भारतीय सिनेमा में जब भी समाज के अंधेरे कोनों, लोक-आस्थाओं और उनसे जुड़ी भयावह सच्चाइयों को ईमानदारी से दिखाने की बात होती है, तो निर्देशक सुदीप्तो सेन का नाम अलग पहचान रखता है। उनकी नई फिल्म “चरक” 6 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि आस्था और अंधविश्वास के बीच झूलते समाज का आईना है।
फिल्म ‘चरक’ की कहानी पश्चिम बंगाल सहित भारत के कुछ हिस्सों में प्रचलित ‘चरक मेला’ की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह मेला केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें शरीर को पीड़ा देकर मनोकामनाएं पूरी होने का विश्वास किया जाता है। फिल्म में दिखाया गया समुदाय इस मेले को अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति का अंतिम अवसर मानता है। जैसे-जैसे मेले के अनुष्ठान आगे बढ़ता है, आस्था का उन्माद भयावह रूप लेता जाता है और दर्शक खुद से सवाल करने लगता है कि क्या यह भक्ति है या आत्म-विनाश?
‘चरक’ की कथा धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, लेकिन उसका असर गहरा है। फिल्म दिखाती है कि कैसे परंपरा के नाम पर लोगों को मानसिक और शारीरिक पीड़ा सहने के लिए तैयार किया जाता है। यहां विश्वास, बलिदान और भक्ति के नाम पर ऐसे अनुष्ठान होते हैं जो आधुनिक सोच को झकझोर देते हैं। निर्देशक किसी निष्कर्ष को थोपते नहीं हैं, बल्कि सवाल छोड़ देते हैं कि क्या ईश्वर को खुश करने के लिए इंसान का इस हद तक टूट जाना जरूरी है?
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका कलाकार समूह है। अंजली पाटिल एक संवेदनशील लेकिन मजबूत महिला किरदार में नजर आती हैं, जो आस्था और विवेक के बीच फंसी है। साहिदुर रहमान और सुब्रत दत्ता अपने-अपने किरदारों में भय और कट्टर विश्वास का प्रतीक बनकर उभरते हैं। शशि भूषण, नलनीश नील, शंखदीप और शौनक श्यामल सहायक भूमिकाओं में कहानी को यथार्थ की जमीन देते हैं। इन सभी कलाकारों का अभिनय इतना स्वाभाविक है कि दर्शक खुद को उस समुदाय का हिस्सा महसूस करने लगता है।
‘चरक’ केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि भारत के दूरस्थ इलाकों में फैले अंधविश्वास और तांत्रिक मान्यताओं की पड़ताल है। फिल्म यह नहीं कहती है कि आस्था गलत है, बल्कि यह दिखाती है कि जब आस्था विवेक से अलग हो जाती है, तो वह कैसे शोषण का हथियार बन सकती है। निर्देशक ने वास्तविक घटनाओं से प्रेरित परिस्थितियों को बिना किसी सनसनीखेज़ी के, बेहद सादगी से प्रस्तुत किया है।
सुदीप्तो सेन का निर्देशन संयमित और प्रभावशाली है। कैमरा न तो जरूरत से ज्यादा हिंसा दिखाता है और न ही भावनाओं का दोहन करता है। मेले के दृश्य, ढोल-नगाड़ों की आवाज़, चीख-पुकार और मंत्रोच्चार, यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल रचता है, जो लंबे समय तक मन में बना रहता है। सिनेमैटोग्राफी ग्रामीण भारत की कठोर सच्चाइयों को बिना सजावट के सामने रखती है।
यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा अनुभव है। यह उन सवालों को उठाती है, जिनसे अक्सर लोग नजर चुराते हैं। यह आस्था और अंधविश्वास के फर्क को समझने का अवसर देती है।
‘चरक’ एक साहसी और असहज फिल्म है, जो दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है। यह फिल्म उन लोगों के लिए नहीं है जो केवल हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहते हैं, बल्कि उनके लिए है जो सिनेमा को समाज का दर्पण मानते हैं। 6 मार्च को रिलीज होने जा रही यह फिल्म निश्चित ही भारतीय सिनेमा में आस्था और अंधविश्वास पर होने वाली बहस को नई दिशा देगी।
