मनुष्य का सबसे बड़ा पतन तब होता है जब मनुष्य स्वयं आयुध बन जाता है

Jitendra Kumar Sinha
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मनुष्य आयुध तब नहीं बनता जब वह बंदूक उठाता है, मनुष्य आयुध तब बनता है जब वह ब्रह्मांड द्वारा प्रदत्त स्वतंत्र चेतना, विवेक और बोध को क्रोध, भय और अहंकार के हाथों गिरवी रख देता है। सभ्यता के इतिहास में हथियारों का निर्माण उतना भयावह नहीं रहा है, जितना भयावह रहा है मनुष्य का स्वयं हथियार में बदल जाना। जब सोच बंद हो जाती है, प्रश्न मर जाते हैं और विवेक मौन हो जाता है, तब तलवार नहीं, मानव मस्तिष्क सबसे खतरनाक आयुध बनता है।

मानव इतिहास का पहला हथियार सुरक्षा के लिए नहीं था, बल्कि भय से उपजा था। जंगल में हिंस्र पशु, भूख और अनिश्चितता, इनसे उपजे भय ने पत्थर को हथियार बनाया। परंतु धीरे-धीरे हथियार रक्षा से सत्ता और सत्ता से वर्चस्व का माध्यम बन गया। हर नई सभ्यता ने यह मान लिया है कि “हम पहले से अधिक बुद्धिमान हैं, इसलिए हमारे हथियार अधिक नैतिक हैं।” यही भ्रम तलवार से तोप, तोप से मिसाइल और मिसाइल से परमाणु बम तक ले आया है।

हर युद्ध से पहले शब्द चलते हैं, खबरें बनती हैं, नैरेटिव गढ़े जाते हैं। आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, वे टीवी स्टूडियो, मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया पर लड़े जाते हैं। यह युद्ध शरीर को नहीं, बल्कि मस्तिष्क को निशाना बनाता है। सिद्धांततः मीडिया के चार स्तंभ हैं सत्य, संतुलन, संवेदना और सत्यापन। लेकिन आज का टेलीमीडिया पाँचवें स्तंभ पर खड़ा है, वह है TRP । सत्य अब खबर नहीं, बल्कि सत्य अब डिबेट में चिल्लाने वाला पक्ष बन गया है।मौत अब ब्रेकिंग न्यूज़ है। लाशें अब ग्राफिक्स हैं और आँसू अब विज़ुअल कंटेंट हैं।

जब मीडिया युद्ध से पहले जश्न मनाने लगे, तटस्थता छोड़ दे और राष्ट्रवाद को शोर में बदल दे तब वह पत्रकारिता नहीं, प्रचार तंत्र बन जाती है। यही कारण है कि एक बार खोई विश्वसनीयता दूसरी बार और गहरे संकट में जाती है। टीआरपी का सीधा गणित है डर दिखाओ,  भावनाएँ भड़काओ, दर्शक बाँधो और विज्ञापन कमाओ। इस गणित में न राष्ट्र सुरक्षित है, न समाज स्वस्थ है और न मनुष्य संतुलित।

टीवी स्क्रीन पर होने वाला मानसिक विस्फोट परमाणु बम से कम खतरनाक नहीं। क्योंकि परमाणु बम शहर को नष्ट करता है, पर मीडिया द्वारा भड़काया गया उन्माद पूरी पीढ़ी को नष्ट कर देता है। यदि सचमुच शांति चाहते हैं, तो युद्धकाल में शून्य उत्तेजना, सामान्य काल में आवश्यक सूचना, न नफरत, न उन्माद और न जश्न। क्योंकि युद्ध कोई त्योहार नहीं होता है।

आज मौत पर बहस होती है, लेकिन शोक नहीं। आज पीड़ा पर बहस होती है, लेकिन संवेदना नहीं। आज मानवता कराह रही है और मीडिया उस कराह को डिबेट में बदल रहा है। जब हर दृश्य कंटेंट बन जाए, हर दर्द टीआरपी बन जाए, और हर युद्ध मनोरंजन तो समझना चाहिए कि संवेदनाओं की अर्थी उठ चुकी है।

युद्ध की पहली गोली सीमा पर नहीं चलती, वह मन के भीतर चलती है। जब किसी समाज को बार-बार यह बताया जाए कि तुम खतरे में हो। तुम्हारा अस्तित्व संकट में है। तुम्हारे चारों ओर शत्रु हैं, तो धीरे-धीरे भय स्थायी अवस्था बन जाता है और भयग्रस्त समाज तर्क नहीं करता है बल्कि वह आदेश मानता है। यही वह क्षण होता है जब मनुष्य सोचने वाला प्राणी नहीं, प्रोग्राम किया गया औजार बन जाता है।

मीडिया जब भय बेचता है, तो उसकी भाषा बदल जाती है “खतरा मंडरा रहा है”। “कुछ बड़ा होने वाला है”। “देखते रहिए, अभी–अभी” यह भाषा सूचना नहीं, उत्तेजना है। यह शब्द नहीं, ट्रिगर हैं। धीरे-धीरे दर्शक खबर नहीं देखता, वह एड्रेनालिन की खुराक लेने लगता है। आज का टेलीविजन स्टूडियो संवाद का मंच नहीं रहा, वह अखाड़ा बन चुका है। यहाँ तर्क नहीं, दहाड़ होती है। प्रमाण नहीं, आरोप होते हैं। प्रश्न नहीं, फ़ैसले सुनाए जाते हैं। एंकर मध्यस्थ नहीं, न्यायाधीश और सेनापति बन बैठता है।

