गांव छोड़ने की अनोखी परंपरा

Jitendra Kumar Sinha
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भारत की मिट्टी में ऐसी अनेक परंपराएँ जीवित हैं जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक अनोखी परंपरा है “गांव छोड़ने की परंपरा”, जो आज भी कुछ ग्रामीण अंचलों में पूरे उत्साह और सामूहिक भागीदारी के साथ निभाई जाती है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता और पीढ़ियों के संवाद का अद्भुत उदाहरण है।

भारत में होली का पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। गांव छोड़ने की यह परंपरा संभवतः सदियों पुरानी है, जब ग्रामीण जीवन पूरी तरह प्रकृति, कृषि और सामूहिकता पर आधारित था।

कहा जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत उस समय हुई जब गांव के लोग सामूहिक रूप से किसी संकट, महामारी या अकाल से बचने के लिए गांव की सीमा से बाहर जाकर ईश्वर से प्रार्थना करते थे। धीरे-धीरे यह धार्मिक अनुष्ठान होली पर्व के साथ जुड़ गया और एक सांस्कृतिक उत्सव में बदल गया।

ग्रामीण अंचलों में होली केवल रंग खेलने का दिन नहीं होता है, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला सांस्कृतिक पर्व होता है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से पहले ही होली गायन प्रारंभ हो जाता है। गांव के चौपाल, मंदिर या किसी खुले मैदान में लोग एकत्रित होते हैं। ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम के साथ पारंपरिक फाग गाए जाते हैं। यह परंपरा गांव की सामाजिक संरचना को मजबूत करती है, क्योंकि इसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी की समान भागीदारी होती है।

पूर्णिमा वाले दिन इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है। दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक लगातार होली गायन। विशेष रूप से महाभारत के प्रसंगों का गायन। पौराणिक कथाओं के माध्यम से नैतिक शिक्षा का संचार। इस दौरान पूरा गांव मानो एक सांस्कृतिक विद्यालय बन जाता है।

महाभारत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीवन का दार्शनिक ग्रंथ है। गांव के बुजुर्ग जब भीम, अर्जुन, द्रौपदी, कर्ण या श्रीकृष्ण के प्रसंग गाते हैं, तो वह केवल कथा नहीं होती है वह अनुभव का हस्तांतरण होता है। धर्म और अधर्म की व्याख्या, साहस और त्याग की प्रेरणा, परिवार और समाज के कर्तव्य, इस तरह होली का उत्सव एक सांस्कृतिक विश्वविद्यालय में बदल जाता है।

इस परंपरा का सबसे रोचक और रहस्यमय पात्र है “खाती”। खाती गांव का वह व्यक्ति होता है जिसे हनुमान भक्त माना जाता है। कुछ स्थानों पर यह भूमिका पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार निभाता है। कुछ ग्रामीण खाती के घर जाते हैं, उसे आदरपूर्वक लेकर आते हैं, वह होली गायन मंडली के बीच खड़ा होता है और दोनों हाथ ऊपर उठा देता है। यह इशारा संकेत होता है कि होली गायन अब समाप्त हो चुका है।

खाती के संकेत के बाद अचानक वातावरण बदल जाता है। सभी ग्रामीण दौड़ते हुए पूर्व दिशा की ओर जाते हैं। बच्चे, जवान, बुजुर्ग कोई पीछे नहीं रहता है। गांव की सीमा पार की जाती है। यह दौड़ केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि प्रतीकात्मक है। नकारात्मकता को पीछे छोड़ना। नए वर्ष या नए जीवन की शुरुआत करना। सामूहिक एकता का प्रदर्शन दिखाना। 

दशकों पहले गांव के बाहर खुली भूमि पर घुड़दौड़ और ऊंटदौड़ आयोजित होती थी। आज भी यह परंपरा जीवित है, हालांकि अब आयोजन स्टेडियम स्थल पर किया जाता है। गांव के युवा अपनी घुड़सवारी कला का प्रदर्शन करते हैं। विजेता को सम्मानित किया जाता हैविशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां ऊंट पाले जाते हैं, ग्रामीण जीवन की झलक होती है। यह आयोजन गांव के लिए गौरव और उत्साह का विषय होता है।

यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जाति, वर्ग, आयु का भेद मिट जाता है। सामूहिक श्रम और सहयोग की भावना विकसित होती है और गांव के बाहर बसे लोग भी लौटकर शामिल होते हैं। इस दिन गांव सचमुच एक परिवार बन जाता है।

आज के समय में जब गांवों में भी आधुनिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब भी यह परंपरा जीवित है। मोबाइल और सोशल मीडिया के बावजूद लोकगीतों की गूंज, स्टेडियम स्थल पर आधुनिक व्यवस्था, परंतु मूल भावना वही होती है और नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी रहती है। यह बताता है कि संस्कृति तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ स्वयं को ढाल लेती है।

गांव छोड़ने की यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव है। जब खाती दोनों हाथ उठाता है और पूरा गांव दौड़ पड़ता है, तब वह दृश्य केवल एक रस्म नहीं होता है बल्कि वह सदियों की परंपरा, विश्वास और एकता का प्रतीक होता है। आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब ऐसी परंपराएँ जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं। यह परंपरा बताती है कि संस्कृति केवल किताबों में नहीं, बल्कि लोगों के हृदय और व्यवहार में जीवित रहती है।



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