भारतीय लोकतंत्र के संचालन का एक उत्कृष्ट, दुर्लभ और उदाहरणीय अध्याय था। एक ही दिन, एक ही लोकतांत्रिक परंपरा के अंतर्गत राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, दोनों ने राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के माध्यम से न केवल अपने-अपने सदनों को संबोधित किया, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता, संवैधानिक मर्यादा और वैचारिक स्पष्टता का भी प्रदर्शन किया। यह भाषण सामान्य विधायी वक्तव्य नहीं था। यह उस यात्रा के पड़ाव था जिसमें इतिहास की धूल, वर्तमान की चुनौती और भविष्य की नींव तीनों एक साथ समाहित था।
भारतीय संसदीय प्रणाली में धन्यवाद प्रस्ताव को अक्सर औपचारिक रस्म मान लिया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यही वह क्षण होता है जब सरकार अपनी वैचारिक दिशा स्पष्ट करती है। विपक्ष अपनी परिपक्वता सिद्ध करता है और लोकतंत्र स्वयं अपने स्तर को परखता है। यह पूरी प्रक्रिया अपने चरम पर दिखाई दी, लेकिन दुर्भाग्यवश, केवल सत्ता पक्ष की ओर से।
राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण किसी एक सरकार या एक कार्यकाल की उपलब्धियों की सूची नहीं था, बल्कि यह भाषण था भारत के लोकतांत्रिक आत्मविश्वास का। राष्ट्रवादी चेतना का और वैचारिक आक्रमण की सटीक रणनीति का। प्रधानमंत्री ने जब इतिहास की धूल की बात की, तो वह केवल औपनिवेशिक मानसिकता या बीते शासनों की विफलताओं की ओर संकेत नहीं था, बल्कि यह उस निरंतर प्रयास का स्मरण था जिससे भारत स्वयं को आत्महीनता से बाहर निकाल रहा है।
बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का धन्यवाद प्रस्ताव भाषण अपने आप में एक राजनीतिक परिपक्वता का दस्तावेज था। उनका वक्तव्य न तो भावनात्मक उन्माद था और न ही प्रतिशोध की भाषा, बल्कि यह अनुभव की गंभीरता, प्रशासनिक निरंतरता और राज्य के दीर्घकालिक हितों का प्रस्तुतीकरण था। नीतीश कुमार ने यह स्पष्ट किया है कि सत्ता परिवर्तन या गठबंधन की राजनीति चाहे जैसी हो, शासन की जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मर्यादा से समझौता नहीं किया जा सकता है।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह सरकार का विरोध करता है, नीतियों पर सवाल उठाता है, विकल्प प्रस्तुत करता है। लेकिन कल जो दृश्य सामने आया वह राज्यसभा में कांग्रेस और विधानसभा में राष्ट्रीय जनता दल की भूमिका विपक्ष की नहीं, व्यवधान की अधिक प्रतीत हुई।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के भाषण जहाँ तथ्य, तर्क और दृष्टि से लैस थे, वहीं विपक्ष की प्रतिक्रिया नारेबाजी, अवरोध और व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित रही है। यह अंतर केवल शैली का नहीं था, बल्कि यह राजनीतिक क्षमता और वैचारिक तैयारी का अंतर था।
जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्ष के आचरण को विवेचित किया, तो वह केवल आलोचना नहीं थी। वह राजनीतिक मारक क्षमता से लैस अमोघ बाण था। यह बाण शोर में नहीं, तथ्यों में और लोकतांत्रिक मर्यादा की कसौटी पर गढ़े गए थे इसीलिए वे चुभे।
विपक्ष को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का मंच नहीं है, यह दायित्वों की प्रयोगशाला भी है। संविधान बोलने का अधिकार देता है लेकिन मर्यादा में और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर। यदि हर सत्र को बाधित करना ही राजनीति बन जाए, तो यह केवल सरकार का नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र का उपहास होता है।
आज भारत केवल एक आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। वह वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ता राष्ट्र है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतांत्रिक मॉडल प्रस्तुत करता है। ऐसे में संसद और विधानसभाओं में होने वाला आचरण दुनिया देखती है और जब व्यवधान, शोर और असहिष्णुता ही समाचार बन जाए तो उपहास भी वैश्विक हो जाता है।
यह प्रश्न आज सबसे बड़ा है कि क्या विपक्ष अपनी भूमिका की गंभीरता समझेगा? इतिहास गवाह है कि राजनीति में आत्ममंथन दुर्लभ होता है और इसीलिए आशा भी सीमित है। लेकिन लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह सीखना अनिवार्य है कि न सीखा गया तो कीमत भी लोकतंत्र ही चुकाएगा।
यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र केवल बहस से नहीं चलता है। केवल शोर से नहीं चलता है बल्कि दृष्टि, मर्यादा और जिम्मेदारी से चलता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भाषण इस सत्य का प्रमाण था। अब यह विपक्ष पर निर्भर करता है कि वह लोकतंत्र का प्रहरी बनेगा या इतिहास में लोकतांत्रिक अवरोध का प्रतीक बनकर दर्ज होगा।
भारतीय लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। इसकी आत्मा संसद, विधानसभाओं और वहां होने वाले संवाद में बसती है। राष्ट्रपति या राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव दरअसल सरकार की नीतिगत दिशा, वैचारिक प्रतिबद्धता और प्रशासनिक दृष्टि का औपचारिक पुनर्पाठ होता है। यह वह क्षण होता है जब सत्ता पक्ष अपना एजेंडा स्पष्ट करता है। विपक्ष के पास अवसर होता है कि वह सार्थक प्रश्न उठाए और लोकतंत्र स्वयं अपनी गरिमा का परीक्षण करता है। लेकिन यह परीक्षा हुई, लेकिन परिणाम एकतरफा रहा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब “इतिहास की धूल” की बात करते हैं, तो वह किसी कालखंड विशेष को कोसने का प्रयास नहीं होता है। वह उस मानसिकता की ओर संकेत होता है जिसने दशकों तक भारत को आत्मग्लानि में, नीति-निर्माण की जड़ता में और वैश्विक मंच पर संकोच में बांध कर रखा था। प्रधानमंत्री का वक्तव्य स्पष्ट था कि भारत अब अतीत के बोझ से नहीं, भविष्य की संभावना से संचालित होगा।
प्रधानमंत्री के भाषण का सबसे सशक्त पक्ष था भविष्य के भारत की रूपरेखा। आत्मनिर्भर भारत। तकनीकी नेतृत्व। आधारभूत ढांचे का विस्तार और राष्ट्रीय सुरक्षा में निर्णायक सोच। यह केवल नारा नहीं था, बल्कि बीते वर्षों की नीतिगत निरंतरता का तार्किक विस्तार था। इसके बरक्स विपक्ष के पास न कोई वैकल्पिक मॉडल था और न कोई ठोस दृष्टि। केवल सत्ता-विरोधी शोर था।
नीतीश कुमार का भाषण उस राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है जो शोर में नहीं, स्थायित्व में विश्वास रखती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सरकारें आती-जाती रहेगी। गठबंधन बदलते रहेंगे, लेकिन बिहार की जनता के हित स्थायी हैं। उनका वक्तव्य राजद के लिए केवल आलोचना नहीं, बल्कि राजनीतिक आईना था।
लोकतंत्र में विरोध अनिवार्य है। लेकिन जब विरोध बहस से हटकर व्यवधान बन जाए। तर्क से हटकर तंज बन जाए और नीति से हटकर व्यक्तिगत आक्षेप में बदल जाए, तो वह लोकतांत्रिक भूमिका नहीं रह जाती है। राज्यसभा में कांग्रेस और विधानसभा में राजद ने यही किया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वक्तव्य इसलिए प्रभावी था, क्योंकि वह तथ्य आधारित था। ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े था और भविष्य की जिम्मेदारी से प्रेरित था, इसलिए जब उन्होंने विपक्ष की भूमिका को उजागर किया, तो वह केवल आरोप नहीं था वह लोकतांत्रिक अभियोग था।
संविधान केवल किताब नहीं है। वह व्यवहार है। संविधान बोलने की आजादी देता है, लेकिन अवरोध की अनुमति नहीं देता है। असहमति की जगह देता है, लेकिन अराजकता की नहीं। जो दल स्वयं को संविधान का ठेकेदार बताते हैं, उन्हें पहले संसद और विधानसभा के आचरण में उसे जीना चाहिए।
आज भारत G20 की मेजबानी कर चुका है। वैश्विक दक्षिण की आवाज बन रहा है और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में संसद के भीतर का शोर केवल आंतरिक राजनीति नहीं रहता है वह वैश्विक संदेश बन जाता है और यह संदेश दुर्भाग्यवश कल विपक्ष ने गलत दिया।
प्रश्न यह नहीं कि विपक्ष क्यों हारा। बल्कि प्रश्न यह है कि वह सीख क्यों नहीं रहा है। क्या संकट नेतृत्व का है? या वैचारिक शून्यता का? या केवल सत्ता से बाहर होने की हताशा का? जब तक आत्ममंथन नहीं होगा, तब तक व्यवधान ही राजनीति बना रहेगा।
लोकतंत्र केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह विपक्ष की भी उतनी ही जवाबदेही है। यदि सत्ता पक्ष बोल रहा है, नीति रख रहा है और दिशा दिखा रहा है, तो विपक्ष का कर्तव्य है कि वह प्रश्न करे, विकल्प दे और लोकतांत्रिक गरिमा बनाए रखे, न कि सदन को रणक्षेत्र बनाए।
इतिहास भाषणों को नहीं, आचरण को दर्ज करता है। जब इतिहास में लिखा जाएगा, तो एक ओर आत्मविश्वास से भरे नेतृत्व के भाषण होंगे और दूसरी ओर विपक्ष का शोर। यही अंतर भविष्य की राजनीति को परिभाषित करेगा।
लोकतंत्र का उपहास बाहर से नहीं होता है। वह भीतर से होता है। जब संसद और विधानसभाएँ संवाद का मंच न रहकर बाधा का अखाड़ा बन जाएँ, तो खतरा सरकार को नहीं बल्कि लोकतंत्र को होता है। अब निर्णय विपक्ष के हाथ में है कि सीखना है या इतिहास में चेतावनी बनकर दर्ज होना है।
