आभा सिन्हा, पटना I
भारतीय संस्कृति में चैत्र नवरात्र केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, तपस्या और आध्यात्मिक उन्नति का महान अवसर है। यह नौ दिनों का पर्व मां दुर्गा के नौ स्वरूपों, नवदुर्गा, की उपासना का प्रतीक है, जिसमें हर दिन साधक एक नई ऊर्जा, एक नई चेतना और एक नई दिशा प्राप्त करता है। नवरात्र का प्रत्येक दिन जीवन के एक गहरे सत्य को उजागर करता है। पहला दिन स्थिरता (शैलपुत्री), दूसरा दिन तप (ब्रह्मचारिणी) और तीसरा दिन साहस एवं शक्ति (चन्द्रघंटा)।
मां के मस्तक पर अर्धचंद्र घंटी के आकार में होता है इसलिए उन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। मां चन्द्रघंटा तीन नेत्र, दस भुजाएं, बाघ पर सवार, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है। मां चन्द्रघंटा का रूप दुष्टों के संहार और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है। उनकी घंटी की ध्वनि नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करती है। मां चन्द्रघंटा बाघ पर सवार, कंठ में सफेद पुष्प के माला, शीश पर रत्नजड़ित मुकुट, मस्तक पर घंटे की आधा चंद्रमा विराजमान है।
तीसरे दिन साधक का ध्यान मणिपुर चक्र पर केंद्रित होता है। स्थान है नाभि क्षेत्र। कार्य है आत्मविश्वास, शक्ति। प्रभाव है साहस और निर्णय क्षमता। मां चन्द्रघंटा को दूध और खीर का भोग, चमेली के फूल अर्पित और शहद अर्पण किया जाता है। महामंत्र है- “या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता…” मां चन्द्रघंटा की आराधना करने से भय का नाश, साहस में वृद्धि, समृद्धि और सुख मिलती है।
माना जाता है कि मां चन्द्रघंटा का संबंध शुक्र ग्रह से है जो भोग, सुख और वैभव का कारक है। आज के तनावपूर्ण जीवन में मां चन्द्रघंटा सिखाती हैं साहस। लक्ष्य के प्रति समर्पण। कठिन समय में धैर्य। निर्णय लेने की क्षमता। ध्यान से मन शांत। नकारात्मकता से मुक्ति। आत्मविश्वास में वृद्धि।
नवरात्र सिखाता है कि शक्ति (चन्द्रघंटा) जीवन में विजय दिलाती है। जब मनुष्य संयम, साधना और साहस को अपनाता है, तब वह जीवन की हर कठिनाई को पार कर सकता है। मां चन्द्रघंटा शक्ति का उपयोग करना सिखाती हैं।
