400 साल पुराना मुगलकालीन जल प्रबंधन की अद्भुत मिसाल - “कुंडी भंडारा”

Jitendra Kumar Sinha
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मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक शहर बुरहानपुर में स्थित “कुंडी भंडारा” भारत की प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली का अद्भुत उदाहरण है। लगभग 400 वर्ष पहले मुगलकाल में बनाई गई यह भूमिगत जल प्रणाली आज भी कार्यरत है और लोगों को आश्चर्यचकित करती है। आधुनिक तकनीक के अभाव में उस समय जिस वैज्ञानिक सोच और इंजीनियरिंग कौशल से इसे तैयार किया गया, वह अपने आप में अनोखा है। यही कारण है कि इसे वैश्विक स्तर पर भी मान्यता मिल रही है और यूनेस्को ने इसे अपनी अस्थायी विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है। आज भी जब पर्यटक इस भूमिगत जल प्रणाली को देखने के लिए लगभग 80 फीट नीचे उतरते हैं, तो वे उस समय की तकनीकी कुशलता और वास्तुकला को देखकर दंग रह जाते हैं।


“कुंडी भंडारा” का निर्माण वर्ष 1615 ईस्वी में मुगल सम्राट जहाँगीर के शासनकाल में कराया गया था। इसके निर्माण का श्रेय मुगलकालीन प्रसिद्ध सेनापति और विद्वान अब्दुल रहीम खानखाना को दिया जाता है। उस समय बुरहानपुर एक महत्वपूर्ण सैन्य और व्यापारिक केंद्र था। यहां बड़ी संख्या में सैनिक, व्यापारी और नागरिक रहते थे। ऐसे में शहर को स्वच्छ और निरंतर जल आपूर्ति उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती थी। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए कुंडी भंडारा की योजना बनाई गई। यह प्रणाली इतनी प्रभावी थी कि बिना किसी पंप या मशीन के पानी अपने आप बहकर पूरे शहर में पहुंच जाता था। यह उस समय की वैज्ञानिक समझ और इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है।


“कुंडी भंडारा” की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भूमिगत जल सुरंगें हैं। इस प्रणाली में लगभग ढाई किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई गई है, जिसके माध्यम से पानी शहर तक पहुंचता था। इस जल प्रणाली में कुल 103 कुंडियां (कुएं जैसे वेंटिलेशन शाफ्ट) बनाई गई हैं। इन कुंडियों का उपयोग सुरंगों की सफाई, मरम्मत और हवा के आवागमन के लिए किया जाता था। ये कुंडियां भूमिगत सुरंगों तक पहुंचने का रास्ता भी प्रदान करती थीं। दिलचस्प बात यह है कि यह सुरंग रेलवे लाइन के नीचे से भी गुजरती है। जब ब्रिटिश काल में यहां रेलवे पटरी बिछाई गई, तब इंजीनियरों ने इस प्राचीन जल प्रणाली को सुरक्षित रखने का विशेष ध्यान रखा था। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय भी इस प्रणाली के महत्व को समझा गया था।


“कुंडी भंडारा” की जल प्रणाली प्राकृतिक स्रोतों पर आधारित है। भू-गर्भ विशेषज्ञों ने सतपुड़ा पर्वतमाला से ताप्ती नदी की ओर प्रवाहित होने वाले भूमिगत जल स्रोतों का अध्ययन किया और उन्हें इस प्रणाली से जोड़ दिया। इन जल स्रोतों से निकलने वाला पानी भूमिगत सुरंगों के माध्यम से धीरे-धीरे शहर की ओर बहता था। पानी के प्रवाह के लिए जमीन की ढलान का बेहद सटीक उपयोग किया गया, जिससे पानी बिना किसी यांत्रिक सहायता के आगे बढ़ता रहता था। यह तकनीक उस समय के लिए बेहद उन्नत मानी जाती है और इसे आज के जल संरक्षण मॉडल के रूप में भी देखा जाता है।


आज “कुंडी भंडारा” केवल एक ऐतिहासिक जल प्रणाली ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी बन चुका है। हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं और 80 फीट नीचे उतरकर इस भूमिगत संरचना को करीब से देखते हैं। अंधेरी सुरंगों, पत्थर की दीवारों और बहते पानी को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं कि चार सौ साल पहले इतनी उन्नत जल प्रणाली कैसे बनाई गई होगी। इतिहास, वास्तुकला और इंजीनियरिंग में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह स्थान किसी खजाने से कम नहीं है।


“कुंडी भंडारा” केवल एक ऐतिहासिक धरोहर ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। आज जब दुनिया के कई हिस्सों में जल संकट बढ़ रहा है, तब यह प्राचीन प्रणाली हमें बताती है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जल प्रबंधन कैसे किया जा सकता है। इस प्रणाली में न तो बिजली की जरूरत थी और न ही भारी मशीनों की। केवल प्राकृतिक ढलान और भूमिगत जल स्रोतों के सही उपयोग से पूरे शहर को पानी उपलब्ध कराया जाता था। आज के आधुनिक शहरों के लिए भी यह एक प्रेरणा है कि टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल जल प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं।


“कुंडी भंडारा” भारत की प्राचीन इंजीनियरिंग और जल प्रबंधन की महान परंपरा का जीवंत उदाहरण है। चार सौ साल बाद भी इसका कार्यरत रहना उस समय की तकनीकी दक्षता को साबित करता है। यदि इस धरोहर का संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए, तो यह न केवल पर्यटन को बढ़ावा दे सकती है बल्कि दुनिया को यह भी दिखा सकती है कि भारत में सदियों पहले भी जल प्रबंधन की कितनी उन्नत प्रणालियां मौजूद थीं। “कुंडी भंडारा” वास्तव में इतिहास, विज्ञान और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक है।



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