भारत के मानचित्र पर बिहार एक ऐसा प्रदेश है जिसकी पहचान केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं है, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक वैभव के केंद्र के रूप में रही है। यह वही भूमि है जहाँ मानव सभ्यता के अनेक महत्वपूर्ण अध्याय लिखे गए। राजनीति, दर्शन, धर्म, गणित, साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम, हर क्षेत्र में बिहार ने भारत ही नहीं बल्कि विश्व को दिशा दी है।
प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को बिहार दिवस मनाया जाता है। यह दिन बिहार के लिए केवल एक उत्सव नहीं है बल्कि अपने गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक धरोहर और विकास यात्रा को याद करने का अवसर होता है। वर्ष 2026 में बिहार अपनी स्थापना के 114 वर्ष पूरे कर रहा है।
22 मार्च 1912 को ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक अधिसूचना जारी कर बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर एक नए प्रांत के रूप में स्थापित किया था। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में हर साल “बिहार दिवस” मनाया जाता है। यह दिन बिहारवासियों को अपने अतीत की महान परंपराओं को याद करने और भविष्य के विकास की दिशा तय करने के लिए प्रेरित करता है। ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में बिहार एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई नहीं था। यह बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी बहुत विशाल थी और इसमें आज के बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड तथा बांग्लादेश के कई क्षेत्र शामिल थे। इतिहासकार बताते हैं कि उस समय प्रशासनिक दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत बड़ा हो गया था, जिससे शासन चलाना कठिन हो रहा था। इसके अलावा बिहार की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान भी थी, जिसे उचित प्रशासनिक महत्व नहीं मिल रहा था।
ब्रिटिश शासन ने इस समस्या को समझते हुए 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में एक महत्वपूर्ण घोषणा की। इस घोषणा में कहा गया कि बंगाल प्रेसीडेंसी को पुनर्गठित किया जाएगा और बिहार, उड़ीसा तथा छोटानागपुर को बंगाल से अलग कर नया प्रांत बनाया जाएगा। इस घोषणा के बाद 22 मार्च 1912 को आधिकारिक अधिसूचना जारी हुई और बिहार का जन्म एक नए प्रशासनिक प्रांत के रूप में हुआ।
1912 में जब बिहार अलग प्रांत बना तब यह अकेला राज्य नहीं था। उस समय इसे बिहार और उड़ीसा प्रांत के रूप में स्थापित किया गया था। इस संयुक्त प्रांत की राजधानी पटना बनाई गई, जो गंगा नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक शहर है। यह शहर प्राचीन काल से ही व्यापार, राजनीति और संस्कृति का केंद्र रहा है।
समय के साथ प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण एक और बड़ा बदलाव हुआ। 1 अप्रैल 1936 को उड़ीसा को बिहार से अलग कर एक स्वतंत्र राज्य बना दिया गया। इसके बाद बिहार एक अलग प्रांत के रूप में स्थापित हुआ, जिसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा था और इसमें आज का झारखंड भी शामिल था।
स्वतंत्र भारत में भी बिहार का भूगोल लंबे समय तक बहुत बड़ा रहा। लेकिन झारखंड क्षेत्र की अलग पहचान और विकास की मांग के कारण 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ। इस प्रकार बिहार से अलग होकर झारखंड भारत का 28वाँ राज्य बना।
इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार “बिहार” शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के “विहार” शब्द से हुई है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के स्थानों को “विहार” कहा जाता था। चूँकि यहाँ बड़ी संख्या में बौद्ध मठ और विहार थे, इसलिए धीरे-धीरे इस क्षेत्र को “विहार” कहा जाने लगा। समय के साथ यही शब्द बदलकर बिहार हो गया।
वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में बिहार का कई नामों से उल्लेख मिलता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे मगध, मिथिला और वैशाली जैसे राज्यों के रूप में जाना जाता था। ये सभी क्षेत्र उस समय भारतीय सभ्यता के महत्वपूर्ण केंद्र थे।
इतिहासकारों के अनुसार, ईसा से लगभग 6वीं शताब्दी पहले वैशाली में विश्व का पहला गणराज्य स्थापित हुआ था। वैशाली उस समय वज्जी महाजनपद की राजधानी था। यहाँ की शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक थी, जिसमें कई गणों के प्रतिनिधि मिलकर शासन चलाते थे। यह व्यवस्था आधुनिक लोकतंत्र की प्रारंभिक झलक मानी जाती है।
