वैश्विक उथल-पुथल के दौर में बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत

Jitendra Kumar Sinha
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पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिले हैं। विशेष रूप से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लिए गए विभिन्न निर्णयों, चाहे वह व्यापारिक नीतियां हो, आव्रजन नियम हो, या अंतरराष्ट्रीय समझौतों से पीछे हटना, ने विश्व व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। इन निर्णयों के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर अस्थिरता, आर्थिक तनाव और कूटनीतिक खींचतान का माहौल बना हुआ है। ऐसे समय में विश्व के अनेक देश एक स्थिर, संतुलित और विश्वसनीय नेतृत्व की तलाश में हैं। यही वह बिंदु है जहां भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है। भारत न केवल एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है, बल्कि वह एक सांस्कृतिक और नैतिक शक्ति भी है, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसे सार्वभौमिक सिद्धांत को आधार बनाकर विश्व को एकजुट करने की क्षमता रखता है।

डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों में ‘अमेरिका फर्स्ट’ का दृष्टिकोण प्रमुख रहा है। इसके चलते उन्होंने कई देशों पर आयात शुल्क बढ़ाया, विशेषकर चीन पर। इसने वैश्विक व्यापार युद्ध को जन्म दिया। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय व्यापार में गिरावट आई। आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुईं और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। ट्रम्प प्रशासन ने कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संस्थाओं से दूरी बनाई, जैसे जलवायु परिवर्तन समझौता। विश्व स्वास्थ्य संगठन से अस्थायी अलगाव। इससे वैश्विक सहयोग की भावना कमजोर हुई। ट्रम्प के निर्णयों ने मध्य पूर्व, यूरोप और एशिया में तनाव बढ़ाया। ईरान, उत्तर कोरिया और चीन के साथ संबंधों में तनाव ने वैश्विक शांति को प्रभावित किया।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण तरीके से होता है। यह वैश्विक मंच पर भारत को एक विश्वसनीय साझेदार बनाता है। भारत ने पिछले दशक में तेज आर्थिक विकास दर्ज किया है। स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था में वृद्धि और विनिर्माण क्षेत्र में सुधार। भारत ने G20, BRICS, QUAD जैसे मंचों पर सक्रिय भागीदारी निभाई है, जिससे उसकी वैश्विक उपस्थिति मजबूत हुई है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं है, बल्कि यह तकनीकी, रक्षा, कृषि और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में स्वावलंबन का प्रतीक है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना। इसका परिणाम है आयात पर निर्भरता में कमी। निर्यात में वृद्धि। रोजगार के अवसरों में विस्तार।

भारत की लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह एक विशाल मानव संसाधन है। युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के लिए स्किल इंडिया मिशन, व्यावसायिक शिक्षा और डिजिटल कौशल प्रशिक्षण है। भारत अपने प्रशिक्षित युवाओं को विश्व के विभिन्न देशों में भेजकर आर्थिक सहयोग बढ़ा सकता है और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित कर सकता है। 

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अर्थ है, “पूरी पृथ्वी एक परिवार है।” यह भारतीय संस्कृति की मूल भावना है। आज जब विश्व संघर्षों से जूझ रहा है, तो यह सिद्धांत शांति और सहयोग को बढ़ावा देता है, राष्ट्रों के बीच विश्वास स्थापित करता है। भारत योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन और कला के माध्यम से विश्व में अपनी सांस्कृतिक पहचान मजबूत कर रहा है।

भारत ने हमेशा संतुलित नीति अपनाई है रूस और अमेरिका दोनों के साथ संबंध, पश्चिम और पूर्व के बीच संतुलन।  भारत अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ बुनियादी ढांचा विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सहयोग। कोविड-19 के दौरान भारत ने कई देशों को वैक्सीन और दवाएं उपलब्ध कराईं, जिससे उसकी छवि एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में उभरी। भारत नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश कर रहा है सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा में। भारत कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर बनकर अन्य देशों की मदद कर सकता है। भारत का डिजिटल मॉडल (UPI, आधार) अन्य देशों के लिए उदाहरण बन रहा है।

भारत के सामने चुनौतियां हैं बेरोजगारी- युवा शक्ति को सही दिशा में उपयोग करना एक बड़ी चुनौती है। शिक्षा की गुणवत्ता- वैश्विक स्तर की शिक्षा प्रणाली विकसित करना आवश्यक है। बुनियादी ढांचा- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान विकास की आवश्यकता है। भविष्य की संभावनाएं के तहत वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत शांति का संदेशवाहक बन सकता है। वैश्विक संकटों का समाधान प्रस्तुत कर सकता है। आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा 2030 तक भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। सांस्कृतिक प्रभाव भारतीय संस्कृति विश्व को जोड़ने का माध्यम बन सकती है।

आज का विश्व अनिश्चितताओं और चुनौतियों से भरा हुआ है। ऐसे समय में भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभर रहा है, जो न केवल अपनी समस्याओं का समाधान कर रहा है, बल्कि विश्व को भी एक नई दिशा दिखाने की क्षमता रखता है। भारत की आत्मनिर्भरता, युवा शक्ति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना उसे एक अद्वितीय स्थान प्रदान करती है। यदि भारत इन तत्वों का सही उपयोग करता है, तो वह न केवल वैश्विक उथल-पुथल को कम करने में मदद करेगा, बल्कि एक शांतिपूर्ण, समृद्ध और संतुलित विश्व व्यवस्था की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।



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