष्ठता की राजनीति है।
शराबबंदी पर बहस ने एक और डर पैदा किया है कि अगर सचमुच परतें खुलीं, तो कौन बचेगा? सत्ता पक्ष, विपक्ष, नौकरशाही, पुलिस या तंत्र। सब किसी न किसी स्तर पर इस व्यवस्था के हिस्सेदार रहे हैं। इसलिए शायद कोई भी पूरी सच्चाई नहीं चाहता है।
अब यह स्वीकार करने का समय है कि शराबबंदी पूरी तरह असफल नहीं है लेकिन पूरी तरह सफल भी नहीं है। अब सुधार जरूरी है छोटे अपराधियों को राहत, बड़े माफियाओं पर कार्रवाई, वैकल्पिक नशामुक्ति मॉडल, सामाजिक जागरूकता और कानूनी सरलीकरण।
भविष्य में होने वाली चुनावों में शराबबंदी मुद्दा बन सकती है। आरोप-प्रत्यारोप तेज हो सकते हैं और नैतिकता की आड़ में सियासत हो सकती है। लेकिन सवाल वही रहेगा कि क्या जनता को सच मिलेगा या सिर्फ़ शोर?
शराबबंदी बिहार में एक कानून से शुरू हुई है। एक आस्था बनी है, फिर राजनीतिक प्रतीक और अब संघर्ष का अखाड़ा बनता दिख रहा है। जब तक इसे सामाजिक सुधार की तरह नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार की तरह चलाया जाएगा तब तक शराब भले बोतल में बंद हो, उसकी राजनीति खुलेआम बहती रहेगी।
शराबबंदी लागू होते ही बिहार का प्रशासनिक तंत्र अचानक अत्यधिक शक्तिशाली और अत्यधिक दबावग्रस्त, दोनों हो गया है। एक ऐसा कानून, जिसमें ज़मानत कठिन, सजा कठोर, जब्ती अनिवार्य और विवेकाधिकार सीमित है। कागजों पर यह व्यवस्था लोहे की दीवार जैसी थी, लेकिन जमीन पर वही दीवार जगह-जगह दरारों से भरी दिखाई देने लगी है। प्रशासन की मजबूरी है हर दिन सैकड़ों गिरफ्तारियाँ, सीमित पुलिस बल, सीमित जेल क्षमता, राजनीतिक दबाव और मीडिया की निगरानी। प्रशासन धीरे-धीरे कानून लागू करने वाला नहीं है, बल्कि कानून संभालने वाला तंत्र बन गया है।
शराबबंदी ने बिहार पुलिस की भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है। पहले अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था, गश्त और जांच। बाद में शराब खोजो, शराब पकड़ो और शराब में उलझो। नतीजा यह हुआ कि गंभीर अपराधों की जांच प्रभावित हुई। पुलिस की ऊर्जा छोटे मामलों में खप गई और थाने “शराब केस फैक्ट्री” बनते चले गए।
शराबबंदी का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव पड़ा दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर और शहरी झुग्गी बस्तियों के लोग पर। अधिकांश मामलों में पढ़ा-लिखा, संपन्न और राजनीतिक संपर्क वाला व्यक्ति या तो बच जाता है या केस कमजोर हो जाता है।। जबकि गरीब पकड़ा जाता है। जेल जाता है और परिवार टूटता है। यहाँ कानून न्याय नहीं, वर्गीय छँटनी करता दिखाई देता है।
शराबबंदी की नैतिक धुरी महिलाओं को बनाया गया। शुरुआत में महिला समूहों का समर्थन, पंचायतों में प्रस्ताव और आंदोलनात्मक स्वर। धीरे-धीरे जहरीली शराब से मौत, पति जेल में, घर की कमाई बंद और बच्चों की पढ़ाई छूटी। महिलाएँ अब पूछने लगीं हैं कि “शराब बंद हुई या हमारा घर उजड़ गया?” यह प्रश्न किसी विपक्षी दल का नहीं है, जीवन की पीड़ा का प्रश्न है।