TRP वह अदृश्य बारूद है जो हर रात स्टूडियो में भरी जाती है। जितना अधिक शोर, जितनी अधिक नफरत, जितनी अधिक सनसनी, उतनी अधिक रेटिंग। इस गणित में शांति घाटे का सौदा है, संयम उबाऊ है और विवेक व्यावसायिक अपराध। मीडिया किसी को सीधे नहीं मारता, वह संवेदना की हत्या करता है। बार-बार हिंसा देखने वाला मस्तिष्क, दर्द से सुन्न हो जाता है। मौत से अभ्यस्त हो जाता है और अंततः, क्रूरता को सामान्य मान लेता है। यही वह समाज है जहाँ लाशें खबर होती हैं, पर इंसान अदृश्य।

राष्ट्र से प्रेम शांत, गहरा और उत्तरदायी होता है। जबकि उन्माद चिल्लाता है, दुश्मन खोजता है और सवाल पूछने वालों को गद्दार कहता है। जब मीडिया राष्ट्रवाद को उन्माद में बदल देता है, तो वह राष्ट्र की रक्षा नहीं करता है बल्कि वह राष्ट्र की आत्मा को जला देता है।

युद्धकाल में सूचना का अर्थ होता है संयम, तथ्य और न्यूनतम आवश्यक जानकारी। लेकिन आज युद्धकाल में ग्राफिक्स भड़काऊ होते हैं। स्टूडियो में युद्ध सिमुलेशन होते हैं और एंकर विजयी घोषणाएँ करने लगते हैं। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि मानसिक सैन्य परेड है। यदि टेलीविज़न आग है, तो सोशल मीडिया पेट्रोल। अधूरी खबरें, काटे गए वीडियो और उन्मादी हेडलाइंस। सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जहाँ झूठ तेज़ दौड़ता है और सच हाँफता रह जाता है।

आज युद्ध केवल सैन्य गतिविधि नहीं है, एक मल्टी-बिलियन उद्योग है। हथियार उद्योग, मीडिया उद्योग, भय का बाजार और भावनाओं की ट्रेडिंग। इस उद्योग में शांति बेरोजगारी लाती है, इसलिए शांति सबसे बड़ा खतरा है। जब दर्शक कहता है “क्या ही कर सकते हैं”। तब वह अनजाने में हर झूठ, हर उन्माद, हर युद्ध-घोषणा पर मौन स्वीकृति दे देता है। इतिहास गवाह है कि सबसे भयानक युद्ध लोगों की चुप्पी से लड़े गए थे।

इतिहास में सभ्यताओं का पतन अधिकतर बाहरी आक्रमणों से नहीं हुआ है, बल्कि आंतरिक नैतिक क्षय से हुआ है। रोम का पतन, मेसोपोटामिया का विनाश या बीसवीं सदी के विश्व युद्ध, हर बार हथियार बाद में चले, पहले विवेक मरा। जब समाज ने प्रश्न पूछना छोड़ा। भय को सामान्य माना और प्रचार को सत्य समझ लिया। तब सभ्यता की उलटी गिनती शुरू हो गई।

मनुष्य ने अंतरिक्ष जीत लिया, लेकिन भीतर की शून्यता नहीं भर पाया। परमाणु तोड़ लिए, जीन बदल लिए और कृत्रिम बुद्धि बना ली लेकिन यह नहीं सीख पाए कि क्रोध को कैसे संयम में बदलें, अहंकार को कैसे त्यागें। यही असंतुलन मनुष्य को सर्वाधिक खतरनाक प्राणी बनाता है।

मनुष्य अब ईश्वर से नहीं डरता है वह स्वयं को ईश्वर समझने लगा है। यही कारण है कि हथियारों को नैतिकता से ऊपर रख दिया गया है। जब कोई कहता है कि “हम सही हैं क्योंकि हम शक्तिशाली हैं” तो समझ लीजिए विनाश का दर्शन तैयार हो चुका है।

समस्या केवल मीडिया की नहीं है, समस्या उस दर्शक की भी है जो हर रात उसी जहर को देखता है और फिर कहता है कि “मीडिया तो ऐसी ही है।” भय से मुक्त होने के लिए हर खबर पर प्रतिक्रिया नही देना चाहिए। हर उकसावे पर क्रोध नही करना चाहिए। हर बहस में पक्ष नही चुनना चाहिए। विवेक का पहला नियम है ठहराव। ठहरकर सोचना आज सबसे क्रांतिकारी कार्य है। 

यह समय किसी एक देश, किसी एक मीडिया हाउस या किसी एक युद्ध का नहीं है। यह समय है यह तय करने का कि क्या मनुष्य अब भी मनुष्य रहना चाहता है या केवल एक चलता–फिरता आयुध।

मनुष्य आयुध तब बनता है जब वह अपनी स्वतंत्र चेतना, क्रोध और अहंकार को सौंप देता है। यदि बचना है तो हथियारों से नहीं, मीडिया से नहीं और शत्रुओं से नहीं बल्कि अपने भीतर के अंधे भय से बचना होगा। क्योंकि जिस दिन मनुष्य ने सोचना बंद कर दिया, उस दिन कोई परमाणु बम भी आवश्यक नहीं होगा।





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