बिहार विश्व के दो महान धर्मों “बौद्ध और जैन” की जन्मस्थली रहा है। भगवान ‘गौतम बुद्ध’ को बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसके बाद उन्होंने वैशाली, राजगीर और अन्य स्थानों पर अपने उपदेश दिए। आज भी बोधगया विश्वभर के बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल है।
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर ‘भगवान महावीर’ का जन्म भी बिहार में हुआ था। उन्होंने अहिंसा, सत्य और तपस्या का संदेश दिया, जिसने भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला।
बिहार की धरती ने महान सम्राट “चन्द्रगुप्त मौर्य” को जन्म दिया, जिन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। उनके गुरु ‘चाणक्य’ ने राजनीति और कूटनीति के सिद्धांतों के माध्यम से भारत के इतिहास को नई दिशा दी।
मौर्य वंश के सबसे महान शासक ‘सम्राट अशोक’ भी बिहार की धरती से जुड़े रहे। कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने हिंसा का त्याग कर बौद्ध धर्म को अपनाया और पूरे एशिया में शांति का संदेश फैलाया।
मध्यकाल में बिहार ने एक और महान शासक को जन्म दिया ‘शेरशाह सूरी’। उन्होंने प्रशासन, सड़क निर्माण और मुद्रा व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए। उनके द्वारा बनवाई गई ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ आज भी भारत की प्रमुख सड़कों में से एक है।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के विद्रोह में बिहार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इस विद्रोह का नेतृत्व बिहार में ‘बाबू कुंवर सिंह’ ने किया था। उस समय उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी, लेकिन उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अद्भुत साहस के साथ लड़ाई लड़ी। ‘बाबू कुंवर सिंह’ छापामार युद्ध के महान रणनीतिकार थे। उन्होंने ब्रिटिश सेना को कई बार चकमा दिया और लगभग एक वर्ष तक संघर्ष जारी रखा। उनकी वीरता आज भी भारतीय इतिहास में अमर है।
बिहार की धरती ने अनेक महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया, जिन्होंने भारत के इतिहास को नई दिशा दी। इनमें प्रमुख हैं चाणक्य, आर्यभट्ट, समुंद्रगुप्त, विद्यापति, गुरु गोबिंद सिंह, बाबू कुंवर सिंह, सच्चिदानंद सिन्हा, ब्रजकिशोर प्रसाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना मजहरुल हक, जयप्रकाश नारायण, महात्मा गांधी (चंपारण आंदोलन)। इन सभी महान व्यक्तियों का योगदान भारतीय इतिहास में अमूल्य है।
बिहार का “नालंदा विश्वविद्यालय” प्राचीन विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र था। यहाँ भारत ही नहीं बल्कि चीन, जापान, कोरिया और तिब्बत से भी विद्यार्थी पढ़ने आते थे। नालंदा के अलावा “विक्रमशिला विश्वविद्यालय” भी बौद्ध शिक्षा का महान केंद्र था। यह विश्वविद्यालय आज के भागलपुर जिले के पास स्थित है।
उत्तर बिहार की मिथिला संस्कृति अपनी कला, भाषा और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की “मधुबनी पेंटिंग” विश्वभर में प्रसिद्ध है। बिहार विशेष रूप से “मखाना उत्पादन” के लिए भी जाना जाता है। भारत में मखाने का सबसे बड़ा उत्पादन बिहार में होता है।
बिहार भारत के पूर्वी भाग में स्थित है। इसके उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखंड की सीमाएँ हैं। बिहार की राजधानी पटना है, जो गंगा नदी के किनारे बसा एक ऐतिहासिक शहर है।
बिहार दिवस केवल एक उत्सव नहीं है बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक है। इस दिन लोग अपने राज्य की उपलब्धियों, संस्कृति और इतिहास को याद करते हैं। राजधानी पटना में बिहार दिवस के अवसर पर तीन प्रमुख स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं गांधी मैदान, श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल और रविन्द्र भवन। इसबार भी यह कार्यक्रम 22 से 24 मार्च तक तीन दिनों तक आयोजित किए जाएंगे।
इन कार्यक्रमों में कई प्रकार की गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं सांस्कृतिक कार्यक्रम, व्यंजन मेला, पुस्तक मेला, लोकनाटक, रंगमंच और कला प्रदर्शनी। इन आयोजनों का उद्देश्य बिहार की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करना है।
114 वर्ष का बिहार केवल एक राज्य नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक विरासत है। यह वह भूमि है जिसने विश्व को लोकतंत्र की पहली झलक दी, महान सम्राटों को जन्म दिया, धर्म और दर्शन की नई राह दिखाई और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज बिहार तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है। शिक्षा, उद्योग, कृषि और तकनीक के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो रहे हैं। बिहार दिवस यह याद दिलाता है कि यहां का अतीत कितना गौरवशाली रहा है और भविष्य को कितना उज्ज्वल बनाना है।