जब शराब अवैध होती है, तो वह सिर्फ गैरकानूनी नहीं बल्कि जानलेवा भी हो जाती है। जहरीली शराब की सच्चाई है शराब सस्ती, आसानी से उपलब्ध, बिना गुणवत्ता नियंत्रण और सीधे मौत की ओर। हर हादसे के बाद होता है प्रशासन सक्रिय, बयान जारी और मुआवजे की घोषणा, और फिर चुप्पी, विस्मृति और अगला हादसा। यह सिलसिला बताता है कि समस्या घटना नहीं है, बल्कि नीति की संरचना में है।
शराबबंदी ने बिहार में एक नई अंडरग्राउंड इकॉनमी को जन्म दिया है। सीमावर्ती राज्य झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, नेपाल सीमा के इलाकों में तस्करी संगठित हुई, नेटवर्क बने, पुलिस-प्रशासन में घुसपैठ। यह वही स्थिति है जहाँ कानून कमजोर, माफिया मजबूत और आम आदमी पिसता है।
अदालतों ने कई बार संकेत दिया है कि कानून अत्यधिक कठोर है, विवेकाधिकार की कमी है और सुधार की आवश्यकता है। इसी दबाव में संशोधन हुए, पहली बार पीने वालों को राहत और ज़मानत में ढील मिली। लेकिन यह सब अग्निशमन उपाय बने, स्थायी समाधान नहीं। शराबबंदी पर सबसे तीखा सवाल यही है “जो उपदेश दे रहे हैं, क्या वे खुद उस पर खरे हैं?” सड़क से सदन तक फैली चर्चाएँ यही बताती हैं कि सार्वजनिक मंच पर कठोर बयान और निजी दायरे में अलग व्यवहार। यही कारण है कि बहस अब नीति से हटकर व्यक्तिगत आरोप, चुनौती और जांच तक पहुँच चुकी है।
हालिया विधानसभा सत्र में यह स्पष्ट दिखा है कि शराबबंदी अब सुधार का विषय नहीं है बल्कि राजनीतिक साख का प्रश्न बन चुकी है। यहाँ कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है, क्योंकि पीछे हटना नैतिक हार माना जाएगा। व्यवहारिक सच्चाई यह है कि पूर्ण वापसी राजनीतिक रूप से कठिन है लेकिन यथास्थिति प्रशासनिक रूप से असंभव। इसलिए भविष्य में आंशिक उदारीकरण, लाइसेंस आधारित मॉडल या क्षेत्रीय छूट जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं, लेकिन नाम रहेगा शराबबंदी।
बिहार अकेला राज्य नहीं है जिसने पूर्ण शराबबंदी का प्रयोग किया हो। दुनिया के कई देशों और भारत के कुछ राज्यों ने यह रास्ता चुना और लगभग सभी जगह नतीजे एक जैसे रहे। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण हैं अमेरिका (1920–1933) और रूस (गोर्बाचेव काल)। इन जगहों पर शराब बंद हुई, अपराध बढ़ा, माफिया मजबूत हुए और अंततः नीति वापस लेनी पड़ी। इतिहास बताता है कि नशे को कानून से नहीं, समाज से हराया जाता है।
भारत में भी शराब पर अलग-अलग मॉडल अपनाए गए, कुछ राज्यों का अनुभव है नियंत्रित बिक्री, लाइसेंस आधारित मॉडल, समय और स्थान की पाबंदी, उच्च कर नीति। इन मॉडलों में राजस्व भी मिला, अवैध तस्करी सीमित रही और प्रशासनिक दबाव कम रहा। बिहार ने इन विकल्पों को शुरू से ही नैतिक आधार पर खारिज कर दिया है।
बिहार में शराबबंदी का असली प्रश्न यह नहीं है कि शराब पीनी चाहिए या नहीं असल प्रश्न यह है कि राज्य नागरिक पर कितना भरोसा करता है? कानून सुधार लाता है या डर? और राजनीति सच बोलने का साहस रखती है या नहीं? शराबबंदी ने बिहार को एक आईना दिखाया है इसमें सिर्फ़ शराब नहीं, राजनीति, तंत्र और समाज, तीनों का चेहरा दिखता है। और शायद इसी वजह से कोई भी उस आईने को देर तक देखना नहीं चाहता है।
